मानसून जागा तो गाँव के मन में फिर से उम्मीद भी जाग उठी
आज बारिश हुई। पकौड़े बनाने-खाने का बहाना भी मिल गया। लेकिन मन में एक और हिसाब चलता रहा। आज की बारिश जोड़ भी ली जाए, तब भी शायद इस मौसम में जिले में सामान्य से लगभग 80 प्रतिशत कम वर्षा हुई होगी। और यह भी संभव है कि आने वाले महीने इस कमी की पूरी भरपाई न कर पाएँ।
कल एक मित्र ने टिप्पणी की थी कि वे दुनिया के उस हिस्से में रहते हैं जहाँ लोग बारिश से ऊब जाते हैं। वहाँ वर्षा इतनी होती है कि पेड़-पौधे सूरज की रोशनी और गर्मी तक रोक लेते हैं। भारत का मामला उलटा है। यहाँ जल ही जीवन है। शहर में बारिश पकौड़ों का मौसम बनाती है, गाँव में खेती का कैलेंडर बदल देती है।
कहा जाता है कि भारत के पास दुनिया के लगभग 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधन हैं, जबकि आबादी 18 प्रतिशत से अधिक है। जहाँ पानी दुर्लभ होता है, वहाँ वर्षा वरदान होती है; जहाँ पानी प्रचुर होता है, वहाँ वह जीवन का स्वाभाविक परिवेश बन जाती है। पर सोचता हूँ कि जल का सम्मान दोनों जगह है।
इसी सोच के साथ मैंने बीनू के जॉन की पुस्तक Under a Cloud: Life in Cherrapunji, the Wettest Place on Earth पढ़नी शुरू की है। शुरुआती पन्नों में लिखा है कि चेरापूंजी (सोहरा) और मायसिनराम में साल भर में लगभग 14,000 मिलीमीटर वर्षा होती है। मेरे गाँव के आसपास औसतन 800 मिलीमीटर। अंतर अठारह-बीस गुना का है। फिर भी न मेरे गाँव का किसान बारिश से ऊबता है, न सोहरा का खासी।

यह जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि जनवरी-फरवरी में यहाँ भी ताल-तलैया सूखने लगते हैं और चेरापूंजी में भी पानी की किल्लत हो जाती है। तब लगता है कि समस्या केवल वर्षा की मात्रा की नहीं, पानी को सँभालने की भी है।
बिहार में कोसी की बाढ़ झेलने वाला हो या ब्रह्मपुत्र के माजुली और उमानंद जैसे द्वीपों पर रहने वाला, जल कभी-कभी उसके लिए संकट भी बन जाता होगा। लेकिन वही समाज जल की पूजा भी करता है – आख़िर वही बाढ़ उपजाऊ मिट्टी भी लाती है। सदियों से वही मिट्टी अगली फसल और सभ्यता दोनों का आधार बनती रही है।
मुझे अपने विवाह की एक रस्म याद आती है। परिवार और पट्टीदारी की महिलाएँ गीत गाती हुई मुझे गाँव के हर कुएँ और तालाब का दर्शन कराने ले गई थीं। उस समय मैं स्वयं उस जुलूस में शायद थोड़ा हास्यास्पद लग रहा होऊँगा, पर आज समझ में आता है कि वह केवल रस्म नहीं थी; वह जीवन के आधार को प्रणाम करने की परंपरा थी।

आज बारिश हुई है। मैं गाँव में निकल नहीं पाया, पर घर बैठे भी अनुमान लगा सकता हूँ कि हर किसान अब धान की बुआई की तैयारी में लग गया होगा। जिसका लड़का रोज बनारस मज़दूरी करने जाता होगा, उसे कुछ दिन और रुकने के लिए कहा जा रहा होगा। औरतें अपनी ब्याही बेटियों को फोन कर रही होंगी—”आ जाओ, रोपनी में हाथ बँटाना है।”
कल साइकिल लेकर निकलूँगा। देखना चाहता हूँ कि एक दिन की बारिश ने गाँव का रंग कितना बदल दिया है। कहीं खेतों में ट्रैक्टर उतर आए होंगे, कहीं पौध उखाड़ी जा रही होगी, कहीं मेड़ पर खड़े किसान आकाश का मिज़ाज पढ़ रहे होंगे।
मानसून देर से आया है, पर लगता है कि उसने सबसे पहले खेतों को नहीं, लोगों के मन को सींचा है।
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