नेगोशियेशन तकनीक : धीरे बोलो, हिन्दी बोलो


मैं अपनी बताता हूं. जब मैं आवेश में होता हूं – भाषण देने या ऐसी-तैसी करने के मूड़ में होता हूं तो अंग्रेजी निकलती है मुंह से. धाराप्रवाह. और जब धीरे-धीरे बोलना होता है, शब्दों को तोल कर बोलना होता है तब हिन्दी के सटीक शब्द पॉपकॉर्न की तरह एक-एक कर फूट कर सामने आतेContinue reading “नेगोशियेशन तकनीक : धीरे बोलो, हिन्दी बोलो”

क्या केवल जुनून काफी है जीने के लिये?


एक उमर थी जब इब्ने सफी, बी.ए. की जासूसी दुनियां सबेरे पहले पीरियड में शुरू करते थे और तीसरे पीरियड तक खतम हो जाती थी. किराये वाली दुकान से आधी छुट्टी में दूसरी लाते थे और स्कूल से लौटते समय तक वह भी समाप्त हो जाती थी. सातवीं-आठवीं कक्षा में जुनून था जासूसी उपन्यास का.Continue reading “क्या केवल जुनून काफी है जीने के लिये?”

अज़दक, बुढ़ापा और ब्लॉगरी की मजबूरी


जबसे अज़दक जी ने बूढ़े ब्लॉगर पर करुणा भरी पोस्ट लिखी है, तब से मन व्यथित है. शीशे में कोई आपका हॉरर भरा भविष्य दिखाये तो और क्या होगा! इस तरह सरे आम स्किट्सोफ्रेनिया को बढ़ावा देने का काम अज़दक जैसे जिम्मेदार ब्लॉगर करेंगे तो हमारे जैसे इम्पल्सिव ब्लॉगर तो बंटाढ़ार कर सकते हैं. उनकेContinue reading “अज़दक, बुढ़ापा और ब्लॉगरी की मजबूरी”

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