एसएमएस आर्धारित भुगतान व्यवस्था



मैने 8 मई’2007 को एक पोस्ट लिखी थी : पैसे ले कर चलना खतरनाक है. इस पोस्ट में मैने कहा था कि रोकड़ ले कर चलना/भुगतान करना उत्तरोत्तर जोखिम भरा होता जा रहा है. द मेकेंजी क्वाटर्ली” के एक लेख के अनुसार या तो एटीएम की श्रृंखला या एसएमएस आर्धारित भुगतान व्यवस्था इसका उपाय है. एसएमएस आर्धारित व्यवस्था कहीं अधिक (1:33 के अनुपात में) सस्ती है और पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना इस दिशा में सोच रहा है.

आज अस्वस्थता के कारण देर से उठने पर अखबार (बिजनेस स्टैण्डर्ड) के पहले पन्ने पर छपे विज्ञापन पर नजर पड़ी तो पाया कि कॉर्पोरेशन बैंक भारत में एसएमएस आर्धारित मोबाइल फोन से भुगतान व्यवस्था की शुरुआत कर चुका है. कार्पोरेशन बैंक का कहना है कि वह एम-कॉमर्स में कदम रखने वाला पहला पब्लिक सेक्टर बैंक है. यह सुविधा वह पे-मेट के साथ जुड़ कर दे रहा है. आप पे-मेट की साइट देखें. वह सिटी बैंक, कार्पोरेशन बैंक और चार-पांच और कम्पनियों के लोगो अपनी साइट पर चमका रहा है. बस, अब इंतजार है कि यह सुविधा मेरे गांव मे रहने वाला 4 बीघे का किसान अवधनारायण कब प्रयोग करने लगेगा!

समय बहुत तेज चल रहा है – परिवर्तन बड़ी तेजी से हो रहे हैं!

आप जरा विज्ञापन की कतरन पर नजर डाल लें:
Corporation Bank


लोग मनमोहन सिंहजी के पक्ष में क्यों नहीं बोलते?



हमारे प्रधानमंत्री देश के गौरव हैं. जैसे कलाम साहब के प्रति मन में इज्जत है, वैसे ही मनमोहन सिंह जी के प्रति भी है. जॉर्ज जी कह रहे हैं कि प्रधान मंत्री किसी और देश में होते तो उनका वध कर दिया जाता. जॉर्ज जी के प्रति भी मन में आदर है, पर वे मेवरिक राजनेता हैं और उनसे हमेशा सहमत नहीं हुआ जाता. मनमोहन जी स्वयम कह रहे हैं कि कुछ लोगों ने उनके लिये पंसेरी लुढ़काई है (अवधी में पंसेरी लुढ़काना का अर्थ मरने की इच्छा करना है) और अनुष्ठान कराया है. मनमोहन सिन्ह जी जैसे के लिये कोई यह कर सकता है ठीक नहीं लगता. शायद उनकी सूचना सही न हो. पर शिखर पर बैठा व्यक्ति एकाकी होता है और अगर वह सूक्ष्म सम्वेदना का व्यक्ति हुआ तो उसके कष्ट का अन्दाजा बहुधा दूसरे नहीं लगा सकते. यह लोगों का कर्तव्य है कि सरकार के प्रति चाहे जो सोचें, मनमोहन सिन्ह जी के साथ व्यक्तिगत सॉलिडारिटी प्रकट करें.

ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिन्ह जी की आलोचना पहली बार हो रही हो. बतौर वित्तमंत्री जब नरसिम्हाराव सरकार में उन्होने बजट पेश किये थे तो यह शोर मचा था कि वे देश को चौपट कर देंगे. पर अब देखिये कि अगर वे उस समय देश को नयी आर्थिक दिशा न देते तो शायद देश चौपट होता. सम्भव है कि इस समय नाभिकीय ऊर्जा के विषय में जो कहा जा रहा है, उस बारे में भी भविष्य में वैसा ही निकले.

जीतेन्द्र ने अपनी इस पोस्ट में नाभिकीय समझौते के दस्तावेज का लिंक दिया है. उसे आप डाउनलोड कर सकते हैं और चल रही बहस में अगर कुछ तथ्यपरक कहा जाये तो वैलिडेट कर सकते हैं. पर दुर्भाग्यवश मात्र राजनैतिक बयान हो रहे हैं. और समझौते में तो लेन-देन होता ही है, उसे मानते हुये व्यापक हित की बात खोजनी चाहिये.

खैर, नाभिकीय समझौता एक तरफ, मैं तो मनमोहन सिन्ह जी की बतौर एक सज्जन पुरुष बात कर रहा हूं. उनके समर्थन में खड़ा हुआ और कहा जाना चाहिये.


मल्लन साहब – सीक्वेल मल्लन चाचा



समीर लाल जी ने कल मल्लन चाचा को अपने ब्लॉग पर ठेला – क्या आप मल्लन चाचा को जानते हैं? मल्लन एक ऐसे चरित्र का नाम है जो सामान्य से अलग हो. हमें लगा, ये क्या; अपन भी अनुगूंज स्टाइल में ठेल सकते हैं. मान लें आलोक (9+2=11) जी ने नया टॉपिक दिया है मल्लन. मल्लन के आगे पीछे आप कुछ भी लगा सकते हैं. चाहे तो (यदि आप खुद पर सटायर कर सकते हों) खुद को मल्लन बना सकते हैं.

हां तो अपने मल्लन, मल्लन चाचा नहीं, मल्लन साहब हैं. मेरी उम्र के होंगे. शादी नहीं करी. क्यों नही करी यह तो हम और हम जैसे अनेक जिज्ञासु नहीं जान पाये. पर सभी ने अपने पड़ोस की थोड़ी उम्रदराज कुवांरियों का उनसे विवाह का पुनीत कार्य कराने का यत्न किया. कुछ ने तो चुपके से उनके लिये अपने खर्चे पर हिन्दुस्तान टाइम्स में मेट्रीमोनियल कॉलम में विज्ञापन भी दिये. कई तो उनके जन्म दिन/नक्षत्र/घड़ी के आधार पर उपयुक्त लड़कियों का मिलान कर, उनके साथ बैठक कर चुके पर नतीजा कुछ नहीं निकला. उम्र बढ़ती गयी.

मेरी उनसे गहरी छनती है. असल में मैने उनकी शादी कराने या किसी लड़की का बॉयोडाटा ठेलने का कभी कोई यत्न नहीं किया. मैं उन्हे प्रारम्भ से ही चिर कुमार की भूमिका में स्वीकार कर चुका हूं.

मल्लन साहब धुर निराशावादी हैं. मैं उन्हे फोन कर पूछता हूं क्या सीन है बन्धु?

हर बार एक ही जवाब मिलता है सीन क्या है. सब ऑबसीन है!

क्यों, क्या हुआ?

हुआ क्या; इन्दौर जाना था. कैरिज (सैलून) मेरे नाम था. ऐन मौके पर फलाना बोला कि उसकी बीवी का आंख का ऑपरेशन है इन्दौर में डा. हर्डिया के पास. अब सैलून का मेन बेडरूम उसे देना पड़ा और हम कूपे में टंग कर गये. कुंवारा होने पर यही फजीहत होती है.

मैने पूरी सहानुभूति जताई.

एक बार और मुंह लटकाये मिले. पूछा क्या बात है?

बोले ढ़िमाके की पोस्टिंग हो गयी है बाहर. उसने अपनी फैमिली मेरे घर में मय सामान रख दी है दो महीने के लिये यह कह कर कि मुझ अकेले को तो एक कमरा ही काफी है. अब मुझे अपने ही घर में एक कमरे में सिमटना पड़ गया है. उस कमरे में भी ढ़िमाके ने पैकिंग कर सामान के कार्टन रख दिये हैं. मेरे किचन पर उसकी बीवी का कब्जा है और रोज मसूर की दाल खानी पड़ रही है जो मुझे बिल्कुल पसन्द नही! बड़ी तल्खी से कैलेण्डर के दिन काट रहा हूं.

मैं जब भी उनके पास जाता हूं; कुंवारा होने के कारण एक न एक परेशानी से ग्रस्त पाता हूं जो मित्र लोग उन्हें थमा देते हैं. मित्र समझते हैं कि अकेला आदमी है, बम्बई में चार कमरे का फ्लैट ले कर रह रहा है; शरीफ है, सो फायदा उठाया जाये.

एक दिन मैने पूछ ही लिया. बन्धु, जब इतना चोट देते हैं दोस्त लोग तो शादी क्यों नही कर लेते?

बहुत देर तक मल्लन साहब उडिपी रेस्तराँ में दोसे का टुकड़ा कांटे में फंसाये रहे. फिर धीरे से बोले यार अभी जितना कष्ट है, उसका तो अभ्यास हो गया है. शादी कर ली इस उम्र में, और नहीं चल पायी तो कहीं ज्यादा कष्ट होगा. पचास साल का होने पर किसी के साथ एडजस्ट करना भी तो कठिन काम है.

मैं कोई तर्क/वितर्क/कुतर्क नहीं कर पाया. मल्लन साहब के हाथ में शायद विवाह की रेखा ही नहीं है.


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