ट्रेवलिंग डेंटल टेक्नीशियन: इरशाद अहमद की कहानी


जो दांत बनारस में बनाते हैं और मुस्कान महराजगंज में लगाते हैं

डॉक्टर के क्लीनिक की गैलरी में एक आदमी बैठा था। हाथ में दांत का ताजा इम्प्रेशन लिए। मैं वहां अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। वही आदमी इरशाद थे — दांत के टेक्नीशियन।

पिछले डेढ़ महीने में दांत के डॉक्टर साहब के यहां कई बार जाना हुआ। नया दांत लगाने का नाप लेने और लगाने के मौके पर वे रहते ही हैं…

मैं उनका नाम नहीं जानता था, पर पिछली बार विधिवत परिचय हुआ। वे किसी कस्टमर के दांत का नाप ले कर बाहर गैलरी में बैठे थे और मैं अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।

उन्होंने बताया कि पांच साल से दांत बना रहे हैं। अब तक हजारों दांत बना चुके हैं — उनकी अपनी गणना में करीब डेढ़ लाख तक। और उनकी दक्षता का पैमाना यह है कि निन्यानबे प्रतिशत दांत सही बैठते हैं।

बनारस में वे अपनी डेंटल कास्टिंग लैब में काम करते हैं। उनके ग्राहक बनारस के डेंटिस्ट तो हैं ही, गाजीपुर से ले कर लालानगर तक के ग्रामीण और कस्बाई/शहरी दांत के डॉक्टरों से भी उन्हें काम मिलता है।

इरशाद का पूरा नाम इरशाद अहमद है। उनका गांव यहीं गिर्द बड़गांव के पास कुनबीपुर है। पर वे रहते बनारस में हैं। डेंटल तकनीशियन का काम अपने परिवार में ही सीखा — कुछ वैसे ही जैसे लुहार-बढ़ई अपने घर में सीखते हैं।

पर उनके परिवार में अलग पेशे में भी गये हैं लोग। उनके बाबा, डॉक्टर सनाउल्लाह एक होमियोपैथ थे — भदोही के नामी होमियोपैथ। डॉक्टर सनाउल्लाह स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उनकी दादी तो 100 की उम्र पार कर गईं। उनके एक भाई मुरादाबाद में कार्डियोलॉजिस्ट तकनीशियन हैं।

डेंटल टेक्नीशियन का काम काफी हुनर का काम है। आदमी के नये दांत को जबड़ा सरलता से स्वीकार नहीं करता, अगर उनकी बनावट सही न हो। जीभ दांत को ठेलती है और जबड़े असहनीय दर्द में आ सकते हैं, अगर दांत सेट न हों।

इरशाद पहले जो दांत या दांतों का सेट बनाना है, उसका इम्प्रेशन लेते हैं। वे मरीज के मुंह में एक ट्रे रखते हैं जिसमें मुलायम मटीरियल — एल्जीनेट — भरा होता है। आजकल कहीं सिलिकॉन बेस्ड इम्प्रेशन मेटीरियल का भी इस्तेमाल होता है। कुछ ही मिनट में यह जम जाता है और दांतों व मसूड़ों की नेगेटिव छाप बन जाती है।

यह इम्प्रेशन ट्रे ले कर वे अपनी बनारस की लैब में जाते हैं। वहां नेगेटिव में डेंटल ग्रेड जिप्सम या डेंटल स्टोन भरते हैं। इससे दांत का पॉजिटिव मॉडल बनता है।

फिर पॉजिटिव मॉडल से मोम का मॉडल बनाते हैं। इसे वैक्स-अप कहा जाता है। इसमें असल दांत की ऊंचाई, शेप और दांत के काटने की सतह तय होती है। असल कारीगरी का अनुभव इसी में लगता है। दांतों का संतुलन, उपयोक्ता का डेंटल मेक-अप, मुस्कान की नैसर्गिकता और चबाने की सरलता इसी हुनर पर निर्भर होती है।

फिर तकनीशियन नकली दांत के मेटीरियल का चयन करते हैं। मेरे केस में मैंने मेटल-सेरामिक पसंद किया। सेरामिक उसे दांत की सफेदी और टेक्स्चर देता है और मेटल मजबूती। यह शायद सस्ता भी पड़ता है।

Dental Technician
अपनी दांतों की लैब में काम करते इरशाद अहमद

इसके बाद दांत की फिनिशिंग और पॉलिश होती है। फिर इरशाद दांत ले कर हमारे पास आते हैं। वे और डॉक्टर साहब मिल कर दांतों को लगा कर ट्रायल करते हैं। जरूरत पड़े तो फाइनल फिनिशिंग के लिये थोड़ी घिसाई भी करते हैं — नकली या उसके दूसरी ओर के असली दांत की भी।

मेरे साथ भी वैसा हुआ। एक आर्टीकुलेट पेपर को मेरे दांतों के बीच रख कर दांतों को रगड़ने को कहा गया। इससे सुनिश्चित किया कि सब ठीक सेट हुआ है।

इरशाद कम बोलने वाले आदमी लगे। आर्टीकुलेट पेपर को हाथ में ऐसे देख रहे थे जैसे कोई कारीगर अपनी ढलाई की नफासत को परखता है।

असल खेल बिल पेमेंट के समय हुआ। डॉक्टर साहब ने जो बिल बताया वह मेरी अपेक्षा से कम था।

मैं मोबाइल में वह अमाउंट टाइप कर चुका था। डॉक्टर साहब ने रोका और हंसते हुए कहा — ‘इतना नहीं, आप हमारे सम्मानित ग्राहक हैं।

और फिर जो पेमेंट लिया, उसे देखें तो बहुत सस्ते में इलाज हुआ माना जा सकता है।

इरशाद का कहना था कि बनारस में उन्हें दांत बनवाई में जो मिलता है, गांव देहात में उससे काफी कम मिलता है। पर कुल मिला कर उनका काम चल जाता है। वे अपने रूरल ग्राहक खोना नहीं चाहते। रूरल डेंटिस्टों के यहां जाने आने में समय भी लगता है और पेट्रोल भी। पर वह सब उनके इस ट्रेवलिंग डेंटल टेक्नीशियन मॉडल पर भारी नहीं पड़ता।

खुशबू ने बताया कि फलानी महिला बनारस से यहां आई थी अपना आरसीटी कराने और दांत लगवाने। वही कह रही थी कि बनारस में 15 हजार मांग रहे थे और यहां आठ-नौ हजार में काम हो गया।

अर्थात महराजगंज का स्वमित्र का डेंटल क्लीनिक एक तरीके से डेंटल टूरिज्म भी है।

लोग परदेश से भारत दांत लगवाने आते हैं। अब यह नया मॉडल है — लोग शहर से दांत के इलाज के लिये महराजगंज आयें।

गांव-कस्बों का यह नेटवर्क चुपचाप काम करता रहता है, पर कई बार शहर की महंगी व्यवस्था से ज्यादा असरदार साबित हो जाता है।

चलते चलते हमने नमस्कार – प्रणाम का आदान प्रदान किया। आज इतने समय में मैंने जाना कि दांत बनाना भी एक तरह की कारीगरी है, जिसे हम मरीज लोग अक्सर देख ही नहीं पाते।

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गांवदेहात का जेम्स हैरियेट


आज फिर दांतों का फॉलोअप था डाक्टर स्वमित्र के क्लीनिक में। फिर कई रेडियोग्राफिक शूट। फिर थोड़ी दांतों की घिसाई। फिर दांतों के रूट्स तक फाइल चुभाने की फाइन ट्यूनिंग। मैं कुर्सी पर आधा लेटा था। मुंह खुला। भीतर धातु के औज़ारों की खनखनाहट। बोल नहीं सकता था, पर सुन सब रहा था।

इसी बीच लगभग पचहत्तर-अस्सी साल का एक ग्रामीण भीतर आया।

डाक्टर ने एक नज़र देखी और हल्का-सा बुदबुदाए—अरे, अभी तो बाहर जाने को निकलना था। इनके साथ जो मरीज हैं, उनका प्रेगनेंसी का केस है। दवाइयाँ जाने बिना हाथ कैसे लगाया जाए?

मेरे मुंह में उपकरण ठुंसे थे, पर कान बाहर की बातचीत पर टिके थे।

डाक्टर ने पूछा – “दद्दा, दवाई की पुर्जी लाए हैं?”

उन्होंने मुड़ी-तुड़ी कागज़ की पर्ची आगे कर दी। उस पर जो लिखा था, वह किसी गुप्त लिपि जैसा था। एक डॉक्टर का लिखा दूसरा डॉक्टर नहीं पढ़ सकता। कोई कम्पाउंडर भी नहीं—सिवाय उसी डॉक्टर के कम्पाउंडर के।

अगर कोई और पढ़ ले तो सिंधु सभ्यता की लिपि पढ़ने का दावा कर सकता है।

दद्दा ने मेज़ पर दवाइयों के खाली खोखे उंडेल दिए। अब स्वमित्र का काम था—उनसे उनकी पतोहू की प्रेगनेंसी के इलाज की कहानी जोड़ना। कौन-सी दवा, कितने दिन, किसलिए रही होगी?! 

Dentist And Wrappers
डेंटिस्ट और खाली दवा के रेपर्स

मैं कुर्सी पर पड़ा था—इलाज भी करा रहा था और कथाएँ भी बटोर रहा था।

गांवदेहात की डाक्टरी आसान काम नहीं है। पिछली बार एक महिला आई थीं। महीनों दांत का दर्द झेलती रहीं। बीच में ममहर के किसी झोलाछाप से दवा ले ली। दर्द दब गया, पर गाल के अंदर और मसूड़ों पर छाले पड़ गए।

डाक्टर ने उस दिन साफ़ झुंझलाहट में कहा था—
“दर्द बंद होना इलाज नहीं होता। शरीर को चुप करा देना इलाज नहीं होता।”

झोलाछापों का आत्मविश्वास अद्भुत होता है। “दस मिनट में आराम, गारंटी।” उनके पास न एक्स-रे, न हिस्ट्री, न जवाबदेही। पर भरोसा भरपूर।

और भरोसा—गांवदेहात में—सबसे सस्ती और सबसे महँगी चीज़ दोनों है।

ऐसे दृश्य देख कर मुझे जेम्स हैरियेट याद आते हैं। अंग्रेज़ पशु-चिकित्सक—जिन्होंने ग्रामीण इलाकों में काम करते हुए अपने अनुभव लिखे। उनकी All Creatures Great and Small में इलाज से ज़्यादा जीवन दर्ज है—लोग, उनकी आदतें, उनकी भोली जिदें।

हमारे यहां भी कितनी कथाएँ रोज़ जन्म लेती हैं।
मुड़ी-तुड़ी पुर्जियाँ। खाली दवा के खोखे। अधूरी जानकारी। और डॉक्टर का अपार धैर्य।

मैं कुर्सी से उठा तो सोच रहा था—
डेंटिस्ट होना एक पेशा है। पर गांवदेहात में डेंटिस्ट होना—एक कथाकार होने की प्रबल संभावना भी है। एक अनूठा अवसर। 

अगर मैं स्वमित्र या खुशबू की जगह होता, तो हर रोज की कथाओं के शायद नोट्स भी रखता। लोगों से अवधी-भोजपुरी में बतियाता। दांत लगाता और साथ-साथ कहानियाँ भी सहेजता।

हर कोई जेम्स हैरियेट हो यह ज़रूरी नहीं।
पर गांवदेहात में काम करने वाला हर डॉक्टर चाहे तो, अपनी डायरी में
कुछ जीवन दर्ज कर सकता है।

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बूढ़ा आदमी और दांत का डाक्टर


दांत के डाक्टर साहब और उनकी जूनियर ने मेरे बाँई ओर के दाँतों का अंतिम रेडियोग्राफ शूट कर परिणाम देखा और संतोष की साँस ली। आज की मेरी सिटिंग पूरी हुई।

स्वमित्र, डाक्टर साहब ने पूछा—बाहर जो दद्दा बैठे हैं, उनका क्या मामला है। पहले आ चुके हैं?

खुशबू, जूनियर डाक्टर, ने बताया—नहीं, पहले तो नहीं देखे।

बाहर निकलते निकलते डाक्टर साहब और दद्दा की बातचीत सुनाई पड़ी। दद्दा इलाज का दाम तौलने आए थे और अपने को पर्याप्त गरीब-निरीह दिखाने में सफल लग रहे थे। उन्होंने कहा—
“हमार दंतवा बनई देब्य?” (मेरे दांत बना देंगे?)

उनका कहना था कि भरोसगंज में दांत लगवाए थे। खाते समय दांत गिर कर टूट गए। अब खाना नहीं खा पाते। बड़ी तकलीफ है।

यह साफ़ लगता था कि भरोसगंज में उनका भरोसा उठ गया था। इन डाक्टर साहब के बारे में सुनकर यहाँ आए थे। उन्होंने मुँह खोल कर अपने नीचे और ऊपर के दांत दिखाए। एक-आध दांत ही बचे थे। शायद चबाने के मोलर तो नहीं ही रहे होंगे।

इससे पहले कि डाक्टर अपना ओपीनियन देते, दद्दा ने मुद्दे की बात की—
“केतना लागे? हमरे लगे ढेर बा नाहीं।” (कितना पैसा लगेगा? मेरे पास ज़्यादा नहीं है।)

पूछने पर बताया कि भरोसगंज में एक हज़ार में दांत बनवाए थे। शायद यह अंडरस्टेटमेंट हो। दद्दा हज़ार रुपये को बेंचमार्क बनाना चाहते थे।

डाक्टर साहब ने कहा—
“तोहर हड्डी नाहीं बा जौने पर दांत टिकि सकइ।”

फिर उस वृद्ध की मायूसी का असर रहा होगा कि बोले—
“अच्छा, पाँच मिनट रुकिए। एक बार ध्यान से देख कर बताऊँगा कि कुछ हो सकता है या नहीं।”

खुशबू ने देखा कि मैं इस वार्तालाप में रुचि लेता खड़ा हूँ। वह मेरे लिए एक कुर्सी ले आई। बैठने के लिए।

मैं, पूरी जिज्ञासा के बावजूद, वहाँ रुका नहीं—घर से निकले दो घंटे हो गए थे। पत्नीजी घर पर इंतज़ार करती होंगी। मैं चला आया।

पर मन लगा रहा कि उस वृद्ध का क्या हुआ होगा।
डाक्टर साहब कोई समाधान दे पाए होंगे या नहीं।

अगर रुका होता, तो शायद देख पाता…
आख़िर दद्दा को पूरे दांत नहीं चाहिए थे। उन्हें इतना चाहिए था कि खाना फिर से खाना लगे। मिक्सी, ग्राइंडर, उबाल-छान—इन सबके बीच उनकी दुनिया नहीं थी। एक तरफ़ की चौभर मिल जाए तो रोटी-दाल-भात खा सकें।

आप क्या सोचते हैं—क्या हुआ होगा उस ग्रामीण दद्दा का?
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कभी-कभी लगता है—
कुछ पेशों में यह संभावना हमेशा रहती है कि आदमी
सिर्फ़ अपना काम न करे,
कुछ कहानियाँ भी अपने नोट्स में जमा ले,
भविष्य में लिखने के लिए।
शायद स्वमित्र (डाक्टर साहब) के पास वह संभावना खुली है।

सबस्टेक पर पोस्ट का लिंक – https://gyandutt.substack.com/p/130

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