भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
मेरे दफ्तर जाने के रास्ते में तेलियरगंज के बाद चार पांच घर कुम्हारों के हैं। बरसात के महीनों में उनकी गतिविधियां ठप सी थीं। अब देखता हूं कि बहुत व्यस्त हो गये हैं वे। तन्दूर, गुल्लक, मटके आदि बनाने का काम तो सतत चलता है, पर इस समय दीपावली आने वाली है, सो दिये बनाने का काम जोरों पर है। चाक चला कर दिये बनाने का काम सवेरे होता है। मैं आज जब उनके पास से गुजरा तो दोपहर होने को थी। कोंहाइन (कुम्हार की पत्नी) दिये सुखाने के लिये जमा रही थी जमीन पर। हर परिवार का एक एक चाक था, पर उससे काम वे कर चुके थे। वह जमीन पर पड़ा दिखा।
भगवान इन लोगों को बरक्कत दें। प्लास्टिक – मोमबत्ती की बजाय लोग दिये पसन्द करें। दिवाली में चाइनीज एल.ई.डी. बल्ब की लड़ी की बजाय लोग इन दियों का प्रयोग करें।
प्रशांत भूषण को पीटने की बजाय जवान लोग गंगाजी की सफाई और दीयों के प्रचार प्रसार में जोर लगायें। उसी में मन लगा कर जै श्री राम होगा!
जवाहिरलाल वापस आ गया है। दो महीना पहले उसे सांप ने काट खाया था। अस्पताल में भर्ती कराया गया। फिर उसके बन्धु गण आये और उसे मछलीशहर ले गये। अब वह ठीक है। कल सवेरे वह शिवकुटी के गंगाजी के घाट की सीढ़ियों के पास अपने नियमित स्थान पर बैठा पाया गया। इससे पहले कि मैं अपने सैर की वापसी में उसे देखता, मुझे जो भी रास्ते में मिला, बताता गया – जवाहिरलाल वापस आ गया है। अब ठीक ठाक है! यह मानो बैनर हेडलाइन्स वाली खबर हो शिवकुटी टाइम्स की।
घाट पर अपने नियत स्थान पर वापस बैठा जवाहिरलाल। मुंह में मुखारी है।
जवाहिरलाल मेरे ब्लॉग का एक खम्भा है। उसपर कई पोस्टें हैं –
सांप काटे रहा। एत्ता बड़ा क रहा नाग। नागिनियऊ रही। दुन्नौ काटे रहें। (सांप ने काटा था। इतना बड़ा था नाग। नागिन भी थी। दोनो ने काटा था)
जवाहिर हाथ से बताने लगा कितना बड़ा था नाग, लगभग डेढ़ हाथ का था।
जवाहिर हाथ से बताने लगा कितना बड़ा था नाग, लगभग डेढ़ हाथ का था। कोबरा के लिये तो यह लम्बाई कम है – लगता है कोई और जाति का रहा होगा सांप। उसने जो बताया उससे पता चला कि पेड़ की कोटर में मुखारी रखी थी उसने। उसे लेने के लिये हाथ डाला तो वहां बैठे नाग नागिन दोनो ने काट खाया।
मैने पूछा कि मुखारी (नीम की दातुन) वहां क्यूं रखते हो? इसपर उसने कुछ आश्चर्य से मेरी तरफ देखा – अऊर केहर रखाये? (और कहां रखी जायेगी?)
फक्कड़ी जवाहिरलाल। गंगाजी के कछार में भोर में निपटान करता है। कोटेश्वर महादेव जी के मन्दिर की नीम से दातुन तोड़ता है। अगले एक दो दिन के लिये नीम की कोटर में दातुन रख देता है और अपने नियत स्थान पर बैठ कर एक घण्टा भर मुखारी करता है। बीच बीच में कुकुर, बकरी, सूअर, पक्षियों से बातचीत भी करता जाता है।
अब वह वापस आ गया है। घाट की रौनक आ गयी है। मेरी पत्नीजी का सोचना है कि नाग-नागिन के काटे पर भी वह इस लिये बच गया कि खाद्य-अखाद्य खाने-पीने के कारण उसके रक्त में बहुत प्रतिरोधक क्षमता है। आखिर शिवजी का गण है वह – फक्कड़ी और अघोरी![1]
[1] जवाहिर लाल पर नवम्बर’2009 में लिखी अघोरी पोस्ट का अंश:
पण्डाजी ने मानो (अघोरी) शब्द लपक लिया।
“अघोरियै तो है। पहले कभी बंगाल गया था वहां का जादू सीखने। जान गया था। तान्त्रिक बन गया था । फिर किसी और बड़े तांत्रिक ने इसका गला बांध (?) दिया। अब साफ साफ नहीं बोल पाता तो वे तान्त्रिक मन्त्र स्पष्ट उच्चारित नहीं कर सकता।”
जवाहिरलाल यह स्मित मुस्कान के साथ सुन रहा था – मानो हामी भर रहा हो।
पण्डाजी ने आगे बताया – यह खटिया पर नहीं सोता। जमीन पर इधर उधर सो जाता है। कुकुर बिलार आस पास रहते हैं। एक बार तो कोई पगलाया कुकुर बहुत जगह काटा था इस को। कोई इलाज नहीं कराया। जब मन आता है जग जाता है। कभी कभी आटा सान कर इसी अलाव में बाटी सेंक लेता है। और कभी मन न हो तो पिसान को पानी में घोर (आटा पानी में घोल) यूंही निगल जाता है।
मेरी छप्पन वर्ष की अवस्था में मुझे बताया गया है कि मैं टाइप-II डायबिटीज/मधुमेह [1] की योग्यता प्राप्त कर चुका हूं। मुझे कम से कम कुछ समय तक डायबिटीज की दवाओं पर रहना होगा। धूम्रपान (जो मैं नहीं करता) से परहेज रखना होगा। मदिरापान (जो मैं नहीं करता) मॉडरेशन में रखना होगा और सप्ताह में कम से कम 200 मिनट ब्रिस्क-वॉक का रूटीन बनाना होगा।
मैने चाय बिना चीनी की कर दी है। मिठाई और चीनी/खांड/गुड़ का प्रयोग कम कर दिया है, यद्यपि उस अनुशासन में कुछ परेशानी हो रही है। एक आध बार तो शर्करा का स्तर कम होने के कारण चक्कर आ गया और मिठाई सेवन का एक बहाना मिल गया। पर यह स्पष्ट हो गया है कि जिह्वा पर नियंत्रण के बिना जीवन के पैरामीटर नहीं बन सकते अब! :-(
ब्रिस्क-वॉक के लिये भी उद्यम करना पड़ रहा है। सड़क पर चलने की बजाय गंगाजी की रेती में चलना मुझे ज्यादा उपयुक्त विकल्प जान पड़ रहा है।
जैसा मैने पिछली पोस्ट में लिखा था – सवर्णघाट पर सभ्य सवर्णों ने गन्द मचा रखा है। वहां जाने पर भी मन में खीझ होती है। अत: मैने तय किया कि विस्तृत निषाद क्षेत्र में भ्रमण किया जाये।
निषादक्षेत्र में शराब बनाने वाली भट्टियों का समूह।
पिछले कुछ दिनों से मैं सवेरे पौने पांच बजे उठ कर साढ़े पांच तक घर से निकल ले रहा हूं। शिवकुटी मन्दिर के घाट पर उतरने वाली सीढ़ियों के तुरंत बाद पगडण्डी बन गई है सवर्णघाट पर गंगानदी की जलधारा तक। यहां आस्तिक लोग स्नान करते हैं। अपना घर का पूजापाठ का कचरा फैंकते हैं और उसी पगड़ण्डी में ही खुदाई कर रेत अपने घर ले जाते हैं – गंगाजी की पवित्र रज!
सवर्ण क्षेत्र से निषाद क्षेत्र में जाने के लिये मेरे जैसे प्रात-भ्रमण करने वालों ने एक पगडण्डी बना ली है। इस पगडण्डी के दायें बायें अभी रेत युक्त कछारी मिट्टी सूख रही है और उसमें चलने पर रपट जाने का खतरा रहता है। करीब 200 कदम इस पगडण्डी पर चलने के बाद निषाद क्षेत्र का विस्तार मिलता है। वहां मिट्टी कम है, रेत ज्यादा है। लिहाजा सूख चुकी है; और मजे में घूमा जा सकता है वहां!
गंगाजी के किनारे दीखती हैं नावें। कुछ नावें अभी रेती में उल्टी पड़ी हैं। उनका उपयोग शायद कुछ दिनों में प्रारम्भ हो, जब उसपार खेती करने के लिये मल्लाह लोग नित्य आने जाने लगें। अभी तो कुछ नावें मछली मारने के लिये और कुछ देसी शराब को लाने ले जाने के लिये प्रयोग में लाई जा रही हैं!
बहुत विस्तृत है निषाद क्षेत्र। घूमने में तीन चार किलोमीटर आसानी से चलते चले जा सकते हैं निर्बाध। बीच बीच में इक्का-दुक्का लोग दीखते हैं – अपने काम पर जाने वाले। एक दो लोग निपटान के लिये बैठे दीखते हैं। टिटिहरी और बगुले इधर उधर उड़ान भरते पाये जाते हैं। अभी बहुत गहरे से पगडण्डियां नहीं बनी हैं, लिहाजा भ्रमण भेड़ियाधसान सा होता है और रास्ता बदलता रहता है। चिन्ह बनाने को कुछ ही स्थान हैं।
गंगा किनारे पंहुचते समय वहां कच्ची शराब बनाने और स्टोर करने के उपक्रम दीखने लगते हैं – पीपे, जमीन में बनाये गये गढ्ढ़े, भट्टियां, जलाऊ लकड़ी, कथरी और बोरे (जिनसे जमीन में गाड़े गये शराब के पीपे ढंके जाते हैं) इत्यादि। वहां इतनी सुबह मुझे कोई शराब-कर्मी नहीं मिलता। अत: चित्र लेने में कोई असहज नहीं होता।
निषादक्षेत्र में शराब बनती है और यहां से कई जगह ले जाई जाती है – यह तो मुझे ओपन सीक्रेट सा लगता है। इस जगह का टूरिस्ट डेवलेपमेण्ट मुझे करना हो तो मैं लोगों को कच्ची शराब बनाने के स्थान को दिखाने को अवश्य प्राथमिकता दूं।
यह सब घूमने-देखने में चालीस मिनट का समय लगता है। इस बीच सूर्योदय हो जाता है। आजकल आसमान साफ होने से चटक-लाल गोले से दीखते हैं सूर्य – गंगाजल में झिलमिलाते!
निषादक्षेत्र में सूर्योदय।
रेत में चलने में पर्याप्त उद्यम लगता है। पसीना आ जाता है और घर वापस लौटने पर पांच सात मिनट आराम करना पड़ता है पंखे के नीचे। बेचारे डायबिटीज परसाद को थोड़ कष्ट जरूर होता होगा। उन्हे कष्ट होगा तो अपना स्वास्थ्य ठीक रहेगा।
बस यही तो चाहिये। कि नहीं?!
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[1] टाइप II मधुमेह (डाइबिटीज) – शरीर या तो अपर्याप्त मात्रा में इंसुलिन बनाता है या उत्पादित इंसुलिन का समुचित उपयोग नहीं कर पाता (इंसुलिन प्रतिरोध रहता) है। दस में से नौ मधुमेह के पीड़ित इसी वर्ग में आते हैं। हालांकि यह छोटी उम्र में भी हो सकता है, पर इसके सबसे ज्यादा मामले 40 की उम्र में शुरू होते हैं।
यह ब्लॉग नित्य की पोस्टिंग से सरक कर साप्ताहिक पोस्टिंग की आवृति पर आ गया है। दो दिन पहले इसके लिये डोमेन नेम लिया – Halchal.org – इस ब्लॉग के नाम से मेल खाता डोमेन। अब इस डोमेन का खर्चा जस्टीफाई करने को कुछ नियमित तरीके से पोस्ट करना ही होगा! :lol: