एथेनॉल चलायेगा कार – आपकी जीत होगी या हार!


मुझे यह आशा है कि देर सबेर ब्राजील की तर्ज पर भारत में एथेनॉल का प्रयोग डीजल/पेट्रोल ब्लैण्डिंग में 20-25% तक होने लगेगा और उससे न केवल पेट्रोलियम पर निर्भरता कम होगी, वरन उससे पूर्वांचल/बिहार की अर्थव्यवस्था भी चमकेगी. अभी चार दिन पहले बिजनेस स्टेण्डर्ड में लीड स्टोरी थी कि कई बड़े स्टॉक मार्केट के बुल्स – राकेश झुनझुनवला सहित, बड़े पैमाने पर देश-विदेश में बायो-ईन्धन के स्टॉक्स में खरीद कर रहे हैं.

और परसों बिजनेस स्टेण्डर्ड में ही, उसके उलट है कि एथेनॉल का प्रयोग आपकी कार के लिये मारक हो सकता है – गलती से भी थोड़ा पानी मिल गया बायो-फ्यूल में तो आपकी कार नष्ट हो सकती है. अर्थात उस प्रकार की बात कि एक दिन किसी स्केंडेनेवियायी देश की रिपोर्ट को बैनर हेडलाइन के साथ छपा पायें कि चाकलेट खाकर आप 110 साल जी सकते हैं. और दूसरे दिन आप ढ़िमाकी लैब के डायरेक्टर के माध्यम से शोध से लाभांवित हों कि चॉकलेट स्वास्थ्य के लिये जहर हैं.

(एथेनॉल का ऑर्गेनिक सूत्र)

और देखें – यह आस्ट्रेलिया की रिपोर्ट – एथेनॉल मिक्सिंग 20 लाख आस्ट्रेलियायी कारों का बाजा बजाने वाली है. या फिर स्टॉनफोर्ड न्यूज का 18 अप्रेल का यह पन्ना जो कहता है कि एथेनॉल के वाहन मानव स्वास्थ्य पर काफी दुष्प्रभाव ड़ालते हैं.

लोग इस सोच से भी दुबले हो रहे हैं कि बायो फ्यूल की खेती से अन्न उत्पादन कम होगा और भुखमरी बढ़ेगी.

उक्त लिंक वाले लेख मैने पढ़े हैं और मेरे अपने निष्कर्ष निम्न हैं –

  1. एथेनॉल के बतौर बॉयो फ्यूल प्रयोग के रोका नहीं जा सकता. यह उत्तरोत्तर बढ़ेगा. खनिज तेल की कीमतें – डिमाण्ड-सप्लाई-लोभ के चलते देर सबेर स्काईरॉकेट करेंगी. और फिर कोई चारा नहीं होगा एथेनॉल ब्लैण्डिंग के विकल्प पर अमल करने के आलावा.
  2. भारत में जट्रोफा/कुरंज/रतनजोत/गन्ना का प्रयोग एथेनॉल बनाने में उत्तरोत्तर बढ़ेगा. वाहनों के इंजन बेहतर बनेंगे.
  3. एथेनॉल रिफाइनरी छोटे पैमाने पर अनेक स्थानों पर होंगी और उससे ईन्धन की यातायात जरूरतें भी कम होंगी.
  4. एथेनॉल ब्लैंडिंग 99.9% शुद्ध हो; बिना पानी मिलाये; यह सुनिश्चित करने के कठोर उपाय किये जायेंगे.
  5. स्वास्थ्य पर एथेनॉल के दुष्प्रभाव पर अभी अंतिम शब्द कहे नहीं गये हैं. इसी प्रकार वाहनों के ऊपर होने वाले दुष्प्रभाव उस तरह के लोगों की भविष्यवाणिंया हैं जो टिटिहरी ब्राण्ड सोच प्रसारित करते हैं.
  6. अर्थव्यवस्था या बाजार तय करेंगे कि भविष्य क्या होगा. पर्यावरणवादी अपनी आदत के अनुसार आपस में लड़ते रहेंगे.
  7. पर्यावरणवादी ही कहते हैं कि एथेनॉल वायु प्रदूषण से लड़ने का बहुत अच्छा उपाय है. इससे ग्लोबल वार्मिंग कम होती है, कार्बन मोनोक्साइड और कार्बन डाइआक्साइड के उत्सर्जन में 30% कमी आती है. इससे ज्वलनशील तत्व/जहरीले पदार्थ/ठोस पार्टीकल के उत्सर्जन में भी क्रमश: 12,30 व 25% की कमी आती है. (आप “ethanol fuel blending plus points” आदि के गूगल सर्च कर लें – ढ़ेरों लिंक मिलेंगे!)

मित्रों, मैं अपने बचपन से देखता आ रहा हूं. एक लॉबी एक कोण से लिखती है. दूसरी लॉबी दूसरे कोण से. मौका परस्त एक लॉबी कभी दूसरी लॉबी में तब्दील भी हो जाती है! अंतत: जो होना होता है वह होता है. एथेनॉल का विरोध करने वाले भविष्य में बायो-फ्यूल चलित कार में जायेंगे बायो-फ्यूल के खिलाफ प्रदर्शन करने को!

फिर हिन्दी पर चलने लगे तीर (या जूते!)


हिंदी एक बीमार भाषा है। क्‍योंकि इसका मुल्‍क बीमार है। अस्‍सी फीसदी नौजवान हाथ बेकार हैं। प्रोफेसर और दूसरे कमाने वालों को बैंक का ब्‍याज चुकाना है, वे ट्यूशन पढ़ा रहे हैं, कमाई का अतिरिक्‍त ज़रिया खोज रहे हैं। वे क्‍यों पढ़ेंगे किताब? आपकी किताब उन्‍हें दुष्‍चक्र से बाहर निकलने का रास्‍ता नहीं दिखा रही। मित्रों यह हमारी नहीं मुहल्ले की आवाज है.

मजा आ गया मुहल्ले की आज की पोस्ट पढ़ कर. मैं लिंक नहीं करूंगा. मैं तो बस देख रहा हूं हिन्दी पर जूतमपैजार. मैं नहीं चाहता कि मुहल्ले या विरोधी ठाकुर-बाभन मेरे पोस्ट को अपनी व्यायामशाला का एक्स्टेंशन मान लें.

पहले सुमित्रानन्दन पंत पर (या नामवर सिन्ह पर जो भी हों क्या फरक पड़ता है) कूड़ा उछाला गया. किसपर गिरा पता नहीं. अब फिर चालू हो गया है.

हिन्दी है ही दुरुह! इसमें बकरी की लेंड़ी गिनने का मॉर्डन मेथमेटिक्स है. इसमें पंत पर कविता है. इसमें लम्बे-लम्बे खर्रों वाला नया ज्ञानोदय है. बड़े-बड़े नाम और किताबों की नेम ड्रापिंग है. पर इसमें नौकरी नहीं है!

लेकिन मेरा मानना है कि हिन्दी साहित्य के नाम पर दण्ड-बैठक लगाने वाले कहीं और लगायें तो हिन्दी रिवाइटल खिला कर तन्दुरुस्त की जा सकती है. अगर 100-200 बढ़िया वेब साइटें हिन्दी समझ में आने वाली हिन्दी (बकरी की लेंड़ी वाली नही) में बन जायें तो आगे बहुत से हाई-टेक जॉब हिन्दी में क्रियेट होने लगेंगे. इस हो रही जूतमपैजार के बावजूद मुझे पूरा यकीन है कि मेरी जिन्दगी में हिन्दी बाजार की भाषा (और आगे बाजार ही नौकरी देगा) बन कर उभरेगी.

नागार्जुन जी की तर्ज में कहें तो साहित्य-फाहित्य की ऐसी की तैसी.

आपको कौन लिंक कर रहा है?


यह कई बार होता है कि आप वहां नहीं पहुंचते जहां आपके ब्लॉग को लिंक कर कुछ कहा जा रहा हो. आपको ट्रिगर ही नहीं मिलता. उदाहरण के लिये मैने यूनुस पर एक पोस्ट लिखी – नाई की दुकान पर हिन्दी ब्लॉगर मीट. उनके ब्लॉग को लिंक किया. प्रतीक्षा की कि यूनुस देखने आयेंगे और ज्ञान-बीड़ी का सुट्टा लगायेंगे. उस पोस्ट पर टिपेरे आये और (मेरे स्टेण्डर्ड से) थोक में आये. पर नही आये तो यूनुस जिनपर पोस्ट लिखी थी!

जब यूनुस ने मेरी किसी और पोस्ट पर टिप्पणी की तो मैने उन्हे ई-मेल कर चेताया कि सही पोस्ट पर टिप्पणी करो जनाब. और फिर जो टिप्पणी यूनुस ने की वह बहुत ही अच्छी है. अंश नीचे प्रस्तुत है:

यूनुस जी की टिप्पणी:
अरे अरे ज्ञान जी, पता नहीं कैसे आपकी इस ज्ञान बिड़ी का सुट्टा मारना भूल ही गया था । इसमें तो वो धूम्रपान निषेध का प्रतिबंध भी नहीं है । मुझसे भूल हो गयी जो इस पोस्‍ट को नज़र अंदाज़ कर दिया । तो आखिरकार आपने नाई की दुकान पर हमसे मुलाक़ात कर ही ली । ………
पर आपका लिखा बहुत अच्‍छा लगा । इसी तरह हमें ज्ञान बिड़ी पिलाते रहिये । जबलपुरिया हैं ज्ञान बिड़ी पीने के पुरानी आदत है । ये वो लत है जो हमसे छूटती नहीं ।……..

यूनुस की बात तो बतौर दृष्टांत है. असली सवाल है कि आप हाई-टेक ब्लॉगर गण सवेरे कुल्ला-मुखारी कर जब अपना कम्प्यूटर खोल कर ब्लॉग खंगालते हैं तो कैसे मालूम करते हैं कि आप पर किस-किस ने लिंक बना कर तीर चलाये हैं? इसके निश्चय ही कई तरीके होंगे. मैं आमंत्रण देता हूं कि आप टिपेरकर लोगों को अपना तरीका बतायें. अगर आपका तरीका ज्यादा मस्त हुआ तो मैं भी वह अपना लूंगा. अन्यथा मैं अपना तरीका बताने की हिम्मत जुटाऊंगा.

हमारे जैसे तो पुरनिया ब्राण्ड के ब्लॉगर हैं. न हमारा घेट्टो है न जवान ब्लॉगरों की जमात हमारे साथ है. पत्रकार या तकनीकी विशेषज्ञ भी नहीं है. रेलवे के तो लोग भी हिन्दी ब्लॉगरी में नही हैं जो हमें पट्टीदारी के लिहाज से लिंक करें. अत: हमें तो ज्यादा फायदा नहीं है अपने लिंक जानने की तकनीक का. पर मैं निश्चित ही चाहूंगा कि अगली बार यूनुस ज्ञान बीड़ी का सुट्टा लगाना भूल न जायें कि उन्हें ई-मेल करनी पड़े! इसी तरह आप लोगों पर भी कभी कंटिया फंसाऊं तो आप भी ओवरलुक न कर पायें!

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