टूण्डला – एतमादपुर – मितावली – टूण्डला


टूण्डला से आगरा जाने की रेल लाइन पर अगला स्टेशन है एतमादपुर। और टूण्डला से दिल्ली जाने के रास्ते में पहला स्टेशन है मितावली। इन तीनों स्टेशनों को जोडने वाला एक रेल लाइन का त्रिभुज बनता है। मैंने आठ अगस्त को उस त्रिभुज की यात्रा की।

गूगल अर्थ पर दिखता रेल पटरियों का टूण्डला-एतमादपुर-मितावली का त्रिभुज।

टूण्डला से हम एक पुश-ट्रॉली पर रवाना हुये। पुश ट्रॉली को चार व्यक्ति धक्का देते हैं चार पहियों की यह ट्रॉली जब पर्याप्त गति पकड़ लेती है तो वे उछल कर ट्रॉली पर सवार हो जाते हैं। जब ट्रॉली रुकने लगती है तो वे पुन: उतर कर धक्का लगाते हैं। इस तरह यह ट्रॉली औसत २०-२५ किमीप्रघ की रफ्तार से चलती है। हमारी ट्रॉली पर धक्का लगाने वाले छरहरे बदन के स्वस्थ लोग थे। उनमें से एक अधेड़ था और वाचाल भी। वह बीच बीच में स्थान के बतौर गाइड अपनी टिप्पणियां भी करता जा रहा था। उससे काफी जानकारी मिली।

टूण्डला से एतमादपुर के रास्ते में सरपत की बड़ी बड़ी घास है ट्रैक के दोनो ओर। उनमें से निकल कर जीव ट्रैक पार करते दिखे। तीन जगह तो विषखोपड़ा (गोह की प्रजाति का जीव – साइज में काफी बड़ा – लगभग पौना मीटर लम्बा) सरसराता हुआ पटरी पार कर गया हमारे आगे। एक जगह एक पतला पर काफी लम्बा सांप गुजरा। यूं लगा कि टूण्डला से बाहर निकलते ही अरण्य़ प्रारम्भ हो गया हो।

टूण्डला से निकलते ही ऊंची ऊंची घास दिखी ट्रैक के किनारे।

टूण्डला एक छोटा कस्बा जैसा स्थान है। इसका अस्तित्व रेलवे का एरिया ऑफिस होने के कारण ही है। हमारे डिविजनल ट्रैफिक मैनेजर श्रीयुत श्रीकृष्ण शुक्ल, जो टूण्डला में नियुक्त हैं और मेरे साथ थे, ने बताया कि टूण्डला की बाजार की अर्थव्यवस्था रेलवे स्टाफ की लगभग बीस-पच्चीस करोड़ की सालाना सेलेरी पर निर्भर है। उसके अलावा कोई उद्योग यहां नहीं है। इस जगह के आसपास के किसान (टूण्डला-फिरोज़ाबाद-इटावा-मैनपुरी का इलाका) जरूर आलू की पैदावार से सम्पन्न हैं। अत: इलाके में कई कोल्ड स्टोरेज मिल जायेंगे। इस इलाके में आलू के चिप्स की युनिटें और आलू से बनने वाली शराब की ब्रुवरी लगाने की सम्भावनायें है। इसके अलावा डेयरी के लिये पशुपालन और उनके लिये चारा बोने का प्रचलन है आस पास के गांवों में – ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया।

पर मुझे आस पास की कृषि भूमि पर छुट्टा घूमते बहुत स्वस्थ नीलगाय दिखे। हमारे विद्युत अभियन्ता श्री ओम प्रकाश पाठक ने बताया कि नीलगाय के ट्रैक पर आने और इन्जन से टकराने के कारण इन्जन फेल होने की घटनायें बहुत होती हैं।

मेरे पास अच्छा कैमरा न होने के कारण विषखोपड़ा, सांप या नीलगाय के चित्र नहीं ले पाया। पर उनके चित्र जेहन में गहरे से उतर गये। ये जीव जितने भयानक थे, उतने ही सुन्दर भी। एतमादपुर से मितावली के बीच मुझे एक दो पेड़ों पर बया के ढेरों घोंसले दिखे।  पुश ट्रॉली रुकवा कर मैने पेड़ के पास जा कर उनके चित्र लेने चाहे तो एक ट्रॉली मैन आगे आगे चला। वास्तव में घास के बीच कुछ सरसराता हुआ आगे चला गया। एक बड़ा जानवर – शायद नीलगाय भी आगे चरी के खेत में जाता दिखा। घास में बहुत से भुनगे-टिड्डे उड़ते दिखे। अगर वह ट्रॉली मैन आगे न होता तो मैं आगे के गढ्ढे को भांप न पाता और एकबारगी तो उसमें गिर ही जाता।

पेंड पर लगे बया के घोंसले।

खैर, बया के घोंसलों के चित्र ले ही लिये – यद्यपि थोड़ा दूर से। ट्रॉली मैन ने बया का एक घोंसला तोड़ कर लाने का प्रस्ताव रखा – पर मैने जोर दे कर मना कर दिया – किसी का घर उजाड़ना कोई अच्छी बात थोड़े ही है।

मितावली और टूण्डला के बीच नेशनल हाईवे अथॉरिटी के इन्जीनियर रेल के ऊपर रोड ओवर ब्रिज के निर्माण के लिये ट्रैक का ब्लॉक ले कर काम कर रहे थे। उन्होने बताया कि अभी सत्तर-सत्तर मिनट के बीस पच्चीस ब्लॉक की और जरूरत पड़ेगी। ब्लॉक निर्धारण का अधिकार श्रीकृष्ण के पास है। अत: इस दौरान उन्होने हमसे बहुत मैत्री युक्त बातचीत की।

रोड ओवर ब्रिज के नीचे नेशनल हाईवे अथॉरिटी के इन्जीनियर्स से पुश ट्रॉली से उतर कर बात करते श्रीयुत श्रीकृष्ण शुक्ल।

टूण्डला आने के पहले एक बड़ा कैम्पस दिखा – डा. जाकिर हुसैन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी एण्ड मैनेजमेण्ट। भव्य बिल्डिंग। उसका बोर्ड बता रहा था कि ZHITM के १५ कैम्पस, २० कोर्सेज और पच्चीस हजार से अधिक विद्यार्थी हैं। … आज कल इस तरह के सन्थानों की जो दशा है, उसके अनुसार इन पच्चीस हजार में से कम से कम बाईस हजार विद्या की अर्थी ढोने वाले ही होंगे, विद्यार्थी नहीं।

खाड़ी के देशों की कमाई से खड़े किये गये ये सन्थान, जिनमें बिल्डिंग है पर अन्य इन्फ्रॉस्ट्रक्चर नगण्य़ है और फेकेल्टी को छ से दस हजार की मासिक सेलरी पर रखा जाता है – उनसे गुणवत्ता की क्या अपेक्षा की जा सकती है?

डा. जाकिर हुसैन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी एण्ड मैनेजमेण्ट का कैम्पस।

टूण्डला के बाहर माननीय कांसीराम आवास योजना के अन्तर्गत बनते मकानों का परिसर भी नजर आया। शहर से पांच किलोमीटर दूर। यह परिसर दुकानों, स्कूल, डिस्पेंसरी आदि की सुविधाओं से लैस होगा। पर यहां रहने वाले लोगों को आजीविका के लिये अगर टूण्डला आना जाना हुआ तो उनका काफी पैसा और समय कम्यूटिंग में लग जायेगा। खैर, बनता हुआ परिसर अच्छा लग रहा था। पता नहीं, समाजवादी पार्टी की नयी सरकार परियोजना को धीमा न कर दे!

टूण्डला के बाहर माननीय कांसीराम आवास योजना के अन्तर्गत बनते मकान।

पूरी पुश ट्रॉली यात्रा के अन्त में टूण्डला यार्ड में एक अठपहिया ब्रेकवान दिखा। यह ब्रेकवान निश्चय ही मालगाड़ी के गार्ड साहब की यात्रा पहले के चारपहिया ब्रेकवान की उछलती हिचकोले खाती और शरीर के पोर पोर को थकाती जिन्दगी से बेहतर बना देगी। उत्तरोत्तर ये ब्रेकवान बढ़ रहे हैं, पुराने चार पहिया वालों को रिप्लेस करते हुये।

टूण्डला यार्ड में एक मालगाड़ी का आठपहिया ब्रेकवान।

टूण्डला की पुरानी क्रेन


टूण्डला फिरोज़ाबाद जिले का पुराना रेलवे शहर है। रेलवे लाइन यहां १९वीं सदी के उत्तरार्ध में बनी होगी। तब की इमारतें, वस्तुयें यहां उपलब्ध हैं।

आज यार्ड में घूमते हुये मुझे यह सन् 1879 की हाथ से चलने वाली दस टन की क्रेन दिखी। बहुत सुन्दर। अब निश्चय ही काम में नहीं आती होगी – यद्यपि अभी भी रेल की पटरी पर खड़ी थी।

उसपर उपलब्ध प्लेक के अनुसार वह Cowans Sheldon & Co Ltd द्वारा Carlisle, England में 1879 की बनी है। उसका नम्बर 1001 है।

10 Tonne Hand Crane at Tundla
The plaque on Hand Crane

सुन्दर लग रही है यह दस टन की हाथ से चलने वाली क्रेन, नहीं? कई महत्वपूर्ण इमारतों के सामने रेलवे वाले नैरो गेज के इंजन लगाते हैं। आर्मी वाले टैंक और एयर फोर्स वाले फाइटर प्लेन। उसी तरह किसी इमारत के सामने यह क्रेन रखी जा सकती है – उसके सामने का अच्छा व्यू देने के लिये!


डाटा


जब (सन् 1984) मैने रेलवे सर्विस ज्वाइन की थी, तब रेलवे के यार्ड और स्टेशनों से ट्रेन चलने का डाटा इकठ्ठा करने के लिये ट्रेन्स क्लर्क दिन रात लगे रहते थे। एक मालगाड़ी यार्ड में आती थी तो वैगनों का नम्बर टेकर पैदल चल कर उनके नम्बर उतारता था। यार्ड के दफ्तर में हर आने जाने वाली गाड़ी का रोजनामचा हाथ से भर जाता था। वैगनों का आदानप्रदान जोड़ा जाता था। हर आठ घण्टे की शिफ्ट में उसकी समरी बनती थी। इसी तरह ट्रेनों के आने जाने का हिसाब गाड़ी नियन्त्रक हाथ से जोड़ते थे।

मैने इलेक्ट्रानिक्स इन्जीनियरिंग पढ़ी थी अपने एकेडमिक लाइफ में। पर यहां मैने जल्दी जल्दी पूरा प्रयास कर वह दिमाग से इरेज़ कर आठवीं दर्जे का जोड़-बाकी-गुणा-भाग री-फ्रेश किया। उससे ज्यादा का ज्ञान ट्रेन चलाने में काउण्टर प्रोडक्टिव था।

हर रोज इतना अधिक डाटा (आंकड़े) से वास्ता पड़ता था (और अब भी पड़ता है) कि डाटा के प्रति सारी श्रद्धा वाष्पीकृत होने में ज्यादा समय नहीं लगा था मुझे।

 बहुत सारा और बहुत एक्यूरेट डाटा हमसे बहुत कुछ चूस रहा है। यह बेहतर मैनेजर तो नहीं ही बना रहा। और नेतृत्व की भूत काल की ब्रिलियेंस भी अब नजर नहीं आती। शिट! आई एम मोर इनफॉर्म्ड, बट एम आई मोर अवेयर? एम आई मोर कॉन्फीडेण्ट ऑफ माईसेल्फ?

उस जमाने में डाटा को लेकर मन में विचार बनता था कि जितनी वर्जिनिटी की अपेक्षा एक प्रॉस्टीट्यूट से की जा सकती है, उतनी डाटा से करनी चाहिये। पर उस डाटा से भी जितने काम के मैनेजमेण्ट निर्णय हम ले पाते थे, वह अपने आप में अद्भुत था।

अब समय बदल गया है। ट्रेन रनिंग के सारे आंकड़े रीयल टाइम बनते हैं। उनमें हेर फेर करना बहुत कठिन काम है – और उसके लिये जिस स्तर के आर्ट की जरूरत होती है, वह आठवीं दर्जे के गणित की बदौलत नहीं आ सकता। उससे ज्यादा की अपनी केपेबिलिटी नहीं बची। :sad:

माल यातायात की सूचना प्रणाली का पोर्टल। यह इतना ज्यादा डाटा (सूचना के आंकड़े – कच्चे और परिष्कृत/प्रॉसेस्ड) देता है कि सिर भन्ना जाये! :-)

बहुत सारा और बहुत एक्यूरेट डाटा हमसे बहुत कुछ चूस रहा है। यह बेहतर मैनेजर तो नहीं ही बना रहा। और नेतृत्व की भूत काल की ब्रिलियेंस भी अब नजर नहीं आती। शिट! आई एम मोर इनफॉर्म्ड, बट एम आई मोर अवेयर? एम आई मोर कॉन्फीडेण्ट ऑफ माईसेल्फ?

मुझे मालुम है रेलवे में लोग, सिर्फ तर्क देने की गरज से मेरी यह सोच डिनाउंस करेंगे। और मेरा कहना आउट राइट खारिज कर दिया जायेगा। पर बेहतर बात यह है कि रेलवे वाले मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ते@।

[@ – रेलवे में तो कोई यह मानता/जानता ही नहीं कि मैं हिन्दी में लिखता हूं! किसी हिन्दी के समारोह में मुझे नहीं बुलाया जाता। जब लोग हिन्दी के फंक्शन में समोसा-पेस्ट्री उडाते अपने ईनाम के लिफाफे जेब में ठूंस रहे होते हैं, मैं अपने आठवीं दर्जे के गणित से गाड़ियां गिन रहा होता हूं, अपने चैम्बर में! :lol: ]

मेरी सारी नौकरी डाटा से काम करते बीत गयी है – अब तक। पर डाटा के प्रति अश्रद्धा उत्तरोत्तर बढ़ती गयी है!


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