शांती की पोस्ट पर मेरे माता-पिताजी का लगाव


कल मैने शांती पर एक पोस्ट पब्लिश की थी. कुछ पाठकों ने ब्लॉगरी का सही उपयोग बताया अपनी टिप्पणियों में. मैं आपको यह बता दूं कि सामान्यत: मेरे माता-पिताजी को मेरी ब्लॉगरी से खास लेना-देना नहीं होता. पर शांती की पोस्ट पर तो उनका लगाव और उत्तेजना देखने काबिल थी. शांती उनके सुख-दुख की एकContinue reading “शांती की पोस्ट पर मेरे माता-पिताजी का लगाव”

समाज में तरक्की तो है – नेवस्टी गया है मोनू


शांती मेरे घर में बरतन-पोंछा करने आती है. जाति से पासी. नेतृत्व के गुण तलाशने हों तो किसी कॉरपोरेट के सीईओ को झांकने की जरूरत नहीं, शांती में बहुत मिलेंगे. एक पूरी तरह अभावग्रस्त परिवार को अपने समाज में हैसियत वाला बना दिया है. हाड़तोड़ मेहनत करने वाली. कभी-कभी सवेरे 4-5 बजे आ जाती है.Continue reading “समाज में तरक्की तो है – नेवस्टी गया है मोनू”

‘बना रहे बनारस’ – ये लो यूनुस लास्ट सुट्टा!


कल टिप्पणी में यूनुस छैलाइ गये. “बना रहे बनारस” का केवल झांकी दिखाना उन्हे एक सुट्टे के बाद बीड़ी छीन लेने जैसा लगा. अब पूरे 188 पेज की किताब पेश करना तो फुरसतिया सुकुल जैसे ही कर सकते हैं! फिर भी मैने अपनी पत्नी से विमर्श किया. वे बनारस की हैं. उनका विचार था किContinue reading “‘बना रहे बनारस’ – ये लो यूनुस लास्ट सुट्टा!”

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