अवधेश और चिरंजीलाल


मैं उनकी देशज भाषा समझ रहा था, पर उनका हास्य मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। पास के केवट थे वे। सवेरे के निपटान के बाद गंगा किनारे बैठे सुरती दबा रहे थे होठ के नीचे। निषादघाट पर एक किनारे बंधी नाव के पास बैठे थे। यह नाव माल्या प्वाइण्ट से देशी शराब ट्रांसपोर्ट काContinue reading “अवधेश और चिरंजीलाल”

रेत, वैतरणी नाला और बन्दर पांड़े


कभी कभी गठी हुई पोस्ट नहीं निकलती सवेरे की गंगा किनारे की सैर में। या फिर सन के रेशे होते हैं पर आपका मन नहीं होता उसमें से रस्सी बुनने का। पर सन के रेशों की क्वालिटी बहुत बढ़िया होती है और आप यूं ही फैंक नही सकते उन रेशों को। सो बनती है गड्डमड्डContinue reading “रेत, वैतरणी नाला और बन्दर पांड़े”

पकल्ले बे, नरियर!


पांच बच्चे थे। लोग नवरात्र की पूजा सामग्री गंगा में प्रवाहित करने आ रहे थे। और ये पांचों उस सामग्री में से गंगा में हिल कर नारियल लपकने को उद्धत। शाम के समय भी धुंधलके में थे और सवेरे पौने छ बजे देखा तब भी। सवेरे उनका थैला नारियल से आधा भर चुका था। निश्चयContinue reading “पकल्ले बे, नरियर!”

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