मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए


मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम सुबह साइकिल लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर।  साइकिल बहुत तेज नहीं चलाता—इतनी ही कि शरीर चलता रहे और मन को पीछे छूट जाने का डर न हो। कान में किसी किताब की summary चलती है, लेकिन 1XContinue reading “मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए”

बनारसी आलू पापड़ – जब बनारस की गलियों ने एक ब्रांड गढ़ा


एक अख़बार में लिपटे पापड़ से शुरू हुई खोज मुझे बाबूसराय की दुकान से बनारस के कबीर चौरा की गलियों तक ले गई। कुछ दिन पहले अमेज़न पर बनारसी आलू पापड़ खोज रहा था। कई ब्रांड सामने आ गए। भारत में भी बिक रहे हैं और विदेशों में भी। अमेरिका में रहने वाला कोई भारतीयContinue reading “बनारसी आलू पापड़ – जब बनारस की गलियों ने एक ब्रांड गढ़ा”

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