करौंदमाफी से नीलकंठ


दिनांक 09 जून

करौंदमाफी में आश्रम की व्यवस्था अच्छी थी। आसपास गांव नहीं था। आश्रम से दूरी पर गांव थे। पर आश्रम का अन्नक्षेत्र चल रहा था। मैने पूछा – रात की प्रसादी में क्या था?

“रोटी, दाल, भुजिया आलू की, चावल सब था। सब भरपेट था भईया। मांगने की भी जरूरत नहीं थी। घूम घूम कर परोस रहे थे। यहां यह व्यवस्था बहुत अच्छी है। यूपी, बंगाल, बिहार और राजस्थान-गुजरात में भी यह व्यवहार नहीं है। दक्षिण में तो और खराब है, सिवाय कर्नाटक के। तामिलनाडु में तो बिना पैसे चाय-पानी भी नहीं मिला था। वहां तो बात समझने पर भी हिंदी वाले को नहीं समझते थे। करोंदमाफी के बहाने पूरे भारत का तुलनात्मक अध्ययन बता दिया प्रेमसागर ने।”

रास्ते के बच्चों के बारे में प्रेमसागर कई बार बता चुके हैं। आज फिर बताया – “भईया यहां बच्चा बच्चा दौड़ कर पास आ जाते हैं। नर्मदे हर कहते हैं बड़े जोश से। उन्हें चाकलेट दो तो उनसे कितनी भी बार नर्मदे हर कहला लो! इस जमाने में जहां अपना सगा बेटा पास नहीं आता, ये दौड़ कर आते हैं और कहते हैं – बाबा हमें आशीर्वाद दो।”

चाकलेट की आशा में पास आते बच्चे। नर्मदे हर!

साढ़े आठ बजे बीजलगांव आया। वहां से थोड़ी बहुत बात मुझसे की।

प्रेमसागर वहां चल रहे थे पूरी ऊर्जा के साथ और यहां भदोही में मेरी तबियत ठीक नहीं थी। सारे शरीर में दर्द था और मुझे लग रहा था कि पेशाब में संक्रमण हो गया था। दिन डाक्टर को दिखाने और परीक्षण कराने में निकल गया। पता चला कि ज्यादा शारीरिक श्रम (साइकिल चलाने) से मेरा क्रेटिनिन बढ़ गया है और श्वेत रक्त कणिकायें भी बढ़ गई हैं। इस सब के कारण दिन में प्रेमसागर से बातचीत लगभग नहीं हुई। कुछ चित्र उन्होने भेजे थे, वही देखे। बीच बीच में उनकी लाइव लोकेशन देखता रहा।

तबियत ठीक नहीं थी तो मुझे न बातचीत के लिये शब्द मिल रहे थे और न विचार आ रहे थे। प्रेमसागर की यात्रा चल रही थी, पर मेरी मनयात्रा को विश्राम की दरकार हो रही थी।

रात पौने नौ बजे प्रेमसागर जी से बात हुई। उन्होने बताया कि उनका दिन भी कुछ अच्छा नहीं रहा। दिन में किसी से कोई खास मुलाकात – बात नहीं हुई। गांव दूर दूर थे और जो लोग दिखे भी वे अपनी खेती में परेशान नजर आये। बादल घिरे थे और बारिश आने को थी तो उन सब की भी व्यस्तता थी अपनी फसल सहेजने की। लोग नहीं मिले तो दोपहर में भोजन भी प्रेमसागर को कहीं नहीं मिला।

“काफी देर बाद, लगभग बीस किलोमीटर चलने पर एक चाय की दुकान मिली। वहां चाय और पोहा ले कर खाया। और भईया आम मिल गये थे। एक जगह जहां आम थे, वहां रखवाले ने चार आम दे दिये। मीठे थे।”

“मेन बात यह रही कि गर्मी और उमस बहुत ज्यादा थी। पेड़ भी कम ही मिले। छाया में बैठ सुस्ताने को भी जगह नहीं मिली। नर्मदा किनारे किनारे चलना हो रहा था तो तीन बार माई के पास जा कर नहा लिया”

देवास जिले का आखिरी गांव है करोंदमाफी। उसके बाद सीहोर शुरू होता है। शुरू में पड़ता है सातदेव। वहां बालू का खनन बहुत होता है। ट्रेक्टर से बालू की ढुलाई होती है। शायद अवैध होता है यह कारोबार। “खबरिया दिखे भईया। नदी के दोनो तरफ एक एक खबर देने वाले हैं। वे खबर देते हैं कि पुलीस आ रही है। पर पुलीस का ज्यादा डर नहीं है। खबर देने वाले भाई ने कहा – पुलीस पकड़ेगी भी तो क्या करेगी। पैसा लेगी और छोड़ देगी।”

आज के अनुभव अच्छे नहीं रहे प्रेमसागर के। इसलिये वे बात भी नेगेटिव विषयों की ही कर रहे थे।

रात में नीलकंठ पंहुचे। नर्मदा किनारे मंदिर छोटा ही है पर खूब पेड़ हैं इर्दगिर्द। नर्मदा माई 100-200 मीटर पर ही होंगी। यहां अन्न क्षेत्र नया बना है। यज्ञशाला के दालान में कई परिक्रमा वासी रुक सकते हैं। यज्ञशाला की दीवार पर लिखा है – “यहां नर्मदा परिक्रमा करने वालों के लिये निशुल्क भोजन व्यवस्था किया जाता है।”

पर आश्रम में केवल वहां के बाबा जी थे। पचहत्तर साल के होंगे। भोजन के बारे में प्रेमसागर ने पूछा तो बाबाजी ने कहा – यहां और कोई तो है नहीं; हमारे पास दोपहर की चार रोटी बची हैं… उससे काम चले तो…

नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर

प्रेमसागर ने कहा – बाबाजी, पास से अगर तरबूज मिल जाये तो हम दोनो खा कर सो जायेंगे। बाबाजी ने उसमें भी ना नुकुर की। बोले उनके पास पैसा नहीं है। “भईया उन्होने कहा कि तरबूज पचास के आयेंगे, मैने सौ रुपये दिये। पर थोड़ी देर बाद बाबा जी ने आ कर बताया कि तरबूज तो मिले नहीं।”

“भईया, लग गया कि आज नर्मदा जी का जल पी कर रहना पड़ेगा। बाबाजी पैसे लौटा रहे थे तो मैने कहा – बाबाजी मैं तो पैसे दे चुका हूं, अब वापस नहीं लूंगा, आप ही रख लीजिये।”

बाबाजी – “मैं तो पैसे नहीं ले सकता। आप मंदिर को दान देना चाहें तो दे दीजिये।”

“भईया, अब दान देने की बात आई तो मैने खोज कर एक रुपये का सिक्का निकाला। एक सौ एक रुपया मंदिर के नाम से बाबाजी को दान दे दिया।”

थोड़ी देर बाद देखा कि बाबाजी का मन बदल गया। वे भोजन बनाने लगे। उन्होने बाटी (गाकड़) लगाई और दाल भी बनाई। दोनो ने भोजन किया।

अगले दिन नीलकंठ से रवाना हो कर बाबाजी के बारे में प्रेमसागर ने बताया – “फिर तो भईया, बाबा जी बिल्कुल बदल गये थे। सवेरे जिद कर उन्होने चाय और पोहा बना कर मुझे खिलाया। खाये बिना जाने ही नहीं दिया। वे कह रहे थे – आप अच्छे संस्कारी आदमी हैं। आप जैसे परिक्रमावासी आयें तो कितना अच्छा हो।”

मैने पूछा – बाबाजी के नाम गांव के बारे में पता नहीं किया?

“किया भईया। वे अनूप सिंह हैं। नीलकंठ गांव के ही रहने वाले हैं। परिवार से अलग आश्रम में रहते हैं। अनूप सिंह जी गांव वालों के बारे में कह रहे थे कि वे सहायता नहीं करते। पर भईया आश्रम को अनाज वगैरह तो गांव वाले ही देते हैं।” – प्रेमसागर ने जवाब दिया।

भले, अच्छे पर कुछ जटिल हैं अनूप सिंह जी। गहरे में आत्मीय हैं और ऊपर से रूखे। शायद गांव वालों की उपेक्षा या परिक्रमावासियों का अकृतज्ञ रवैया उसके मूल में हो।

नीलकंठ के बाबाजी – अनूप सिंह

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

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नर्मदे हर!!


राजोर से करोंदमाफी


8 जून: प्रेमसागर की पदयात्रा में किसान की पीड़ा, बिटिया की प्रसादी और माफी गांव की कथा

अजय पाल जी के घर से थोड़ा देर से निकले प्रेमसागर। “हम तो तैयार थे भईया, पर उन लोगों का दरवाजा थोड़ा देर से खुला। बिना कह कर बिदा लिये चलना मुझे ठीक नहीं जान पड़ा।”

दिन में कई नदियां पार कीं। बागदी और जामनेर नदियों के नाम दिये प्रेमसागर ने। इनके पाट काफी चौड़े थे और पानी भी खूब था उनमें। उसके अलावा छोटी छोटी कई नदियां थीं। कुछ पर पुल थे और कुछ के बांस के पुल बह चुके थे। पानी कम था तो चल कर पार करना कठिन न था। एक नदी को पार करने के बाद प्रेमसागर ने वीडियोकॉल से नर्मदा तट का हाल बताया। नाम बताया गोंदी नदी। गोंदी नर्मदा संगम स्थान था। गोंदी पर ह्यूमपाइप का पुल रहा होगा जो आधा बह चुका था। एक पाइप से दूसरे पर कूद लगाई होगी। पानी कम था तो पार करने की खुशी प्रेमसागर को थी। पदयात्री को इस तरह के छोटे छोटे एडवेंचर प्रसन्नता देते हैं। और उनसे दो चार किलोमीटर अतिरिक्त चलना बच भी जाता है।

एक दुकान पर बैठी लड़की ने बाबाजी को रोका। उसने कहा आज उसका जन्मदिन है। प्रसादी बन रही है। ग्रहण कर ही जायें। “भईया, बिटिया का आग्रह कैसे न मानता मैं। एक घंटा वहीं रुका।” जगह थी निकुंज आश्रम ब्रजवाड़ा। बिटिया का भंडारा वहीं हुआ था।

वहीं एक परिक्रमावासी की पुरानी डायरी पड़ी थी। हर दिन का तीन चार लाइन में विवरण लिखा था और उसके पास आश्रम की सील भी लगाई हुई थी। सील लगवाने का कारण समझ में नहीं आता, अगर यात्री कोई प्रायोजित यात्रा न कर रहा हो। प्रेमसागर की थ्योरी है कि कुछ परिकम्मावासी किसी और के संकल्प की पूर्ति के लिये यात्रा करते हैं और उसका प्रमाण इस तरह रखते हैं। यह जरूर है कि प्रायोजित परिकम्मा बहुत कम ही होती होगी। यूं मुझे लगता है कि प्रायोजक और पदयात्री दोनो ही इसका प्रचार करने से बचते होंगे।

परिकम्मा वासी की डायरी का एक पन्ना

इस संदर्भ में मुझे अमृतलाल वेगड़ जी की पुस्तक का अंश याद हो आया। उन्होने लिखा था – रास्ते में एक सन्यासी की कुटी मिली। मैने सन्यासी से पूछा – कैसे कैसे लोग नर्मदा की परिक्रमा करते हैं?” तो कहने लगे “अधिकतर लोग भीख मांगने के लिये ही परकम्मा उठाते हैं। इससे पेट भी भर जाता है और पैर भी पुज जाते हैं।” (सौंदर्य की नदी नर्मदा, पेज 2-3)

एक जगह मूंग की फसल का ढेर लगा दिखा। “भईया मूंग यहां खूब होती है, पर किसान खुश नहीं है। उनका कहना है कि इस साल सरकार खरीद नहीं रही। बाजार में दाम अच्छे नहीं मिल रहे। वे याद करते हैं कि शिवराज सिंह मामा का टाइम अच्छा था। सरकार किसान की फिकर ज्यादा करती थी।”

रात ढलने पर ही ठिकाने पंहुचे प्रेम बाबाजी। कोई जगह है करौंदमाफी। वहां आश्रम है – करुणाधाम आश्रम। बोर्ड पर लिखा है – अन्नक्षेत्र और परिक्रमावासियों के ठहरने की उत्तम व्यवस्था। आठ दस कर्मचारी भी हैं आश्रम में। स्थानीय ही हैं। मैने प्रेमसागर से कहा कि उनसे पता करें करौंद के आगे माफी क्यूं लगा है। गांव को कभी मालगुजारी/लगान में माफी दी गई होगी? शायद मुगल काल में? पर उन स्थानीय लोगों में से कोई बता नहीं पाया। सिर्फ यही बताया कि उनके दादा-परदादा के जमाने से नाम यही है – करौंदमाफी।

करौंदमाफी

नेमावर पार कर आये हैं प्रेमसागर। नेमावर या नर्मदा तट के दूसरी ओर हंडिया को नर्मदा माई का नाभि स्थल कहा जाता है। प्रेमसागर ने उत्तर तट की पदयात्रा का आधा पार कर लिया है। पूरी परिक्रमा होने में अगर कोई संशय रहा हो, तो अब दूर हो जाता है। नर्मदा माई की कृपा से पदयात्रा अच्छी ही चल रही है। और उनके साथ मेरी मनयात्रा भी खूब मौज में है।

बकिया, प्रेमसागर हलुआ पूड़ी छान रहे हैं और मैं अपनी कैलोरी गिनता घासफूस पर जिंदा हूं। मुझे अगर पच्चीस किलोमीटर रोज चलना आता तो इस युग का अमृतलाल वेगड़ बनता। अभी तो प्रेमसागर के जरीये देख सुन रहा हूं नर्मदा माई की हलचल को!

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

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नर्मदे हर!!

धर्मेश्वर महादेव से राजोर


दिनांक 7 जून

धर्मेश्वर महादेव जंगल के किनारे पर हैं। सवेरे वहां से चल कर तीन किलोमीटर आगे तक जंगल मिला। तब तक मोबाइल का सिगनल भी गायब रहा। जंगल पार होने के बाद सहमता-सकुचाता वह वापस आया। प्रेमसागर की लाइव लोकेशन फिर झलकने लगी।

बाबाजी के भेजे दो चित्र मुझे इस तीन किलोमीटर के प्रतीक से लगे। एक में जंगल से गुजरता रास्ता है और दूसरे में रास्ते के साथ लगा वन विभाग का बोर्ड है, जिसमें बघेरा जैसा कोई जीव बना है। उसके साथ लिखा है – कृपया धीरे चलें 30(किलोमीटर), वन्य प्राणी विचरण क्षेत्र। … शायद धीरे चल कर आप वन्यजीवों की इज्जत करते लगते होंगे। तेज चाल चलना उनपर रौब गांठने जैसा होता होगा।

जंगल खतम हुआ तो बारिश होने लगी। तेज हुई, और फिर और तेज। आसरा तलाशते प्रेमसागर को देवीलाल जी ने देखा। उनके पोता-पोती दौड़ कर अपने घर बुला लाये। वहां केवल बैठने भर को जगह नहीं मिली, देवीलाल जी ने आदर सत्कार किया। उनकी बहू ने हलवा बनाया और साथ में चाय भी। प्रेमसागर ने लगभग चहकते हुये मुझे विवरण दिया मानो कोई लाटरी जीत कर आये हों। वैसे नर्मदा परिक्रमा में पग पग पर लाटरी लगने का ही भाव आता है प्रेमसागर में।

देवीलाल जी का परिवार भरापूरा लगता है। खेती करने वाले लोग। उनके दो बेटे हैं। चित्र में उनके बेटे और पीछे खड़ी उनकी पत्नियां नजर आती हैं। अब यह पता नहीं चलता कि किस पत्नी ने हलुआ बनाया। परम्परा अनुसार तो देवरानी को बनाना चाहिये। ये भी हो सकता है दोनो बहनें हों। बहने होने पर देवरानी-जेठाने के रिश्ते में एक लेयर और चढ़ जाती है।

प्रेमसागर के साथ यही दिक्कत है कि रास्ते में लोगों के साथ मिलते उनके सम्बंधों-रिश्तों की परतें नहीं टटोलते। वे मुझे सीधा सपाट ट्रेवलॉग लिखने का मसाला तो देते हैं पर सम्बंधों के माधुर्य से अनछुये से निकल जाते हैं।

देवीलाल जी का परिवार

आगे एक नदी का संगम है नर्मदा जी से। नक्शे में नाम है दतौनी (Datauni) पर प्रेमसागर लिखते हैं धतूरी या धतूरा। अब जो हो, उस संगम की खासियत यह है कि उसके सामने नर्मदा के बीच एक टापू है। टापू खूब बड़ा है और उसपर एक किला है। यह जोगा जाट का बनाया 900 साल पुराना किला है। बताते हैं भोगा और जोगा दो भाई थे। चंदेलों ने इन्हें निमाड़ की जागीर दे दी थी। पर जिंदगी तो लड़ने भिड़ने में ही गई। बड़े भाई भोगा का देहांत एक युद्ध में हुआ। छोटे भाई ने किला बनवाया। यह किला शस्त्रागार का काम करता रहा।

जोगा की पत्नी गुर्जरी थी और नर्मदा माई की भक्त थी। रोज नर्मदा स्नान को आती थी। एक रानी रूपमती ने मांडू का रेवाकुंड बनवाया और दूसरी जोगा जाट की पत्नी आज नर्मदा के बीच किले से याद आ रही है।

लगता है आज भी इस इलाके में जाट बहुत हैं। दतौनी नदी पर पुल बनाने का काम चल रहा है। लोगों के आने जाने के लिये नदी में ह्यूम पाइप डाल कर रास्ता बना दिया गया है। पुल का काम करने वाले लोगों और आने जाने वालों के लिये कपिल जाट जी ने एक दुकान खोल रखी है। वहीं दोपहर का भोजन-प्रसादी बना कर कपिल जी ने प्रेमबाबा को अर्पित की। बाबाजी की आज दूसरी लाटरी लगी। “भईया कपिल जाट जी बिना परसादी लिये जाने ही नहीं दिये!”

आगे मजे मजे में चलते बाबाजी फोन पर मुझसे बतियाते रहे। “भईया तमखन से गुजर रहा हूं। बच्चा लोग देखते हैं तो दौड़ कर आते हैं। नर्मदे हर बोलते हैं और फिर कहते हैं टॉफी दो! पचास रुपये रोज की टाफी लग जाती है। टॉफी के बहाने बच्चों में नर्मदा माई के प्रति श्रद्धा के संस्कार तो जागते ही होंगे। परिक्रमावासियों से भी अपनापा उपजता होगा।”

“भईया राजस्थान के लोग मिले। ऊंट पर अपना सारा सामान लादे, बाल बच्चा समेत आ रहे हैं। यहां मूंग खूब होती है। उसकी बुआई कटाई करते हैं। चार पांच महीने के फसल सीजन के बाद मेहनत का रोकड़ा और कुछ मूंग ले कर वापस अपने देस लौटते हैं।”

इस क्षेत्र में लोग बड़े पैमाने पर मूंग उगा रहे हैं। उसके लिये श्रमिक दूर दूर से आते हैं। भरतपुर से, डूंगरपुर से… खेत में ही झोंपड़ी – मचान बना कर तीन चार महीना रहते हैं।

मैने पूछा – किसी घुमंतू किसान से बात की? पर प्रेमसागर रुकते कम ही हैं बातचीत को। उनके माध्यम से जानकारी तो मिलती है, कथायें नहीं। कथा के लिये मुझे समांतर मनयात्रा करनी पड़ती है।

$$ ज्ञानकथ्य – अथ रामलाल देवासी आख्यान

रामलाल देवासी मिला मुझे नर्मदा के पास एक खेत के किनारे। ऊँट की रस्सी थामे खड़ा था। पास में उसका बेटा — नाम रॉबिन — बाल झटकता घूम रहा था। बेटी रवीना कुछ दूर मचान पर बैठी थी। नाम चौंकाने वाले लगे। पूछने पर रामलाल की आँखें मुस्कुराईं — “मेरी घरवाली को पुराने नाम पसंद नहीं हैं। कहती है जमाना बदल गया है।”

रामलाल डूंगरपुर से चला था। कई दिन की ऊँट-यात्रा करके नर्मदा के इस किनारे पर आकर टिका है। उसी के गाँव के कुछ लोग यहां पीढ़ियों से बस गए हैं — नेमावर के पास। “हमारे बाबा के साथी लोग रहे होंगे जो यहीं बस गये,” उसने बताया। “अब वे लोग खेत वाले बन गए हैं, ट्रैक्टर चलाते हैं, हम अब भी ऊँट से आते हैं, मेहनत करते हैं।”

बच्चों की पढ़ाई का ज़िक्र आया। बोला — “मेरी घरवाली कहती है, कुछ तो सीखें। भेरूसिंह जी प्रधान हैं, उनके भरोसे स्कूल भेज देती है। कापी-किताब मिल जाती है।”

मैं सोचता रह गया — ये बच्चे क्या बनेंगे? अगली पीढ़ी के घुमंतू किसान? मूंग की खेती में मेहनत मजूरी करेंगे या किसी और रास्ते चलेंगे? रॉबिन की चाल में थोड़ा टीवी वाला नायक था, पर आँखों में खुला आसमान भी था।

मुझे प्रेमसागर के भेजे गये चित्रों में रामलाल देवासी के लिये एक प्रतिनिधि चित्र भी मिल जाता है। अपनी मनयात्रा के लिये वही दे रहा हूं।

रामलाल देवासी

ये घुमंतू लोग पीढ़ियों से एक और तरह की नर्मदायात्रा करते हैं। डूंगरपुर से बरास्ते बांसवाड़ा, रतलाम, उज्जैन और देवास यहां नर्मदा किनारे की श्रम यात्रा। वे चार-पांच सौ किलोमीटर ऊंट पर और पैदल चलते हैं। और चौमासा नर्मदा किनारे बिता वापस लौटते हैं। परिक्रमावासी की यात्रा श्रद्धा यात्रा है तो रामलाल देवासी जैसे श्रम यात्रा करते हैं। अलग अलग तरह की नर्मदा यात्रायें!

लेखकीय निवेदन:
पाठकों के लिये $$ चिन्हित अनुच्छेद ‘ज्ञानकथ्य’ हैं — जहाँ ज्ञानदत्त पाण्डेय पात्रों, स्थलों या अनुभवों पर स्वतंत्र रूप से दृष्टिपात करता है।
इन ‘ज्ञानकथ्यों’ को कथाशैली में प्रस्तुत किया गया है – जैसे “अथ रामलाल देवासी आख्यान”, जो पौराणिक कथाओं के छंद में एक विनम्र प्रयोग है।

प्रेमसागर की पदयात्रा पर लौटा जाये। शाम के समय तेज चाल से चले बाबाजी। नेमावर पंहुचने में अभी समय लगेगा – घंटा डेढ़ घंटा। पर अचानक बच्चे दौड़ते आये और उन्हें घेर लिया। बोला – “दादाजी बुला रहे हैं। बोले कि बाबाजी को पकड़ लाओ। आज यहीं रोकेंगे।”

“दादाजी बुला रहे हैं। बोले कि बाबाजी को पकड़ लाओ। आज यहीं रोकेंगे।”

आज बाबाजी की ट्रिपल लॉटरी लगने का दिन था। अजय पाल जी का घर परिक्रमा मार्ग पर ही था। उन्होने प्रेमसागर को जाते देखा तो बुला लिया। रात का डेरा उन्हीं के घर रहेगा।

अजय पाल करीब अस्सी साल के हैं। भरापूरा परिवार है। किसान हैं। मजबूत आदमी। सिवाय कान से कम सुनाई देने लगा है, उसके अलावा पूरी तरह स्वस्थ हैं। वे भी राजस्थान से यहां आ कर बसे हैं। उनके पुरखे – उनसे दो पीढ़ी पहले, जोधपुर से यहां आये और नर्मदा की उपजाऊ जमीन और जल उपलब्धि ने यहीं थाम लिया।

“भईया, हमें तो ये सब देख आचर्ज (आश्चर्य) होता है। हमारी तरफ ऐसे लोग नहीं हैं। और भईया यहां ये लोग अपने खेत पर भी अगर बाइक से जाते हैं तो किनारे बाइक खड़ी कर चाभी उसी में छोड़ देते हैं। ऐसा हमारी तरफ तो कभी देखा सुना नहीं।”

जगह का नाम है राजोर। अजय पाल जी के यहां आतिथ्य भरपूर था। मैने पूछा नहीं कि क्या क्या खाये रात की प्रसादी में; पर जो भी रहा होगा, बढ़िया ही रहा होगा।

बकिया, प्रेमसागर हलुआ पूड़ी छान रहे हैं और मैं अपनी कैलोरी गिनता घासफूस पर जिंदा हूं। मुझे अगर पच्चीस किलोमीटर रोज चलना आता तो इस युग का अमृतलाल वेगड़ बनता। अभी तो प्रेमसागर के जरीये देख सुन रहा हूं नर्मदा माई को!

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

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