पहले कानपुर में रेल दुर्घटना हुई. फिर लोगों ने उसपर बहुत से सवाल पूछे. लोगों को जवाब देते बड़ा अच्छा लग रहा था, यद्यपि शरीर थका था. कल भी दफ्तर में निर्णय के लिये फाइलों का ढ़ेर और डाक बक्सा भरा था. रोज की ब्लॉग पोस्ट लिखने का स्व निर्धारित नियम पालन करने के जुनून ने और थका दिया. नींद की गोलियां और मां की डांट भी करगर न रही. कल सुकुल जी ने टोक भी दिया कि लगता है आज नागा कर गये मिस्टर ज्ञानदत्त.
सो, सप्ताहांत की आकस्मिक छुट्टी ले रहा हूं आप सब से. थकान पूरी कर गूगल रीडर पर ब्लॉग रीडिंग का बकाया पूरा करूंगा. लोगों के ब्लॉग पर पढ़ कर टिप्पणियां भी करनी हैं – वर्ना हम नॉन-एलाइण्ड ब्लॉगर की पोस्ट पर कौन आयेगा!
नमस्कार.
(हो सके तो इस मुन्नी पोस्ट पर भी कुछ शब्द टिपेर दीजियेगा!)
फेमिली ब्लॉगिंग व्यवसाय का भविष्य
फुरसतिया सुकुल ने आज फेमिली ब्लॉगिंग के बारे में हमारी ट्यूब लाइट भक्क से जला दी है. फेमिली ब्लॉगिंग का भविष्य, निकट भविष्य में दैदीप्यमान लग रहा है. सो आनन-फानन में यह तैयार किया इंक ब्लॉग पोस्ट पढ़ें.
यह पोस्ट आजसे 10 वर्ष बाद का परिदृष्य सामने ले कर चल रही है. तब कई बड़ी-बड़ी कुटुम्ब आर्धारित ब्लॉग कम्पनियां सामने आ जायेंगी. इनमें आपस में जबरदस्त व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा होगी और आलोक पुराणिक के कंसीडरेशनानुसार पईसा बहुत होगा. आज की कई कुटीर उद्योग के रूप में चल रही फेमिली इकाइयां समय के साथ नहीं चल पायेंगी और सिक यूनिट बन जायेंगी. आप सीधे हमारी हेण्डराइटिंग में पढ़ें (कपया नीचे अपडेट भी देखें):
अपडेट:
विमल वर्मा जी की नीचे टिप्पणी से लगता है कि लोगों को सन्दर्भ स्पष्ट नहीं हो पाया. मैं जरा उसपर स्पष्टीकरण दे दूं. अनूप शुक्ल ने एक सज्जन की पोस्ट पर चुटकी लेते हुये केवल 6 प्वाइण्ट पर स्पष्टीकरण मांगते हुये टिप्पणी की थी. उन सज्जन से बढ़िया उत्तर बन नहीं पाया. अत: उनकी ब्लॉगर पत्नी ने अपनी टिप्पणी में गाढ़े समय में पति प्रेम दर्शाया ( शब्द अनूप के). यह अनूप ने अपनी आज की चिठ्ठा चर्चा में कहा.
अनूप की पिछली पोस्ट में अज़दक का कमेण्ट है:
‘रागदरबारी’ वाला आइडिया मस्त है. इधर-उधर से बच्चों को लगाके निपटा ही डालिए. काम जितना बचा है उसे देखते हुए 31 दिसम्बर को फ़ैसले की रात बनाना वैसे आशनायी में किया ज़रा भावुकतापूर्ण फ़ैसला लग रहा है. पसैंजर गाड़ी की ही तरह ज़रूरी बात है कि वह काम चलता रहे..
फिर ‘पहला पड़ाव’ और ‘विश्रामपुर का संत’ की बारी आएगी. उसका भी रास्ता निकलेगा. और नहीं तो उसी के लिए मैं कुछ बच्चे पैदा करने को मजबूर हो जाऊंगा.
यह कमेण्ट मैने प्रयोग किया है अज़दक की बड़ी फैमिली की कल्पना में. अब फैमिली के स्तर पर पति बचाव मुझे इतना हिलेरियस लगा कि ताबड़तोड़ यह पोस्ट बना डाली.
बस सन्दर्भ न मिलने के कारण बहुतों को पल्ले नहीं पड़ा होगा. अब पुन: देखें सन्दर्भ के साथ! :)
बाकी, विमल वर्मा जी को इंकब्लॉग ठीक से नजर नहीं आ रहा, उसमें दो बातें हैं – 1. मेरी कलमघसीट हेण्डराइटिंग और 2. तकनीकी समस्या – 800×600 की स्क्रीन के साथ दायीं ओर कटता है. अत: मैने साइज मीडियम कर दिया है.
वैसे हम ही अकेले नहीं है. जरा यह पोस्ट व उसपर बेनाम जी की टिप्पणी देखें – कुछ समझ में आता है?! :)
और फिर भी पोस्ट सिर खुजाने को विवश करे तो छोड़ दें – एक-आधी पटरी से उतरी पोस्ट भी सही! :)
श्रीलाल शुक्ल जी की याद
अजदक ने श्रीलाल शुक्ल का एक लेख अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत किया है. उसे देख कर हिन्दी से पैसे कमाने की अगर हसरत हो तो ध्वस्त हो जाती है. उसके बाद अनूप ने भी श्रीलाल शुक्ल का एक लेख अपने ब्लॉग पर परोसा. उसे पढ़ कर लगता है कि ऐसे ही लिखते रहना चाहिये.
अपने पास परोसने को बस इतना ही है कि राग दरबारी अनेकानेक बार पढ़ा है और न जाने कितनी बार मित्रों की बैठक में बजाया है. आम जिन्दगी में अनेक बैदजी, रुप्पन, रंगनाथ… खोजे हैं. फलाने कर्मचारी को अनुशासनात्मक कार्रवाई में सस्ते में छोड़ दिया; बावजूद इसके कि मेरा सहायक अफसर कहता रह गया कि साहब यह “खन्ना मास्टर की तरफ का है”. कुल मिला कर रागदरबारी जिन्दगी का हिस्सा बन गयी है हमारे परिवेश में.
श्रीलाल शुक्ल जी का दामाद मेरा बैचमेट है – सुनील. प्रोबेशन में हम दोनो एक कमरा भी शेयर कर चुके हैं. सेण्ट स्टीफन का प्रॉडक्ट सुनील राग दरबारी की तरंग नहीं समझता था. शायद उस समय उसने पढ़ी भी न थी. पुस्तक के बारे में मैने ही उसे रूपरेखा बताई थी. मैं कभी-कभी सोचता हूं कि सेण्ट स्टीफन के तहजीब वालों को लेकर राग दरबारी छाप लिखा जा सकता है क्या. कोई ब्लॉगर ट्राई कर देखेगा!


