दीपक पटेल जी की सोच



दीपक पटेल जी कौन हैं – पता नहीं। मेरी राजभाषा बैठक के दौरान इधर उधर की वाली पोस्ट में बापू के लिखे के अनुवाद पर उनकी रोमनागरी में हिन्दी टिप्पणियां हैं। कोई लिंक नहीं है जिससे उनका प्रोफाइल जाना जा सकता। पर उन्होनें जो टिप्पणियों में लिखा है; उसके मुताबिक वे बहुत प्रिय पात्र लगते हैं। उनकी हिन्दी का स्तर भी बहुत अच्छा है (बस, देवनागरी लेखन के टूल नहीं हैं शायद)। ऐसे लोग हिन्दी में नेट पर कण्ट्रीब्यूटर होने चाहियें।

मैं तो उनकी टिप्पणी पर फुटकर विचार रखना चाहूंगा:

  1. बापू हमारे राष्ट्रपिता ही नहीं, हमारी नैतिकता के उच्चतम आदर्श हैं। भारत में जन्मने के जो भी कष्ट हों; हममें अन्तत: वह गर्व-भाव तो रहेगा ही कि यह हमारा वह देश है, जहां बापू जन्मे, रहे और कर्म किये। उनके आश्रम में उनकी वस्तुयें देखी परखी हैं और एक रोमांच मन में सदैव होता है कि इतना सरल आदमी इतना ऊंचा उठ गया। हमें उन लोगों से मिलने का भी गर्व है जो कभी न कभी बापू के सम्पर्क में आये थे।
  2. बापू की भाषा – मैं उनकी अंग्रेजी की बात कर रहा हूं, इतनी सरल है कि समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। शुरू में, स्कूली दिनों में, जब हमें अंग्रेजी कम आती थी तो गांधीजी की आत्मकथा और अन्य पतली-पतली बुकलेट्स जो उन्होंने लिखी थीं, मन लगा कर पढ़ते थे जिससे कि अंग्रेजी सीख सकें। बापू के कहे का आशय समझ में न आ सके – यह अटपटा लगता है। यह तो तभी हो सकता है जब किसी बन्दे का एण्टीना बापू के सिगनल पर शून्य एम्प्लीफिकेशन और राखी सावन्त के सिगनल पर 10K का एम्प्लीफिकेशन फैक्टर रखता हो। पर ऐसा व्यक्ति वास्तव में बिना सींग-पूंछ का अजूबा ही होगा।
  3. इस ब्लॉगजगत में कई विद्वान ऐसे होंगे जो मरकहे बैल की तरह बापू को गरिया/धकिया सकते हैं। बापू को आउट डेटेड बता सकते हैं। बापू तो हिन्दी की तरह हैं – मीक और लल्लू! पर क्राइस्ट की माने तो भविष्य मीक और लल्लू का ही है। और एक प्रकार से सदा रहा है। बस – मीक और लल्लू के बदले कायर न पढ़ा जाये। मुझे बापू जैसा साहसी वर्तमान युग में देखने को नहीं मिला। जो आदमी अपनी न कही जा सकने वाली गलतियां भी स्वीकारने में झेंप न महसूस करे, उससे बड़ा साहसी कौन होगा? और मित्रों, हम साहस हीनता (दुस्साहस नहीं) से ही तो जूझ रहे हैं?

दीपक पटेल जी की सोच को मेरी फुटकर पोस्ट ने टिकल किया; यह जान कर मुझे प्रसन्नता है। बापू की वर्तमान युग में प्रासंगिकता पर चर्चा होनी चाहिये और कस कर होनी चाहिये।

ब्लॉगजगत में महाफटीचर विषयों पर अन्तहीन चर्चा होती है। बापू जैसे सार्थक चरित्र पर क्यों नहीं हो सकती?!


॥गुझिया बनाना उद्यम – होली मुबारक॥



यह चित्र मेरी पत्नी श्रीमती रीता पाण्डेय और मेरे भृत्य भरतलाल के गुझिया बनाने के दौरान कल शाम के समय लिया गया है। सामन्यत: रेलवे की अफसरायें इस प्रकार के चिर्कुट(?!) काम में लिप्त नहीं पायी जातीं। पर कुछ करना हो तो काम ऐसे ही होते हैं – दत्तचित्त और वातावरण से अस्तव्यस्त! यह उद्यम करने का कारण – मेरा विचार; कि हम लोग तो जन्मजात अफसर केटेगरी के नहीं हैं। (रीताजी को इस वाक्य पर कुनमुनाहट है! यद्यपि साफ तौर पर उन्होने नहीं कहा कि मैं यह कथन हटा दूं!)।

और इस चित्र के साथ ही आप सब को होली की अनेक शुभकामनायें।

बिजनेस अखबारों की मायूसी



भारत की अर्थव्यवस्था अचानक नाजुक हो जाती है। अचानक पता चलता है कि ढ़ांचागत उद्योग डावांडोल हैं। कच्चे तेल में आग लग रही है। रियाल्टी सेक्टर का गुब्बारा फूट रहा है।

यह सब जानने के लिये आपको रिप वान विंकल की तरह २० साल सोना नहीं पड़ता। अखबार २० दिन में ऐसी पल्टीमार खबरें देने लगते हैं। सफेद पन्ने के अखबार कहें तो ठीक; पर बिजनेस अखबार मायूसी का अचानक राग अलापने लगें तो अटपटा लगता है। आपको मिरगी की बीमारी हो तो वह भी कुछ प्रीमोनीशन के साथ आती है। पर यहां तो जब निफ्टी सरक-दरक जाता है तो बिजनेस अखबार रुदाली का रोल अदा करने लगते हैं। मैने तो यही देखा है। रोज सवेरे दफ्तर जाने के रास्ते में अखबार स्कैन करता हूं तो यह अहसास बड़ी तीव्रता से होता है।

शिवकुमार मिश्र या स्मार्ट निवेश पुराणिक ज्यादा जानते होंगे। पर हमें तो न ढ़ंग से स्टॉक खरीदना आया न बेचना। यह जरूर जानते हैं कि लॉग-टर्म में इण्डेक्स ऊर्ध्वगामी होता है। उसी सिद्धान्त का कुछ लाभ ले लेते हैं। बाकी शिवकुमार मिश्र को अपना पोर्टफोलियो भेज देते हैं – कि हे केशव, युद्धक्षेत्र में क्या करना है – यह एक मत से बतायें।

पर जैसा मैं कुछ दिनों से देख रहा हूं; गुलाबी पन्ने के अखबारों को कोई सिल्वर लाइन नहीं नजर आ रही। अर्थव्यवस्था चौपट लग रही है। अचानक यह कैसे हो जाता है। ये अखबार बैलेन्स बना कर क्यों नहीं चल सकते?

मुझे लगता है कि कुछ ही महीनों में पल्टी मारेंगे ये अखबार। चुनाव से पहले एक यूफोरिया जनरेट होगा जो बिजनेस अखबारों के पोर-पोर से झलकेगा। चुनाव से पहले फील-गुड फेक्टर आयेगा। अब उसको समझाने के लिये तरह तरह के जार्गन्स का प्रयोग होगा। पर आजकी मायूस अर्थव्यवस्था की खबरों से सॉमरसॉल्ट होगा जरूर।

बाकी; ज्यादा बढ़िया तो अर्थजगत के जानकार बतायेंगे! (क्या वास्तव में?!)


और इस पोस्ट पर पिछले कुछ दिनों से मिल रही आलोक पुराणिक जी की निचुड़ी हुई टिप्पणी मिली तो ठीक नहीं होगा! वे टिप्पणी में चाहे अगड़म बगड़म की प्रैक्टिस करें या स्मार्ट निवेश की। कुछ भी चलेगा। [-X


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