मोतलसिर से घाट पिपल्या तक – जहां हर नदी, हर मछेरा और हर महंत अपनी-अपनी परिक्रमा रचते हैं।


मोतलसिर में एक दिन और रुकने की बजाय सवेरे निकल लिये प्रेमसागर। दिन भर में करीब उन्नीस किलोमीटर चले। शाम घाट पिपल्या के एक नवलधाम आश्रम में डेरा जमाया।

सवेरे मोतलसिर के पास नर्मदा घाट पर कुछ समय गुजारा। सूर्योदय के समय मन के विचार भी सिंदूरी थे। नर्मदा मां से पूछ रहे थे प्रेमसागर – मां, मैं आपकी पदयात्रा में निकला हूं तो आपने बीमार कर रोक काहे लिया?

मोतलसिर के नर्मदा तट का सवेरा

मुझे उनकी यह आंतरिक बातचीत समझ नहीं आती। परिक्रमा नर्मदा को आत्मसात करने की होनी चाहिये। वह कोई परिक्रमा-मैराथन नहीं होनी चाहिये। मुझे अलग मेरी मनयात्रा के लिये प्रेमसागर कच्चा माल या उत्प्रेरक सामग्री न दे रहे होते तो मैं उनका साथ न निभाता। पदयात्रा का चरित्र धीमा होना चाहिये। जितना धीमा प्रेमसागर कल्पना कर सकते हैं, उससे लगभग दुगना धीमा।

मेरी नर्मदा ऐसा ही कहती हैं। प्रेमसागर की नर्मदा कुछ और कहती हों तो वे जाने। मुंडे मुंडे नर्मदा भिन्ना! हर व्यक्ति के लिये नर्मदा परिक्रमा अलग अर्थ रखती है। मेरे लिये जो रखती है, वह प्रेमसागर की कल्पना से मेल नहीं खाता।

असमंजस में रहे होंगे शुरू में प्रेमसागर। फिर नर्मदा तट से आश्राम लौट कर महंत जी से बात की और उनसे अनुमति मांग ली निकलने के लिये।

“भईया आश्रम के महंत राम सुमिरन दास जी हैं। उम्र करीब 41 साल है। अजुध्या (अयोध्या) के शिक्षा पाए हुए हैं। मेरे गुरु, अयोध्या वासी रामसुमिर दास जी को जानते हैं। कल शाम उनसे बात हुई तो पहचान निकल आई। आपका ब्लॉग पढ़े तो बोले यह बहुत अच्छा है। सनातन की बहुत सेवा कर रहे हैं ब्लॉग लिखने वाले। ऐसा काम तो गीता प्रेस ही करता है।”

रामसुमिरन दास जी दो साल से यहां मोतलसिर में हैं। वे तीन बार नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। परिक्रमा के दौरान ही उन्होने चिन्हित किया था कि इस जगह पर परिक्रमावासियॉ के लिये सुविधायें नहीं हैं। तभी उनके मन में यहां सदाव्रत केंद्र खोलने विचार आया था।

एक माता जी से चार लाख में उन्होने जमीन खरीदी है और आश्रम बनाने में पंद्रह महीने और बीस लाख रुपये लग चुके हैं। इमारत खड़ी हो गयी है, पर कुछ पुताई और बिजली का काम बाकी है। इमारत का काम हो गया है तो रामसुमिरन दास जी ने बगवानी भी कर डाली है। सुरुचिपूर्ण चरित्र लगते हैं रामसुमिरन दास जी!

मोतलसिर से निकलते समय की बिना पूछे कैफियत दी प्रेमसागर ने – मौसम ठंडा हो गया है भईया। रात में आंधी पानी था। अभी भी बादल घेरे हैं। आज दिन में बारह बजे तक चलूंगा। जितना चल सकूंगा, उतना।”

थोड़ी देर बाद बाड़ी या बरना नदी पड़ीं। रायसेन जिले की ही नदी है बरना। उसकी शुरुआती यात्रा में ही बरना डैम पड़ता है। करीब एक किलोमीटर लम्बी झील नक्शे में दिखती है। नर्मदा संगम के पहले भी नदी में पानी पर्याप्त है, पर बहुत चौड़ी नहीं है। एक जगह लोहे के एंगल्स से वैलिंग किये पटरों का पुल था। वह बीच से टूट गया है। पुल के जरीये नदी पार नहीं की जा सकती। मैंने उस जगह के पुराने चित्र और वीडियो देखे तो परिकम्मावासी पुल से नदी पार करते दिखे।

बरना नदी का पुल

कैसे पार किया नदी को? कूद कर? – मैंने प्रेमसागर से पूछा। “नहीं भईया, एक मछेरे ने आ कर सहायता की। घुटनो भर पानी था। उसने हाथ पकड़ कर पार कराया।”

मैंने न पूछा होता तो मछेरे या घुटनों भर पानी की बात सामने आती ही नहीं। कौन था मछेरा? तुम चरित्र उकेरो जीडी!

$$ ज्ञानकथ्य – अथ बंटी मछेरा आख्यान

बंटी मछेरा। पुरानी टीशर्ट और नीचे एक लम्बा गमछा पहने है। कांधे पर छोटी मछली पकड़ने वाला जाल लिये था। शायद अभी जाल फैका नहीं था कि बाबाजी को असमंजस में देख लिया और पास चला आया। “का हो बाबाजी, कहाँ अटक गये?” बोलते उसके सफेद दांत चमक गये।

प्रेमसागर सामान्यत: अकड़ में रहते हैं। सहायता मांगना उनकी प्रवृत्ति का अंग नहीं। उन्होने कुछ ऊं-आं की।

“घुटने भर पानी है, पर कहीं आप रपट जाओगे अगर नदी की इज्जत नहीं करोगे, बाबाजी। नदी का तल्ला चिकना है। आप मेरे कंधा पर हाथ धरिये… डूबने न दूँगा।” उसने आगे पानी की थाह लेते लेते बाबाजी को नदी पार कराई।

बंटी ने अपने जाल का नाम रखा है – बंसी। उसका अपना नाम किसनलाल सनवानी। कृष्ण की बंसी बनी उसका जाल। अपने जाल से अपनापा है उसे। तभी नाम से बुलाता है, वर्ना जाल का भी कोई नाम होता है?

सोलह साल का है बंटी। काला रंग। काल भुजंग नहीं है, कुछ कम काला है। शादी नहीं हुई। पिता नहीं रहे। वह है और मां है घर में। परिकम्मावासियों को रोज देखता है और उससे जो बन पड़ता है, सहायता करता है। पुल की मरम्मत तो सरपंच जी चौमासा बीतने के बाद करायेंगे। तब तक वह लोगों की मदद करता रहेगा बरना पार कराने में!

वह खुद तो परिक्रमा करने जा नहीं सकता मां को छोड़ कर, तो परिकम्मा वासियों की मदद करना ही उसकी परिकम्मा है।

वीडियो से निकाला बरना का चित्र। डेढ़ साल पुराना है।

आगे एक और नदी पड़ी। तेंदोनी नदी। प्रेमसागर ने नाम लिख भेजा तंदूरी नदी। यह भी रायसेन जिले में है। इसका पाट चौड़ा था और पुल भी खूब बड़ा। पर नदी में पानी नाम मात्र को कहीं कहीं छोटे छोटे तालों में था। मानो गया के पास वाली फाल्गू नदी हो। इसको देख कर लगता है कि बारिश के मौसम में तेज बहने वाली हो जाती होगी तेंदोनी।

दो बजे तक चले प्रेमसागर, तब सदावृत नवल धाम आया। गांव का नाम है घाट पिपल्या। नर्मदा किनारे। सारंग जी कोई मंत्री हैं मध्यप्रदेश के। आज से कोई दस बारह साल पहले उन्होने यहां परिकम्मा वासियों की सेवा के लिये यह सेवाश्रम बनवाया। जमीन नहीं मिल रही थी नर्मदा किनारे तो माधोसिंह पटेल जी ने बीस एकड़ जमीन उन्हें बेची। उस बीस एकड़ में पांच में आश्रम बना है और बाकी में खेती होती है। खेती से आश्रम का खर्च चलता है।

शाम को माधोसिंह जी वहां अन्य लोगों के साथ बैठे थे। वे अक्सर चले आते हैं। सारंग जी ने अपना मकान बनाया है, पर घाट पिपल्या में रहते कम ही हैं।

“आश्रम में केवट जी मुझे आसन और चाय पानी दे कर गये हैं। बोले कि उनके खेत में मूंग की फसल है। वहां काम देख कर वापस आयेंगे तब शाम की परसादी (भोजन) बनायेंगे।” प्रेमसागर ने बताया।

“जगह अच्छी है भईया। सुविधा सब है। माई के किनारे भी है यह जगह। मौसम भी ठीक हो गया है। अब कोई तकलीफ नहीं है।”

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

नर्मदे हर!! #नर्मदाप्रेम #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक


कौन है इठलाती, बल खाती, नाचती नदी – नर्मदा या गंगा?


प्रेमसागर नर्मदा किनारे चल रहे हैं और मेरा काम उनका यात्रा मार्ग निहारना हो गया है। नक्शे में देखता हूं, नर्मदा सीधे नहीं चल रहीं, घुमावदार बल खाती चलती हैं। यही नर्मदा का सौंदर्य है जिसका बखान वेगड़ सौंदर्य की नदी नर्मदा में करते हैं?

पुस्तक के प्रारम्भ में अमृतलाल वेगड़ जी कहते हैं – नर्मदा सौंदर्य की नदी है। यह नदी वनों, पहाड़ों और घाटियों से बहती है। मैदान इसके हिस्से में कम ही आया है। यह चलती है इतराती, बलखाती, वन प्रांतरों में लुकती छिपती, चट्टानों को तराशती, डग डग पर सौंदर्य की सृष्टि करती, पग पग पर सुषमा बिखेरती। (सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतलाल वेगड़। पृष्ठ 1 अध्याय – जबलपुर से मंडला।)

इतराना, बलखाना क्या होता है? क्या वह सर्पिल (घुमावदार) गति होता है? जैसे नर्तकी सीधा कदमताल करते नहीं चलती, घूमते लचकते चलती है। पर क्या नर्मदा सीधे सपाट कम, बल खाती ज्यादा चलती हैं? क्या अन्य नदियों की तुलना में उनका बलखाना कहीं ज्यादा है?

नदी के इठलाने बलखाने के लिये एक साइंटिफिक पैरामीटर है – सिनुओसिटी इंडेक्स (Sinuosity Index)। यह निम्न प्रकार से परिभाषित होता है –

सिन्युओसिटी इंडेक्स = सर्पिल मार्ग की दूरी / दोनो छोर के बिंदुओं की सीधी दूरी

यह इंडेक्स जब 1.0 से 1.2 के मध्य होता है तब नदी लगभग सीधी मानी जाती है। अगर यह इंडेक्स 1.2 से 1.5 के बीच होता है तो नदी घुमावदार या मियेंडरिंग (Meandering) मानी जाती है। इस इंडेक्स के 1.5 से अधिक होने पर नदी अत्यधिक घुमावदार (Highly Meandering) कही जाती है।

प्रेमसागर की नर्मदा पदयात्रा और प्रयाग से वाराणसी के बीच (वर्चुअल) गंगा पदयात्रा की तुलना करने का मन हो आया। कौन नदी ज्यादा सर्पिल है, ज्यादा घुमावदार, ज्यादा मियेंडरिंग?

मैंने तुलना करने के लिये निम्न अंतिम बिंदु चुने गंगाजी और नर्मदा माई पर –

नर्मदा जी के बल खाने को नापने के लिये मैंने सर्पिल मार्ग को मैप किया। तवा संगम से सक्कर संगम तक। जितने ज्यादा बिंदु चुने, उतनी ही सही मैपिंग हुई नदी की।

गंगा – प्रयाग त्रिवेणी संगम से अस्सी घाट वाराणसी।

नर्मदा – नर्मदापुरम से पहले नर्मदा-तवा नदी का संगम से सोकलपुर के पास नर्मदा-सक्कर नदी का संगम।

मैंने दोनो उदाहरणों के लिये गूगल मैप पर उनके सर्पिल पाथ को मैप किया और कुल दूरी निकाली –

नदी अध्ययन का खंड सर्पिल मार्ग की लम्बाई किलोमीटर सीधी लम्बाई किलोमीटरसिनुओसिटी इंडेक्स
नर्मदा नर्मदा-तवा नदी का संगम से नर्मदा-सक्कर नदी का संगम133.9196.521.387
गंगा प्रयाग त्रिवेणी संगम से अस्सी घाट वाराणसी190.93112.791.693
गंगाजी की सर्पिल यात्रा मैप करने के लिये गूगल मैप पर ये बिंदु लगाये।

उक्त आंकड़ों से नर्मदा जी और गंगा जी की सिनुओसिटी क्रमश: 1.387 और 1.693 निकली। नर्मदा घुमावदार हैं पर गंगा अत्यधिक घुमावदार हैं।

नदियां पहाड़ों में लगभग सीधी रेखा में बहती हैं। ऊंचाई से नीचे आने में कूदती हैं – प्रपात बनाती हैं। गोमुख से हरिद्वर के बीच गंगा भी वह करती हैं और अमरकंटक से नीचे उतरने में नर्मदा भी। मैदान मिलने पर दोनो नदियां अपने वेग से धरती को काटती हैं और दूसरी ओर मिट्टी जमा करती हैं। इससे घुमावदार बहना होता है और बड़े मोड़ और गोखुर (Oxbow) झीलें बनती हैं।

Oxbow Lake an example from Wikipedia

गंगा जी हरिद्वार के बाद यह करती हैं और नर्मदा भी मैदान में उतरने पर यह करती हैं। फर्क यह है कि गंगा को बहुत विस्तृत गांगेय मैदान मिलता है सर्पिल घुमाव के लिये पर नर्मदा सतपुड़ा तथा विंध्य के बीच एक संकरी रिफ्ट घाटी में ही थोड़ा बहुत घूम पाती हैं। नर्मदा जी को इठलाने बलखाने को ज्यादा जगह विंध्य और सतपुड़ा से घिरा रंगमंच प्रदान नहीं करता।

नर्मदा एक अपेक्षाकृत सीधी बहने वाली नदी है। इसी कारण से, यह पश्चिम की ओर बहती हुई भी अपने मुहाने पर कोई बड़ा डेल्टा नहीं बनाती, बल्कि एक ज्वार-नद-मुख (estuary) बनाती है, क्योंकि अवसादों को जमा करने के लिए पर्याप्त मोड़ और धीमा बहाव नहीं मिलता। इनके उलट गंगा का एक विशाल गंगासागर-सुंदरवन का डेल्टा है।

भारत की सभी बड़ी नदियों में (जिनमें सिंधु भी शामिल है); नर्मदा सबसे सीधी बहती नदी है!

नर्मदा जी के सौंदर्य को मैं कम नहीं कर देखना चाहता। वह तो अप्रतिम है। पर नदी का सर्पिल चलना, वह मैंने गंगाजी में बहुत देखा है। वह भी मुझे मोहित करता है। वेगड़ जी की तरह गंगाजी की कोई सौंदर्य यात्रा करने वाला नहीं रहा शायद। पर धीर गम्भीर गंगा जी का सौंदर्य भी कम कर नहीं आंकना चाहिये। गंगा जी के किनारे लोग उतने गंगाभक्त नहीं हैं, तो क्या?!

यह आम धारणा कि नर्मदा चिर युवा, इठलाती, बल खाने वाली हैं और गंगा शांत, कोमल, करुणामयी हैं; एक जन सामान्य में (और विद्वानों में भी) मिथक ही है। नदी की चाल को निहारना केवल धारणा नहीं, आंकड़ों पर ठहराव दे कर करना चाहिए।

गंगा किनारे का सूर्यास्त। मेरे घर के समीप।

मैं गंगा किनारे बहुधा बैठता हूं। इतनी धीरे बहने वाली सीधी सपाट नदी कैसे गोखुर झील का निर्माण कर सकती होगी? पर मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र रविशंकर जी का कहना है कि गंगा हमेशा ऐसी नहीं थीं। वारह पुराण और कूर्म पुराण में उनका नाम भद्रा या महाभद्रा आता है – अर्थात विशाल जलराशि के साथ तेज बहने वाली नदी। उसके कटाव से प्रयाग और वाराणसी के बीच (और उसके पहले या बाद में भी) ऑक्स-बो आकृति की झीलें बनीं।

यह सम्भव है। रविशंकर जी ने कहा कि पुरुषोत्तम वामन काणे जी के धर्मशास्त्र का इतिहास में भी भद्रा नाम का जिक्र है गंगा के लिये। बहुत कुछ वैसे जैसे सरस्वती नदी के लिये घग्घर या घर्घर नाद करने वाली नदी का योग बताया जाता है। … वाराह पुराण का सन्दर्भ तलाश पाया गूगल का जैमिनी। बाकी दोनो सोर्स नहीं जांच सका। कभी रविशंकर जी से मिलना होगा तो इसपर चर्चा होगी। फिलहाल तो मैं गंगा और नर्मदा के इठलाने बलखाने को ले कर मगन हूं! नर्मदे हर! जय गंगा माई!


किसी ने कहा वो इठलाती है,
नदी है, नर्तकी कहाती है।

बह ज्यों चली बीच जंगल नदी,
हर इक मोड़ पर मुस्कुराती है।

कहीं नागिन और कहीं हिरनी सी,
चाल में, कहाँ कैसा बल खिलाती है?

वो नर्मदा है या गंगा माई —
ये सच्चाई किस किस को सताती है?


सुडानिया से मोतलसिर


जून 13 उनतीसवां दिन।

श्रद्धालु मिलते गये, सूरजकुंड की थाह नहीं मिली, और लू ने प्रेमसागर को रोक दिया — फिर भी यात्रा रुकी नहीं

कल 13 जून को सुडानिया से चल कर भारकच्छ पंहुचे प्रेमसागर।

सवेरे पांच बजे सुडानिया के आश्रम से निकले थे। सवेरे एक सज्जन देवेश पटेल जी ने चाय पिलाई। चलते समय आधा सेर देसी घी और बाती का पैकेट भी दिया। बोले हम तो नर्मदा माई की नियम से आरती कर नहीं सकते, आप ही कर दिया करना बाबाजी। पता नहीं बाबाजी इससे पहले शाम के स्नान के बाद जो ध्यान करते हैं, उसमें नर्मदा जी को दिया-बाती करना भी होता है या नहीं, अब जुड़ गया।

परिकम्मा वासी को अपनी ही नहीं, मिलने वाले लोगों की श्रद्धा को भी कांधे पर साधते बढ़ना होता है। नर्मदे हर!

मैने यह नहीं पूछा कि देवेश जी से कुछ नगदी भी पाये क्या? श्रद्धा प्रेम तो सही है, पर नगदी हो तो श्रद्धा में तरावट आ जाती है! :lol:

आगे हथनौरा पड़ा। वहां सूरजकुंड है जिसके बारे में कहावत है कि वह अथाह गहरा है। हाथी तो क्या, खाट की रस्सी तक डूब जाये और थाह न मिले। अर्थात एक खाट की बिनाई में लगी रस्सी की लम्बाई से ज्यादा गहरा है सूरज कुंड।

खाट की रस्सी लटका कर किसने नापी होगी गहराई? कहावतें तो कवि की कविता की तरह उपमा देने में निर्दोश भी होती हैं और अचम्भित करने वाली भी।

देवेश पटेल और उनकी पत्नीजी का एक चित्र लिया प्रेमबाबा जी ने। प्रेमबाबाजी का उनकी लाठी और पिट्ठू के साथ चलते हुये फोटो भी मेरे अनुरोध पर देवेश जी ने खींचा। प्रेमसागर ने उसे और फोटोजीनिक बनाने के लिये उनके छोटे बच्चे को भी साथ लिया फोटो में।

आगे एक गांव पड़ा जैत। वहां के नितिन जाट जी का फोटो लिया बाबाजी ने । नितिन जाट के मामा जी ने अपने गांव के मुहाने पर एक सुंदर द्वार बनवाया है अपने माता पिता की स्मृति में। माता सुंदर देवी थीं और पिता प्रेम जी। द्वार के ऊपर लिखा है प्रेमसुंदर द्वार, जैत। माता पिता की स्मृति में स्मारक का यह तरीका कितना अच्छा है। कितने ही लोग द्वार के नीचे से गुजरते होंगे। वे सब याद करते होंगे प्रेमजी और सुंदर देवी को। नितिन जाट सेवा भावी भी हैं।

नर्मदा किनारे रायसेन जिले में ही तीन बार के मुख्य मंत्री और आजकल भारत की काबीना में मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी का पुश्तैनी गांव है। उनके घर के बाहर खड़े हो कर प्रेमसागर जी ने अपना चित्र खिंचवाया।

शिवराज सिंह जी का गांव का घर अच्छा और सुरुचिपूर्ण है। घर आमंत्रित करता सा लगता है। बड़े मंत्री जी का भौकाल दिखाता, ऊंची दीवार में किले नुमा अहसास कराता घर नहीं लगता, जैसा उत्तर भारत का एक टुच्चा सा नेता भी कराना चाहता है!

नागनेर (ऐसा प्रेमसागर ने लिखा) में एक सज्जन राजेंद्र सिंह जी के घर दोपहर की भोजन-प्रसादी ग्रहण की। वे कुछ सुनाते रहे कि ऊदल की पत्नी इसी गांव की थी। नर्मदा किनारे रोज स्नान को जाया करती थी। “भईया इस जगह का नाम मुगल काल में बदला गया। नागनेर हो गया।” नक्शे में जगह का नाम नंदनेर आता है। पूरी कथा क्या है, वह तलाश नहीं पाया। यह ब्लॉग पोस्ट कभी पुस्तक बनने में प्रयोग हुआ तो और छानबीन करूंगा। ब्लॉग के खुरदरे और फटाफट लेखन में उतना शोध नहीं हो पाता। [यह प्रसंग भविष्य की गहराई से छानबीन के योग्य है]

राजेंद्र सिंह जी के यहां ही भोजन के बाद दोपहर का आराम किया बाबाजी ने। चार बजे उठ कर चले। आठ बजे वे भारकच्छ पंहुचे।

लेकिन पहुंचे कहां, पंहुचाये गये। एक दिन पहले तीस किलोमीटर चले थे, आज गर्मी और उमस में 25 किलोमीटर चल चुके थे, जब लू के कारण ज्वर ने उन्हें आ दबोचा।

“एक पेड़ की छांव में उठ बैठ रहा था भईया। लोग देखे तो यहां ले आये।” रात आठ बजे प्रेमसागर ने फोन कर बताया।

गर्मी का मौसम और ऊपर से उमस। दो तीन दिन में मानसून आ टपकेगा। उससे पहले उनचास डिग्री तापक्रम का अहसास था। सवेरे पांच घंटा चल चुके थे बाबाजी। शाम चार बजे फिर उठ कर पेरने लगे अपने आप को। दो घंटे में लू ने दबोच लिया। भारकच्छ पार कर चुके रहे होंगे। तब लोग वापस उन्हें लाये और एक राम मंदिर के निर्माणाधीन हॉल में उन्हें टिकाया।

कई लोग जमा हो गये थे प्रेमसागर के राह चलते अस्वस्थ होने की सुन कर। कोई उनमें से डाक्टर साहब को बुला लाये। बुखार तेज था तो एक अन्य सज्जन बर्फ भी लाये। दो घंटा बाबाजी के सिर पर ठंडे पानी और बर्फ की पुल्टिस रखी गयी। डाक्टर खुद सहृदय व्यक्ति थे। वे रुक गये और प्रेमसागर के सिर पर पट्टी रखने लगे। दो घंटे में ताप उतरा।

जून 14, तीसवां दिन

रात में आराम करने के बाद प्रेमसागर फिर निकल लिये भारकच्छ से। “भईया, वहां आश्रम बन रहा है और जगह ठीक से बन नहीं पाई है। टीना की छत है और गर्मी बहुत लगती है उसमें। लोगों ने तो बहुत सहायता की पर…” प्रेमसागर ने अपनी सफाई दी।

मैने उन्हें अनुरोधात्मक आदेश दिया कि कोई ऑटो ले कर आगे किसी अन्य जगह पंहुचें जहां व्यवस्था बेहतर हो और वहां कम से कम दो दिन रुक कर आराम करें। शरीर आराम मांगता है। उसे तुमने नहीं दिया तो बुखार ला कर जबरी आराम छीना। अब शरीर की इज्जत करना सीखो।

जिद्दी आदमी हैं प्रेमसागर। वे दांये बांये के अर्थहीन तर्क दे कर अपने मन की करते आये हैं, आज भी कर सकते थे। पर शायद खुद को भी लगा कि शरीर सही में आराम मांगता है। कुछ देर बाद वे मोतलसिर में थे। वहां नर्मदा किनारे एक आश्रम बन रहा है। सुविधायें अच्छी हैं। आज यहां रहे। कल भी रहेंगे।

मोतलसिर के आश्रम में शाम के समय प्रेमसागर ने नर्मदा उस पार के एक सरपंच जी से वीडियो कॉल करवाई। मोतलसिर रायसेन जिले में है। नर्मदा के दूसरी ओर नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिला पड़ता है। नर्मदापुरम के हरिपुर गांव के पूर्व सरपंच हैं हरनारायण सिंह। उनके बाल और दाढ़ी मूछें अहसाह दिलाती हैं किसी सन्यासी का। आवाज से भी वे सरल और मधुर लगते हैं। उन्होने बताया कि महंत जी ने साढ़े चार लाख में आश्रम के लिये जमीन खरीदी और आश्रम बनवा रहे हैं। करीब बाईस लाख खर्च आयेगा। कमरे, शौचालय आदि बन कर तैयार हैं। महंत जी ने बागवानी भी कुछ की है। परिसर पूरा बना नहीं है, पर सुंदर लगता है।

अब प्रेमसागर अगर कल रुकते हैं तो इस जगह के बारे में लिखने को और अवसर मिलेगा। पर उसकी सम्भावना रुपया में छ आना भर है।

नर्मदे हर! #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #नर्मदाप्रेम


Design a site like this with WordPress.com
Get started