जरई और रक्षाबंधन


राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया। गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्यContinue reading “जरई और रक्षाबंधन”

विकास मिश्र, अट्ठाईस सिलेंडर और एक संतुष्ट जिंदगी


बीए पास ड्राइवर, जिसने बम्बई-गुजरात देखा और फिर घर के पास की छोटी नौकरी चुन ली छह अगस्त को गैस सिलेंडर बुक किया था। आज अठारह तारीख को आया। इतने दिनों में दो-तीन बार फोन करके पूछताछ की जा सकती थी, लेकिन अब रसोई का काफी काम इंडक्शन पर शिफ्ट हो गया है, इसलिए सिलेंडरContinue reading “विकास मिश्र, अट्ठाईस सिलेंडर और एक संतुष्ट जिंदगी”

मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए


मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम सुबह साइकिल लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर।  साइकिल बहुत तेज नहीं चलाता—इतनी ही कि शरीर चलता रहे और मन को पीछे छूट जाने का डर न हो। कान में किसी किताब की summary चलती है, लेकिन 1XContinue reading “मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए”

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