नर्मदा पदयात्रा – सकदी से निसारपुर


#नर्मदापदयात्रा में 10-11वें दिन।

प्रेमसागर की नर्मदा पदयात्रा – दिनांक 25 मई 2025 को सकदी से धर्मराय की यात्रा करीब अढ‌तीस किलोमीटर की हुई।

अगले दिन 26 मई को धर्मराय के नारायण कुटी मंदिर से निसारपुर आने के लिये उन्नीस किलोमीटर चलना हुआ।

सरदार सरोवर परियोजना के कारण केवलिया (गुजरात) से सकदी (मध्यप्रदेश) तक की यात्रा तो नर्मदा से छिटक कर ही हुई। सकदी के आगे परिक्रमा का नर्मदा के तीरे तीरे चलने का सुख प्रेमसागर को मिलने लगा।

कई तरह के हठी परिक्रमावासी हैं। प्रेमसागर को दो लोग मिले जो साइकिल से चल रहे हैं, पर वे जमीन पर बैठते या बिस्तर पर लेटते नहीं। एक जगह एक छोटी आलमारी के ऊपर अधलेटे और बाकी शरीर साइकिल पर साधे वे आराम कर रहे थे। प्रेमसागर को फोटो लेने से मना कर दिया। बकौल उनके “फोटो खिंचवाने से उनका व्रत-अनुष्ठान भंग होगा”। क्या कहा जाये? वे तालिबानी प्रकृति के परिक्रमावासी हैं? वे अपनी अज़ब-गज़ब परिक्रमा के कायदे कानून पालन में ही लगे रहते होंगे!

“भईया उनका दूर से आगे फोटो लूंगा जरूर। काहे कि वे एक दिन में पचास-साठ किलोमीटर चलते हैं साइकिल पर। वे हनुमान मंदिर उमराय (?) में विराम ले रहे थे, तो कभी न कभी आगे निकलते मिलेंगे ही।” – प्रेमसागर ने कहा।

एक और परिक्रमा वासी मिले। वे हिच हाइकिंग (वाहन याचन) के नियम पर चल रहे हैं। वे किसी मोटर साइकिल वाले को हाथ दे कर रोकते हैं और जहां तक वाहन वाला ले जाये, जाते हैं। उसके बाद कुछ पैदल चलते हैं और अगले वाहन को तलाशते रहते हैं।

अनेक तरह के नर्मदा पदयात्री हैं। “कोऊ मुख हीन विपुल मुख काहू” वाले शिवजी के गणों की तर्ज पर नर्मदामाई के भक्त भी विपुल सोची हैं। सब के अपने तरीके हैं और अपने नियम।

“भईया चौमासा में यात्रा विराम करने की भी जरूरत नहीं। एक जगह मुझे बताया गया कि चौमासा शुरू होने पर कुछ दिन देवशयनी एकादशी के बाद रुक कर और एक खंडित यात्रा का संकल्प ले कर यात्रा जारी रखी जा सकती है। मैं अब वैसा ही करूंगा।” – प्रेमसागर उहापोह में थे कि चौमासे में यात्रा रोक कर कैसे रहें, तो उन्हें समाधान मिल गया।

सकदी से आगे एक चित्र

प्रेमसागर ने एक पावर बैंक खरीद लिया है, एक सिम जियो में पोर्ट करा लिया है। एक फीचर फोन खरीदने जा रहे हैं। एक जगह उन्हें नर्मदायात्रा पथ का नक्शा भी मिल गया है। उसके अनुसार रोज करीब बीस किलोमीटर चलते हुये वे आगे की यात्रा करेंगे। एक पिट्ठू भी खरीदेंगे आगे। … यह सब तैयारी जो यात्रा पूर्व होती, वह अब वे एक पखवाड़े के अनुभवों के बाद करेंगे।

सकदी के गुजरिया आश्रम की जमीन पर तरबूज की काफी खेती होती है। एक पूरा तरबूज खाने को मिला बाबाजी को। आगे चल अखल और हथिनी नदी पार की। अखल हथिनी नदी का एक अंग है। हथिनी नदी खुद नर्मदा की एक ट्रिब्यूटरी हैं। ओरसांग नदी के बाद पहली बड़ी नदी।

मध्यप्रदेश का धार जिला आ गया है। रास्ते में एक जगह प्रेमसागर ने बताया – बड़ा दुर्गम रास्ता है, भईया। पहाड़ अजब हैं। पैर पड़ने पर पत्थर टूट जाता है। पानी की बहुत किल्लत है। एक चित्र मैने लिया है जिसमें दस फुट बाई दस का एक कुंड है जिसमें पानी के टैंकर से पानी भर कर रखते हैं लोग। यह पानी परिक्रमा वालों और बाकी लोगों के काम आता है।” एक जगह एक गांव वाले पाटीदार जी ने पानी मंगवा कर प्रेमसागर को पिलाया।

प्रेमसागर ने बताया – बड़ा दुर्गम रास्ता है, भईया।

धर्मराय के नारायण कुटी मंदिर में ट्रस्टी रघु दरबार सोलंकी जी रात में राउण्ड पर आते हैं। व्यवस्था देखते हैं और परिक्रमावासियों की खोजखबर लेते हैं। मेरे मन में प्रश्न उठता है कि नारायण कुटी और इस जैसे सैकड़ों आश्रमों-शालाओं में की जा रही सेवा का अर्थशास्त्र क्या है? आखिर यह धर्म को जीवित रखने और उसके लिये खाद पानी मुहैय्या कराने का कितना शानदार उपक्रम है। समय के साथ इन आश्रमों का स्वरूप बदला होगा। पर आज वह जिस भी तरह से है, वह मन और आत्मा को तृप्त कर जाने वाला है!

नारायणकुटी मंदिर में भोजन-प्रसाद था दाल बाटी। चित्र में देखने में अच्छी लग रही थी थाली।

मार्ग के नदी-पहाड़ और रास्ते – सब खुरदरे और दुर्गम भले हों, मन को मोह लेने वाले हैं। मुझे तो अजीब लगता है कि इतने मनमोहक परिदृष्य में प्रेमसागर तीस चालीस किलोमीटर चलने की बात कैसे करते हैं? यह सीन उनके पैर बांध नहीं लेते? और अगर नहीं बांधते तो प्रेमसागर में सौंदर्यबोध कहां है? आध्यात्मिकता-आस्तिकता बिना सौंदर्य निहारने के कैसे सम्भव है?


मैं नर्मदा की यात्रा पर और जानकारी के लिये तिलकवाड़ा के रवि काका सोनावणे जी से फोन पर बात करता हूं। उनका जीवन तो नर्मदामय है। वे पूरी श्रद्धा से बता रहे थे – “फरवरी का महीना था। हम पांच लोग थे यहीं मंदिर में। मैं चाय बना रहा था कि इतने में एक बहुत सुंदर महिला द्वार पर आई। उसने चाय की मांग की। उसके पैर इतने सुंदर-सुनहरे थे कि मन हो रहा था मैं उन्हें चूम लूंं।कुछ बोल कर वह पीछे की ओर गई। मुझे लगा कि अपना गिलास लेने गई होगी, पर फिर दिखी नहीं। हम सब ने देखा – आसपास जहां तक वह जा सकती रही होगी, देखा। पर मिली नहीं। अहसास हुआ कि मैय्या खुद चल कर दरवाजे पर आई थीं!”

क्या सच वही होता है जो हम आँखों से देखें?
या वह भी होता है, जो हमारी चेतना से टकरा जाए —
बिना दरवाज़ा खटखटाए? यूंही?

रवि जी के लिए यह सच था।
उन्होंने नर्मदा माई को अपनी देह से नहीं,
अपने भीतर के, अंतर्मन के द्वार से देखा था।

कभी तट पर, कभी यात्रा में, और कभी —
मंदिर के दरवाज़े पर।


धर्मराय के आगे यात्रा के दौरान प्रेमसागर ने मुझसे पूछा – “भईया, रास्ते में बच्चा बच्चा अभिवादन करता है “नर्मदे हर”। और उसके साथ मुर्गा भी कुकड़ूं कूं करता है। हर जगह ऐसा लगा है कि पशु पक्षी भी कह रहे हों – नर्मदे हर!

“भईया, मैं अब ज्यादातर नर्मदा परिक्रमा पथ पर चल रहा हूं। पथ से जगह जगह पगडंडी नदी किनारे जाती है।”

निसारपुर के राम मंदिर में मिले गंगाराम पाटीदार जी। उम्र सत्तर की है। उनका गांव सरदार सरोवर परियोजना के जल की चपेट में आ गया। कुछ लोगों को मुआवजा मिला – जमीन मिली। कुछ अभी भी आंदोलन कर रहे हैं। गंगाराम जी पच्चीस साल से आंदोलन से जुड़े रहे हैं।

निसारपुर के पुराने गांव से दो किलोमीटर हट कर यह नया गांव बसा है। पुराने गांव की एक टूटी इमारत का चित्र मिला है। कुछ ऐसा लगता है जैसे हम्पी का कोई खंडहर हो। अब नया मंदिर भी बन रहा है। पाटीदार जी मंदिर में परिक्रमा वासियों की सेवा भी करते हैं। मंदिर में तीन साल की परिक्रमा में चल रहे हीरालाल जी भी हैं। उनका चित्र भी मिला।

मैं सोचता हूं – इन सब चरित्रों और नर्मदा माई के आसपास के बारे में सोचते कितना कुछ लिखा जा सकता है।

मुझे शौकिया ब्लॉगर की बजाय एक इक्कीसवीं सदी का अमृतलाल वेगड़ सरीखा लिखने का यत्न करना चाहिये! … अपनी लेखकीय लिमिटेशन पर कोफ्त होती है। मन में कितना कुछ चलता है, पर उस सब को शब्द कहां से मिलें? नर्मदा माई सहायता करेंगी? वे तो शायद रवि काका जैसे निश्छल चरित्र पर कृपा बरसाती हैं!

नर्मदे हर!


प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस हैprem199@ptyes

नर्मदे हर! नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक

#नर्मदाप्रेम नर्मदे हर!!

गढ़ बोरियाद से सकदी


#नर्मदापदयात्रा में 8-9वें दिन। तेईस मई को प्रेमसागर की गढ़ बोरियाद से कवांट यात्रा 24 किमी की रही। उसके बाद 24 मई को कवांट से सकदी करीब 36 किमी की। इस दो दिन की यात्रा में छोटा उदयपुर (गुजरात) और अलीराजपुर (मध्यप्रदेश) का आदिवासी बहुल इलाका रहा। आदिवासी बहुलता के साथ साथ वहां मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट दोनो लगभग नहीं थे। गढ़ बोरियाद के बाद बाबाजी की लोकेशन अपडेट ही नहीं हुई। कवांट में एक बार गूगल मैप पर बाबाजी झलके। थोड़ी बात हुई तो पता चला कि यात्रा जारी है। ऐसा नहीं हुआ था कि तबियत नासाज़ हो गई हो और यात्रा एक दिन रोकनी पड़ी हो।

कवांट में दिन भर की यात्रा के तीन चार चित्र मिले प्रेमसागर के। उनसे पता चला कि रास्ते में आंधीपानी आया था। एक जगह तो सड़क पर ही बड़ा पेड़ गिर कर रास्ता रोके हुये था। पूरे चौबीस किमी के रास्ते में लोग कम ही मिले। आदिवासी तो उनसे बात करने में छिटकते रहे। प्रेमसागर को लगता है पहले परिक्रमावासियों ने उनसे हेल मेल का प्रयास नहीं किया होगा। आदिवासी लोग रास्ते के बारे में जानकारी भी कम ही दे रहे थे। पूरे रास्ते में दो तीन ही चाय की दुकानें मिलीं। एक जगह आम का जूस बनाने वाले भाई ने जरूर प्रेमसागर को रोक कर जूस पिलाया – दो तीन ग्लास।

दिन में कबीरपंथी मंदिर में उन्हें बाजरे की रोटी के साथ भोजन मिला। “भईया, इस ओर कबीरपंथियों के बहुत से अस्थान-मंदिर हैं। और वे लोग बहुत को‌ऑपरेटिव भी हैं। सब जगह कबीरपंथी अच्छे हैं, सिवाय राजस्थान के।” लगता है राजस्थान में कबीरपंथी मठ वालों ने बाबाजी की उपेक्षा की होगी और कुछ ज्यादा ही की होगी, वर्ना प्रेमसागर यूं कहते नहीं। भोजन की थाली का जो चित्र प्रेमसागर ने भेजा है उसमें भात के साथ उड़द की दाल है और थोड़ी सब्जी या चटनी। रोटी खूब बड़ी है – बाजरे की।

प्रेमसागर का कहना है कि भोजन अच्छा था। यूं, मुझे भोजन करना होता तो बहुत नहीं जमता। मैं तो साल के तीन सौ पैंसठ दिन अरहर की दाल सेवन करने वाला यूपोरियन हूं। और बाजरे का इतना बड़ा रोटला तो शायद ही हजम हो। उतना खाना हो तो गले के नीचे धकेलने के लिये एक ग्लास छाछ की जरूरत भी होगी!

कवांट में प्रेमसागर ने हनुमान मंदिर में नृत्य गोपालदास जी से मुलाकात की। पता नहीं कवांट में कैसे पंहुचे थे नृत्य गोपालदास जी। शायद हिंदू संगठन आदिवासियों में पैंठ बना रहे हैं दशकों से। उसी संदर्भ में महंत जी वहां हों! प्रेमसागर ने कहा कि उन्हें देखते ही पहचान गये। प्रेमसागर आठ साल पहले अयोध्या में मिले थे महंत जी से। छियासी-सतासी साल के होंगे नृत्यगोपाल दास जी। प्रेमसागर को पहचान लेने से जाहिर होता है कि उनकी स्मृति बहुत अच्छी है – इतनी अधिक उम्र के बावजूद।

आज सवेरे एक महिला पुदीना की पत्तियां छांट रही थी रास्ते में। उसने प्रेम बाबाजी को रोक कर चाय पिलाई। साथ में बिस्कुट भी खिलाया। महिला ने बोला – बाबा, दूध नहीं है। लाल चाय चलेगी? प्रेमसागर कैसी भी चाय खुशी खुशी पी सकते हैं यात्रा के दौरान उस महिला ने हरी पत्तियों के बारे में बताया कि वे लोग इसको फुदीना कहते हैं। पुदीना से आदिवासी इलाके में उच्चारण बदल कर फुदीना हो जाता है। झाबुआ का मेरा आदिवासी भृत्य चाय को शाय कहता था। उच्चारण का यह परिवर्तन कुछ वैसा ही है।

कवांट के आदिवासी इलाके में भी कहीं तो प्रेमसागर को सत्कार मिला! मेरे ख्याल से, अमूमन, परिक्रमावासियों से आदिवासी अगर सहयोग नहीं करते तो उसमें ज्यादा, या फिर पूरा दोष परिक्रमावासियों का ही होगा। वे आदिवासियों को पूरे भाव, पूरे आदर से नहीं ही देखते होंगे।

प्रेमसागर ने बताया कि एक जगह एक महिला ने उन्हें रोक लिया। कहा कि उसकी शादी हुये पांच साल हो गये हैं। पर बाल-बच्चा नहीं हुआ। वह रोने लगी। उसने बताया कि लोगों ने सलाह दी है परिक्रमावासी को भोजन कराने से पुण्य होगा और उससे बच्चा होगा। बाबाजी को उसने भोजन कराया। … नर्मदा माई भोजन देती हैं पर भक्त की क्षुधा मिटाने के साथ साथ भोजन कराने वाले के पुण्य का इंतजाम भी करती हैं! हम सभी नर्मदा माई से प्रार्थना करें कि उस महिला की गोद जल्दी भरे।

“भईया, कवांट के आगे यह इलाका तो बहुत मन मोहक है। लोग कहते हैं कि गर्मी के इस समय में जीवजंतु ज्यादा निकलते हैं यहां, इसलिये गर्मी के मौसम में परिक्रमावासी को वे जल्दी से जल्दी माहेश्वर पंहुचने की सलाह देते हैं। यही कारण है कि मैं चालीस पचास किमी रोज चल कर माहेश्वर पंहुचने की सोच रहा हूं; तीन दिन में। वर्ना कार्तिक का महीना होता तो मैं नर्मदा के तीरे तीरे चलता।” – प्रेमसागर ने अपने तेज चलने को सही ठहराने के लिये कहा। वैसे, मेरा सोचना है कि प्रेमसागर तो आराम आराम से यात्रा करनी चाहिये। नर्मदा और प्रकृति को निहारते हुये। रास्ते में आते सभी तीर्थ स्थलों को देखते हुये।

कवांट के आगे के कुछ चित्र वास्तव में मन मोहक हैं। प्रेमसागर का मोबाइल कैमरा उतना अच्छा नहीं, कभी कभी चित्र या उनके कोने धुंधले हो जाते हैं। पर फिर भी चित्र गज़ब के हैं। इलाका प्रकृति की गोद में है। चित्रों को देख कर वह फिल्म का गीत याद हो आता है – हरी भरी वसुंधरा… ये कौन चित्रकार है? ये कौन चित्रकार!

मैं गूगल मैप पर इलाके की हवा की गुणवत्ता देखता हूं तो देश के कई भागों से कहीं बेहतर दिखती है। क्या कारण है कि जो इलाके ज्यादा “खतरनाक” हैं या ज्यादा अगम्य, वे सुंदर भी हैं और उनकी आबोहवा भी बेहतर है। चाहे वह छोटा उदयपुर हो, अलीराजपुर हो, अबूझमाड़ हो, पूर्वोत्तर भारत हो या स्वात घाटी! आप वहां, शायद, रह नहीं सकते; वहां जाने की भी न सोचते हों; पर वे जगहें आपको ललचाती बहुत हैं। भला हो प्रेमसागर का, जिनके जरीये मैं एक वैसा इलाका देख पाया।

आज प्रेमसागर टेमला के महादेव मंदिर तक जाना चाहते थे। वह स्थान सकदी से पांच किमी आगे है। पर “भईया, थकान लग रही थी तो यहीं रुक गया हूं। कल आगे बढ़ूंगा।” शायद मेरा यह कहना कि आराम आराम से यात्रा करनी चाहिये, उनके मन में कुछ धंसा है!


ज़ारिया से ग़ढ़ बोरियाद


#नर्मदायात्रा के सातवें दिन (दिनांक 22 मई25) ज़ारिया से गढ़ बोरियाद चलना हुआ।

अब तक यात्रा गंगा तीरे तीरे हो रही थी, पर सातवें दिन नर्मदा के ऊपर बने बांध का असर परिक्रमा पर दिखने लगा। बाबाजी अब नर्मदा का किनारा छोड़ उनसे दूर उत्तर की ओर चले। नर्मदा से दूर जाना हुआ तो माई लगता है कुछ रूठ सी गईं। रात में आंधीपानी से हनुमान मंदिर के पुजारी -सदानंद चैतन्य जी, भोजन नहीं बना सके। प्रेम बाबा बिना खाये, पानी पी कर सो रहे। सातवें दिन भोर में एक दुकान पर चाय पी और आगे की यात्रा पर निकल लिये।

प्रेमसागर ने यह विवरण सामान्य तौर पर दिया। मेरे साथ यह हुआ होता तो मैं इसको यात्रा की एक क्राइसिस मान कर चलता और अपनी यात्रा तैयारी को रिव्यू करने बैठ जाता। प्रेमसागर ने वह सब नहीं किया। खेते खेते (पगडंडी वाले रास्ते से) आगे बढ़ लिये। रास्ते में कहीं केले मिले तो वही खा कर अपनी भूख शांत की। दिन में नेटवर्क नहीं मिल रहा था तो उनकी चाल का भी अंदाज नहीं लगा। चित्र भी देरी से, दो चार मिले।

सरदार सरोवर परियोजना से निकली नर्मदा नहर पार हुई। नक्शे के अनुसार तो वे इस नहर के साथ साथ चले, पर प्रेमसागर ने ‘खेते खेते’ शब्द का प्रयोग किया। खेते खेते चल कर भी कुछ खास श्रम नहीं बचा होगा। मेरे ख्याल से उन्हें नर्मदा नहीं तो नर्मदा नहर के साथ साथ यात्रा करनी चाहिये थी।

नर्मदा परिक्रमा करते हुये नर्मदा से दूर जाना प्रगति का अभिशाप ही माना जायेगा। आगे पचास-साठ किलोमीटर की यात्रा नर्मदा से तीस किमी की दूरी बना कर ही होगी। बाँध के जलाशय के कारण नर्मदा की मूल धारा पता नहीं चलती। नक्शे में साफ पता चलता है कि बहुत बड़े इलाके में जंगल, आदिवासी बस्तियाँ और पुराने घाट अब पानी में हैं। इसलिए परिक्रमावासी को मजबूरी में 25-30 किलोमीटर दूर तक घूमकर आना पड़ता है। प्रेमसागर ने वैसा ही किया आज।

प्रेमसागर की प्रवृत्ति का मैं नहीं कह सकता, पर तपस्वी नर्मदा पदयात्री तो नर्मदा तीरे तीरे चलते हुये शरीर के साथ साथ मन से नर्मदा के सानिध्य में रहता होगा। अब शरीर से वह नर्मदा के सानिध्य में नहीं होता तो मन साधने के लिये अतिरिक्त निष्ठा-अनुशासन का परिचय देना होता होगा। प्रेमसागर मन में नर्मदा के पदयात्री शायद उतने गहरे से नहीं हैं। उनके लिये यह डी-टूर केवल तीस किलोमीटर अतिरिक्त चलना भर ही हो शायद।

एक सच्चा परिक्रमा-यात्री कहता है – “अब यह नदी की परिक्रमा नहीं, बाँध की परिक्रमा हो गई है।” शायद स्वर्गीय वेगड़ जी आज परिक्रमा करते तो ऐसा ही कुछ कहते!


करीब 23 किलोमीटर चल कर प्रेमसागर गढ़ बोरियाद के एक और हनुमान मंदिर पंहुचे। बारिश के कारण दिन का ताप ज्यादा नहीं था। प्रेमसागर का कहना था कि ऐसा मौसम रहा तो वे रोज चालीस किलोमीटर चल पायेंगे और यात्रा जल्दी पूरी की जा सकेगी। वे ज्यादा चलने के मोह में पड़े हैं। अपने पैरों की चलने की ताकत का इम्तिहान शायद दे रहे हैं वे पदयात्रा के माध्यम से। वे पिछले सप्ताह भर में यह तय नहीं कर सके हैं कि यह यात्रा एक अलग प्रवृत्ति के साथ होनी चाहिये। इस यात्रा में नर्मदा का सौंदर्य और आध्यात्मिक अनुभूति महत्वपूर्ण है बनिस्पत किलोमीटर धांगने के!

ज्यादा बात नहीं हो पाई प्रेमसागर से। उनके पास एक एयरटेल का ही सिम है जो आदिवासी क्षेत्र में मिलता कम है, खो जादा जाता है। अब वे तलाश में है कि एक जियो का फीचर फोन भी रख लें। दो अलग अलग फोन रहने से नेटवर्क की रिडंडेंसी बढ़ जायेगी और बाहरी दुनिया से बेहतर सम्पर्क हो सकेगा। यह सब तैयारी यात्रा पूर्व होनी थी। पर देर आये, दुरुस्त आये – अब एक दो दिन में वे फीचर फोन ले लें और चना चबैना का इंतजाम कर लें तो बेहतर। उन्हें एक थैले की बजाय पिट्ठू लेना है, जिससे एक ओर ज्यादा वजन न रहे यात्रा के दौरान। यह भी यात्रापूर्व की तैयारी का भाग होना था। … एक सप्ताह की पदयात्रा तो यात्रा का प्रेपरेटरी अंश ही माना जाये।


गढ़ बोरियाद के मंदिर के पुजारी हैं प्रदीप भाई। वे बदायूं के हैं। उनका परिवार भी साथ रहता है। बदायूं यहां से सवा दो सौ किमी दूर है। ज्यादा दूर नहीं है। सेमी-आदिवासी इलाके में उत्तर प्रदेश के बाभन-पण्डित की बहुत इज्जत है। प्रदीप भाई के साथ भी वैसा ही होगा! चित्र में प्रेमसागर के साथ प्रदीपभाई हैं। बगल में शायद उनकी बेटी है। एक दूसरे चित्र में प्रदीप भाई के परिवार के लोग हैं।

गढ़ बोरियाद एक राजपूत रियासत रही थी। खीची चौहानों की रियासत। वंशावली में सबसे पहले नाम आता है राणा भरतसिंह जी ठाकुर साहेब। उनका जन्म 1829 में हुआ था। रियासत का सन 1877 में राजस्व 12700 रुपये था। इस राजस्व में से राणा साहेब की आमदनी अगर पांच हजार रुपया मानी जाये और रुपये की कीमत दस साल में दुगनी होती मानी जाये तो आज रियासत के वंशज को 16-17करोड़ सालाना की आय होगी। और गढ़ बोरियाद तो एक छोटी आदिवासी बहुल रियासत ही रही होगी।

रियासत की वंशावली में ताजा नाम ठकुरानी विजयविजय कुवंर का आता है जिनकी शादी पड़ोस की रियासत नसवाड़ी में हुई है। इलाके की जनता ठकुरानी साहिबा को आज भी डेमी गॉड समझती होगी। प्रेमसागर किसी स्थानीय से इस बारें में बात करते तो मुझे जानकारी पुष्ट करने का अवसर मिलता ब्लॉग-लेखन के लिये। … पर यह होता तो वह होता वाली बात बेकार की है।

वैसे आगे प्रेमसागर पदयात्रियों और आदिवासियों से बेहतर प्रेपरेशन के साथ मिलें लौटानी की नर्मदा के दक्षिण तट की यात्रा के दौरान, इसकी कामना मन में जन्मी है!

कल प्रेमसागर गुजरात के नर्मदा जिले में थे। आज वे छोटा उदयपुर जिले में रात गुजार रहे हैं। आगे पड़ेगा मध्यप्रदेश का अलीराजपुर। अलीराजपुर में प्रेमसागर के जानपहचान वाले हैं। वहां पंहुचने की तीव्रता से प्रतीक्षा है उन्हें।

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

#नर्मदाप्रेम नर्मदे हर!!

गढ़बोरियाद रियासत – एक आना की कोर्ट फीस की रसीद।

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