अण्टशण्टात्मक बनाम सुबुक सुबुकवादी पोस्टें


हमें नजर आता है आलू-टमाटर-मूंगफली। जब पर्याप्त अण्टशण्टात्मक हो जाता है तो एक आध विक्तोर फ्रेंकल या पीटर ड्रकर ठेल देते रहे हैं। जिससे तीन में भी गिनती रहे और तेरह में भी। लिहाजा पाठक अपने टोज़ पर (on their toes) रहते हैं – कन्फ्यूजनात्मक मोड में कि यह अफसर लण्ठ है या इण्टेलेक्चुअल?! फुरसतियाContinue reading “अण्टशण्टात्मक बनाम सुबुक सुबुकवादी पोस्टें”

संकठा प्रसाद लौट आये हैं


आजकल मौसम सुहाना हो गया है। मेरी सासू मां ने सवेरे की पूजा और शंखद्वनि के बाद सैर पर जाना शुरू कर दिया है। लोगों से बतियाती घर में घुसती हैं सैर के बाद। और कोई न कोई खबर ले कर आती हैं। श्रीमती रीता पाण्डेय की; फुरसतिया सुकुल के उकसाने पर, तुरत-फुरत लिखी एकContinue reading “संकठा प्रसाद लौट आये हैं”

किधर?


जो भी है, बड़ी फैसिनेटिंग है! प्री-पोस्ट त्वरित टिप्पणी – कर दो पोस्ट। क्या फरक पड़ता है। तुम सब आधे दिमाग के लोग हो – रीता पाण्डेय। (लिंकित पोस्ट पर जाने के लिये चित्र क्लिक करें)

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