सुखी जीवन के सूत्र की सिनर्जी


 परसों मेरी पोस्ट के पुछल्ले से   एक जबरदस्त सिनर्जेटिक (Synergetic – combined synchronous and energetic) काम हुआ। मैने एक   पॉवर प्वाइण्ट शो पोस्ट पर   प्रस्तुत किया और उसे रवि रतलामी जी ने   वीडियो कन्वर्टर   के माध्यम से   वीडियो बना कर   आनन-फानन में पोस्ट की शक्ल दे दी। मैंContinue reading “सुखी जीवन के सूत्र की सिनर्जी”

यह ब्लडी पसन्दगी की जरूरत


अजीब बात है; पोस्ट लिखने पर वाह-वाह की टिप्पणियों की चाह चाह नहीं जरूरत बन गयी है और कब बनी, पता न चला। चाह और जरूरत में अंतर है। यह दुष्ट सेल्फ-अप्रूवल सीकिंग मन सड़ल्ला है। बड़ी जल्दी कमजोर बन जाता है। चाह को जरूरत (want को need) में बदल देता है। हमारे नेताओं में;Continue reading “यह ब्लडी पसन्दगी की जरूरत”

ज्यादा पढ़ने के खतरे(?)!


अभय तिवारी ने एक ताजा पोस्ट पर ठेला है कि उनकी पत्नी तनु उनसे ज्यादा किताबें पढ़ती हैं। यह मुझे भीषण भयोत्पादक लगा। इतना कि एक पोस्ट बन गयी उससे। “डर लगे तो पोस्ट लिख के सिद्धांतानुसार”। मैं अगर दिन भर की सरकारी झिक-झिक के बाद घर आऊं और शाम की चाय की जगह पत्नीजीContinue reading “ज्यादा पढ़ने के खतरे(?)!”

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