बरियापुर और नीलकंठ की रचना क्यों?


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बहुत से लेखकों ने अपनी रचनाधर्मिता के लिये पात्र और स्थान रचे हैं। आर के नारायण ने मालगुड़ी की रचना की। मालगुड़ी बंगलोर के दो स्थानों मल्लेश्वरम और बसवानगुड़ी का फ्यूज़न है। मालगुड़ी बनाया और साथ में ढेरों पात्र आये। उन सब के माध्यम से आर के नारायण वह लिख पाये जो उनकी सोच में थे, पर उन्हें लेखन में अन्यथा नहीं उतार सकते थे या उतने सहज न हो पाते ।

इसी तरह के अनेक उदाहरण होंगे। श्रीलाल शुक्ल ने शिवपालगंज बनाया और उसके जरीये उनके ढेरों रागदरबारी के पात्र जीवंत हो उठे। इतने जीवंत कि लोग देस के नक्शे पर शिवपालगंज तलाशने लगे हैं। किसी को लगता ही नहीं कि शिवपालगंज श्रीलाल शुक्ल जी की मानसिक भौगोलिक इकाई है।

स्थान और पात्र रच कर लेखक वर्जनामुक्त हो जाता है। बहुत कुछ जो वह देखता, समझता है, वह वास्तविक पात्रों के माध्यम से नहीं कह सकता। वह करने पर बहुत से विवाद जन्म लेंगे। अनावश्यक पचड़े में पड़ने की आशंकायें आयेंगी। अगर मैं अपने रेलवे या गांव के अनुभवों के बारे में लिखूं तो बहुत से लोग होंगे जिन पर की गई टिप्पणी या रखे गये विचार भले सही हों, पर उनको अप्रिय लग सकते हैं। पर वही सब अगर नीलकंठ एक नये स्थान पर रहते हुये – मालगुड़ी या शिवपालगंज की तरह का स्थान और काल्पनिक पात्रों के साथ – कहे तो वह समस्या हल हो जाती है।

अगर नीलकंठ एक ऐसे पात्र या घटना की रचना करे जो पूर्णत: गल्प हो और सचाई का अंश ही न हो तो वह कलई उधड़ ही जायेगी। एक सीमा तक नीलकंठ अपनी कल्पना उड़ा सकता है, उससे आगे नहीं।

यह सब समझते हुये मैं नीलकंठ और उसके वातावरण की रचना करूंगा। नीलकंठ तो मेरी तरह रिटायर्ड अधिकारी है। रीवर्स माइग्रेशन कर गांव में रहने आया है। वह अकेला है। शादी नहीं की। इस तरह उसका परिवार रचने के दायित्व से मैं बच गया हूं। नीलकंठ मुझसे ज्यादा मुक्त है।

वह पूर्वी उत्तरप्रदेश के गंगा किनारे के गांव बरियापुर में रिटायरमेंट के बाद रहता है।

यह बरियापुर कैसा है, नीलकंठ वहां कैसे आया वह और क्या करेगा – यह सब कथानक का अंग होगा। जैसे जैसे कथा, या ब्लॉग पोस्टें आगे बढ़ेंगी, उन सब को रंग देने होंगे।

अब देखते हैं कैसे चलता है यह रचना प्रयोग। आर के नारायण या श्रीलाल शुक्ल जी ने तो पुस्तक लिखने के बाद लोकउजागर की। नीलकंठ नियमित ब्लॉग के जरीये सामने आयेगा; वह इसलिये कि पुस्तक लिखना मुझे आता नहीं! कम से कम अभी तो नहीं आता।

बरियापुर का नीलकंठ

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आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा — दिन 3


आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा — दिन 3 : तहरी, त्रिपुंडी और चितलंगिया का दालान

नीलकंठ की ई-मेल समय पर थी। छ बजे सवेरे। वह ज्यों का त्यौं नीचे है –


सवेरे नींद एकदम समय पर टूटी — चार बजे। यह अजीब है कि बाहर खुले में नींद पहले से बेहतर आती है। मन भी हल्का था और शरीर भी। नर्मदा किनारे की हवा में जैसे कोई ‘अदृश्य प्रार्थना’ हर पल बह रही हो।

स्नान खुले में करना था, पर हैंडपम्प कल ही जवाब दे गया था। प्रधान ने बताया था — “पाइप नीचे से टूट गया है, बैगा लोग आएंगे तो खुदवाना पड़ेगा।”

उसी समय सुदामा दो बाल्टी पानी लिए हाज़िर। जैसे कोई किला तोड़ लाया हो।
साथ में मुस्कराहट और एक समाचार —

“भाभी कोदों की तहरी बना रही हैं। ताजा मटर भी पड़ी है उसमें। साथ में आप दही लेंगे या छाछ?”

मैंने पूछा — “कौन भाभी?”

सुदामा ने हँसते हुए बताया कि प्रधान का लड़का जबलपुर में रेलवे में क्लर्क है। उसकी पत्नी गांव में रहती है — सास-ससुर की सेवा में। “अब जब क्वाटर मिल जाएगा, तो चली जाएगी। तब तक मेरी तो भाभी ही हुई न!”

सुदामा आत्मीय लड़का है। स्वभाव से ही अपना बनाने वाला। हर किसी को रिश्ते में बदल देता है — कोई मामा बन जाता है, कोई दादा। शायद यही उसकी सबसे बड़ी योग्यता है — “लोकसंग्रही सरलता।”

“सर, मैं आपको सर बोला करूं कि बाबा?”

“बहुत चालाक हो सुदामा! बाबा कहोगे तो मुझे बाबा बनना पड़ेगा। फिर किसी दुकान पर खर्चे का ‘चौथाई नियम’ खत्म हो जाएगा। ठीक है?”

सुदामा हँसकर बोला — “जब मन करेगा, आप सर होंगे, जब मन करेगा बाबा। सुविधा के साथ रिश्ता बदलना चाहिए न!”

भाभी की तहरी बेमिसाल थी। मोटा अनाज, हल्की सी खुशबू — मटर के साथ भुने मसालों का धीमा राग।
तहरी ने देर तक भूख नहीं लगने दी। निकलते-निकलते नौ बज गए।

बेना, बैगा और सड़क का संगीत
सुदामा के हाथ में एक बांस का बेना था।

“भाभी ने दिया है। बैगा औरत आई थी — वही चार पंखे लाई थी। प्रधान जी से पूछकर भाभी ने हमें दे दिया। बहुत सुंदर लगा, तो झिझका नहीं।”

वह बेना बैगाओं के गोंडी सौंदर्यबोध का नमूना था — किनारे पर रंगीन धागों की कढ़ाई, बांस की रेखाओं में जैसे गीत उकेरे गए हों।

सड़क सँकरी थी, लेकिन जैसे धूप और छाया मिलकर उसके दोनों कंधों पर चल रही हो।
कभी ढलान, कभी चढ़ाई — पर थकान नहीं। कहीं-कहीं नीम की छाँव, कहीं महुआ की गिरती पत्तियाँ।

त्रिपुंडी महराज और चाय का आश्रम

जुनवानी गाँव पड़ा। मंदिर का नाम नहीं देखा, पर प्रवेश द्वार पर त्रिपुंड लगाए एक सज्जन ने ऊँची आवाज में कहा —

“नर्मदे हर! भाई जी, चाय पीते जाइए।”

नेकी और पूछ-पूछ!
हम दोनों के ब्रेक वहीं लगे।

चाय की केतली पत्थर की चूल्हे पर चढ़ी थी।
सुगंध ने आने से पहले ही आगोश में ले लिया — दालचीनी, लौंग, इलायची और एक अपरिचित घास…

“एक घास है कुशा जैसी। कभी चायपत्ती न हो तो वही पीता हूँ।” महराज बोले।

हाथ में लिया, सूंघा — वह लेमनग्रास थी। महक गाढ़ी थी, पर ज़हर सी नहीं। शांत करती।

आधा घंटा वहां बीता — चाय के साथ उनके किस्से भी घुलते रहे।
उन्होंने बताया कि वे कभी साधु नहीं बने, पर ‘श्रद्धा में स्थायी ठहराव’ पा चुके हैं।

इस पोस्ट को बनाने में चैट जीपीटी से संवाद का योगदान रहा है।

चितलंगिया और मारवाड़ी दालान

दोपहर तीन बजे ‘मारवाड़ी गाँव’ पहुँचे। गाँव बिखरा था — जैसे कोई लंबा स्वप्न, जो नर्मदा की धार के साथ बह रहा हो। पक्के मकान थे, पर कुछ ने खपरैल की जिद अब भी नहीं छोड़ी थी।

एक बड़े खपरैल वाले घर के सामने खड़े सज्जन ने आवाज दी —

“आप नर्मदा यात्री हैं? आइए, थोड़ा आराम कर जाइए।”

वे थे गिरीश चितलंगिया। साठ के करीब उम्र, धोती-कुर्ता में अपनेपन की झलक।
बताया कि उनके दादाजी जोधपुर से कारोबार के सिलसिले में आए थे, पचास साल पहले। अब यही गाँव उनका वतन है।

“फागुन में पुष्कर जाना है — कुलदेवी नौसर माता के दर्शन के लिए। एक मनौती है जो पूरी हुई है।”

हमने आज की यात्रा विराम की सोची। उन्होंने दालान का एक कमरा दे दिया — चटाई बिछी थी, दीवार पर गोबर से बनी मांडना की आकृति अब भी कुछ-कुछ झलक रही थी।

शाम की चाय वहीं मिली। खाना भी बना ही था — बाजरे की रोटी, मूंग की दाल और गुड़।

घाट पर संध्या

शाम को हम दोनों मारवाड़ी गांव के नर्मदा के घाट पर पहुँचे।

घाट पक्का बना हुआ था — पत्थर की सीढ़ियाँ थीं, पर कई जगह ईंटों के पैबंद थे।
वो पैबंद इतने करीने से लगे थे कि लगता — जैसे कोई माँ फटी ओढ़नी को ऐसे रफू कर दे कि कोई देखे तो कहे — “कपड़ा भले पुराना हो, पर आदर से संभाला गया है।”

नदी शांत थी, पर उसकी आँखों में दीया झिलमिला रहे थे।
सुदामा ने घाट की सीढ़ियों पर बैठ कर कुछ नहीं कहा — बस पैर जल में डाले और चुपचाप आसमान की ओर देखता रहा।

“तीसरे दिन की यात्रा में सुदामा की चतुराई, ‘भाभी’ की तहरी, त्रिपुंडी की चाय, और चितलंगिया का दालान — सब मिलकर यात्रा नहीं, एक गृहस्थ तीर्थ बन गए।”

आज हम सड़क से चले, ज्यादा नहीं चले। कुल 13-14किलोमीटर। पर यात्रा की आशंका और झिझक कम हो गई है। अब घने जंगल में भी धंसे तो छटपटायेंगे नहीं। और घने जंगल से बच कर चलना तो ध्येय है ही नहीं।

– तुम्हारा, नीलकंठ चिंतामणि

नीलकंठ और सुदामा, मारवाड़ी घाट, नर्मदा किनारे
नीलकंठ और सुदामा, मारवाड़ी घाट, नर्मदा किनारे

वनतुलसी की गंध, बांस का पुल, बघेरे की आहट और गेंहुअन का भय


नीलकंठ की आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा दिन 2

सवेरे आंख खुली तो सब कुछ चुप था। रात की जद्दोदहद याद आई। रात में बांई ओर नर्मदा की धारा थी, और दाहिने – मच्छरों का मोर्चा। टॉर्च की रौशनी में ओडोमॉस की ट्यूब निकाल मैने उसे सारे खुले अंगों पर मला था। तब जब मच्छरों ने युद्धविराम कर दिया तो नींद गहरी आई।

सुदामा मुझसे पहले जाग गया था। गांव में घूम कर लौट आया था और बताने लगा – “आज बारात आने वाली है। प्रधान जी कह रहे थे – रुक जाइये। स्वादिष्ट भोजन भी मिलेगा, और डिंडोरी से आया बाजा वालों का कार्यक्रम भी।”
पर जब यात्रा ही अभी शुरू हुई हो, तब यूं एक दिन रुक जाना क्या उचित है? आठ बजे तक हम दोनों चल पड़े।

शिव मंदिर के बाबा जी ने बाहर खड़े होकर हमें दो दो गिलास मीठा मट्ठा पिलाया — जैसे मां परीक्षा के दिन दही-चीनी देती है। बाबा की आंखों में वही वात्सल्य था। हमें कोई वरदान नहीं मिला, पर वह मट्ठा उसी का काम कर गया।

अगे रास्ता कच्चा, पर अपनी ओर खींचता हुआ था।
कहीं-कहीं झाड़ियां इतनी सघन थीं कि सुदामा मेरी छड़ी लेकर आगे चला — “अगर कोई नाग हो, तो पहले मुझे देख ले!”

हँसते हुए मैंने कहा – “देख लेगा, तब भी भागेगा नहीं। वह तुलना करने लगेगा कि कौन सुंदर है – वो या सुदाम।”

वनतुलसी की गंध कई किलोमीटर तक फैल रही थी।
उस गंध में एक ऐसी निश्छलता थी जैसे मां के आंचल में बसी कपूर की गंध। दो किलोमीटर तक वन तुलसी थी, फिर जंगल आया — और सागौन की छाया।

सागौन अकेले जीता है — उसकी छाया में और कुछ नहीं पनपता। शाल के वन होते तो सघन विविधता मिलती। मैने सोचा, ये दो वृक्ष भी समाज की तरह हैं — कोई आत्मकेंद्रित, कोई सहजीवी।

बीच में कटे हुए पेड़ भी मिले। कोई अवैध कटाई करता होगा। सतपुड़ा का यह इलाका कभी दण्डकारण्य था। तब राक्षसों के नाम और रूप अलग थे। अब उनका पेशा है – पेड़ काटना और बेचना।

रामपुरी गांव आया, पर वहां सन्नाटा था। कोई चाय दुकान नहीं मिली।

आगे चलकर किसलपुरी में एक छोटी सी गुमटी दिखी — गर्म भजिये बन रहे थे।
“महराज, चना महंगा हो गया है। ये मटर का बेसन है। झूठ नहीं बोलूंगा।” – दुकानदार ने जैसे साक्षात्कार दिया हो।

सुदामा ने दो दोने भजिये खाए। मैंने एक ही लिया।
चाय भी अच्छी बनी थी।

पैसे देने की बात आई तो सुदामा जेब से हाथ डालने लगा।
मैंने कहा – “बेटा, तू मज़दूरी पर है और मैं पेंशन पर। पेमेंट में तीन हिस्से मेरा, एक हिस्सा तेरा।”
थोड़ी हिचक हुई, फिर सुदामा मान गया।
अब ये यात्रा का नियम बन गया।

दोपहर हो चली थी। किसलपुरी गांव वाले बोले – “महराज, एक घंटा रुको तो सही। हम प्रसादी बनाएंगे।”
पर जब भोजन अभी बना नहीं था, तो एक घंटे रुकने का मन न हुआ। हम रुकने को तैयार न हुये तो गांव के प्रधान ने कहा – “ऐसे कैसे जाने देंगे? ये रखिये कुछ फल।”
छः केले एक अखबार में लपेटकर थमा दिये।

सुदामा ने मुस्करा कर समेटने में देर न लगाई — जवान पेट की बात है! कहीं प्रधान का मन पलट जाये तो!

आगे एक पुलिया मिली — वहीं बैठ हमने सत्तू और केले खाए।
तीन-तीन केले खा गये हम दोनों! सब निपटा दिये। चलने पर भूख तो लगती है।

अब रास्ता चढ़ाई पर था। बाईं ओर एक पतली नदी साथ हो ली थी।
कहीं-कहीं पहाड़ी से पानी गिरता भी दिखा, झरने के रूप में।

कई मोड़ों के बाद नदी थोड़ी चौड़ी हो गई — झील जैसी। झील में मछली पकड़ते एक लड़के ने बताया – “आगे बांस का पुल है। उसे पार करेंगे तो खैरदा गांव मिलेगा।”

बांस का पुल था, पर पुल कम, साहस की परीक्षा ज्यादा था।
पार करके जब पहाड़ी चढ़ी, तो सामने चरवाहा दिखा — बीस गायों के साथ।
गायों के गले में बड़ी बड़ी घंटियां बंधी थीं। उसने बताया – “बघेरा आता है इस वन में, इन घंटियों की आवाज से डर कर दूर रहता है।”

सुदामा चौंका — “तुमने बघेरा देखा है कभी?”
“देखा क्यों नहीं। मादा है। तीन बच्चे भी हैं।”
उसने कहा जैसे किसी गली के कुत्तों की बात कर रहा हो।

इस पोस्ट को बनाने में चैट जीपीटी से संवाद का योगदान रहा है।

हम थोड़ा सतर्क हो गये। पर उस लड़के की आंखों में डर नहीं था।
बघेरा हमारे लिये भय था, उसका तो रोज का पड़ोसी था। जिससे उसकी पक्की जानपहचान थी। क्या पता बघेरे का कोई नाम भी रख दिया हो उसने।

रात को खैरदा के प्रधान जी के दालान में विश्राम मिला।
उन्होंने समझाया — “बाड़ के बाहर न निकलना। बाघ बाड़ पार कर नहीं आयेगा। यूं दालान के कमरे में रह सकते हैं आप। पर उसमें एक दिक्कत है। उसमें चूहे के बिल हैं और कभी महराज जी आ जाते हैं उनकी तलाश में।”

मैंने पूछा – “महराज जी?”

“गेंहुअन सांप। पुराने निवासी हैं। यहां के।” मैं समझ गया। यह दण्डकवन नागों की धरती रहा है।

क्या द्वैत है – बघेरा बाहर, महराज जी भीतर। दो रूप हैं, पर जीवन का भय एक ही है! तय किया – फिर तो खुले में ही अच्छा है। बघेरे ने पकड़ा तो उसको दो दिन का भोजन तो मिलेगा। नाग तो हमारे शरीर को किसी लायक नहीं छोड़ेगा।

प्रधान जी की बहू ने खाना दिया। सादगी में स्वाद था। कुछ ज्यादा ही खाया हमने।

फिर हमने रामनाम जपा। सुदामा ने मेरे पैर दबाए और नींद उतर आई —
जैसे किसी वनतुलसी के पौधे ने थपकी दी हो।

इस दिन हम पंद्रह किलोमीटर चले। जंगल में या जंगल किनारे। सवेरे आठ बजे निकले और शाम छ बजे खैरदा पंहुचे। आज नर्मदा तट पर नहीं गये दिन में, पर नर्मदा की गंध सतत बनी रही।
नर्मदे हर!

आपका नीलकंठ

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नीलकंठ, सुदामा और खैरदा के प्रधान जी।
नीलकंठ, सुदामा और खैरदा के प्रधान जी।

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