सीखना@51+ की उम्र में



सीखना प्रक्रिया नहीं है. सीखना घटना भी नहीं है. सीखना जीवंत आदत है. सीखना यक्ष प्रश्नों के उत्तरों की तलाश है. वह उत्तर कोई प्रकाण्ड विद्वान बनने की चाह से प्रेरित हो नहीं तलाशे जा रहे. वह बनने की न तो क्षमता है और न ईश्वर ने इस जन्म में उस युधिष्ठिरीय प्रतिभा का प्राकट्य किया है मुझमें (कम से कम अब तक तो नहीं).

जीवन के यक्ष प्रश्न वे प्रश्न हैं जो अत्यंत जटिल हैं. लेकिन मन में एक वैचारिक अंतर्धारा है कि इन सभी प्रश्नों के उत्तर अत्यंत सरल हैं. वे जटिल इसलिये लग सकते हैं कि उनका प्राकट्य अभी होना है. जब हो जायेगा तो ऐसे लगेगा कि अरे, यह इतना सरल था और हम कितना फड़फड़ाते रहे उसकी खोज में! 

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(यह कुत्ता भी कौतूहल रखता है!)

इक्यावन+ की उम्र में भी मन में एक शिशु, एक किशोर; जागृत प्रौढ़ की नींद न आने की समस्या को धता बता कर लगा रहता है समस्याओं के उत्तर खोजने में.

सीखना तकनीक का भी हो सकता है. वह नये उपकरणों के प्रयोग का भी हो सकता है. सीखना पहले के सड़ी हुई सीख को अन-लर्न करने का भी हो सकता है. 

सीखना वह है – जो प्रमाण है कि मैं जीवित हूं. मेरा एक एक कण जीवित है. और उसके जीवित रहने को कोई नकार नहीं सकता. तब तक – जब तक सीखना चलता रहेगा.

मुझे प्रसन्नता है कि सीखना कम नहीं हो रहा है. वह बढ़ रहा है!      


व्यंगकारोँ की टोली की बढ़ती जनसंख्या का खतरा :-)



जब से शिवकुमार मिश्र की सेतुसमुद्रम पर चिठ्ठी वाली पोस्ट चमकी है, तबसे हमें अपनी दुकानदारी पर खतरा लगने लगा है. उस पोस्ट पर आलोक पुराणिक ने टिप्पणी कर कह ही दिया है कि व्यंगकारों की ***टोली में जन संख्या बढ़ रही है और शिवकुमार को हमारे कुसंग से प्रभावित नहीं होना चाहिये.

शिवकुमार मिश्र ने हमारा ज्वाइण्ट ब्लॉग वैसे ही 90% हथिया लिया है – अब मन हो रहा है कि एक दिन चुपके से उसका नाम “शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग” कर दें [ :-) ]. शिवकुमार ने फोटो-सोटो लगाने का जिम्मा अभी मुझे दे रखा है. वह तो शायद मेरे ही पास रहे. पर कुल मिला कर हमें लग रहा है कि हमारी ब्लॉगरी खतरे में है. हमसे बाद में आये ब्लॉगर हमसे आगे निकल गये हैं. सुकुल ने जब नामवर सिन्ह का नाम लेकर अपनी व्यथा बयान की थी तब मुझे कष्ट का अहसास नहीं था, अब वह पूरी गम्भीरता से महसूस कर रहा हूं. :-)

सुकुल जैसे तो फिर भी मस्त (या अंग्रेजी का सुपरलेटिव प्रयोग करें तो मस्तेस्ट) लिखते हैं. उनके जोड़ीदार जीतेद्र चौधरी भी एफर्टलेसली गदर ब्राण्ड पोस्ट ठोक कर मारते हैँ बाउण्डरी के पार. समीर लाल जी का तो ब्लॉग छपने पर टिप्पणियों को अर्पित करने वालों की लाइन लगी रहती है. सो मित्रों, उन जैसे रीयल सीनियर ब्लॉगरों को रीयल खतरा नहीं है.

Good friends, good books and a sleepy conscience: this is the ideal life.
– Mark Twain

खतरा प्रतीक पांड़े को भी नहीं है. वो तो मजे में सोते हैं (?) और यदाकदा उठकर अथर्ववेद की कोई ऑब्स्क्योर (obscure) सी ऋचा पकड़कर चुनमुनिया पोस्ट लिख मारते हैँ. खतरा अज़दक जैसों को भी नहीं है जो दिन में कई-कई बार मुखारी कर पॉपकार्न की तरह पोस्टें फुटफुटाते रहते हैं. खतरा सिर्फ हमें है. हमने जबरी सवेरे सवेरे पोस्ट ठेलने का नियम बना लिया है. उसका उल्लंघन करें तो पुराणिक या संजीत के एक दो ई-मेल या फुरसतिया सुकुल का फोन आ जाता है कि तबियत तो ठीक है!? तबियत की देखें या पोस्ट की क्वालिटी को. दर्द हिन्दुस्तानी वैसे भी बता चुके हैं कि हमारे रोज रोज लिखने का मतलब यूंही छाप लेखन हो जाता है. (यह अलग बात है कि ब्लॉग अगर बहुत सेंसिबल लेखन का माध्यम होता तो हम इस ओर रुख ही क्यों करते?)

एक अनिल रघुराज हैं – जो बुद्धिमानी भरी हिन्दुस्तानी की डायरी लिखते हैं. पर उनके साथ हमारी समस्या सेंसिबल टिप्पणी (वह भी रोज-रोज और कभी दिन में दो बार) उनके ब्लॉग पर करने की है. लगभग यही समस्या यूनुस के साथ है. उनके प्रस्तुत गानों पर टिप्पणी करने से पहले बाकी लोगों की टिप्पणी पढ़नी पड़ती हैं, जिससे समझ आ जाये कि कैसा लिखना है टिप्पणी में.

खैर, असली प्रॉबलम व्यंगकारों की ***टोली से है. यह हमने समझ लिया है कि हिन्दी ब्लॉग जगत में जो ज्यादा बिकता है, वह व्यंग ही है. किसी को हिट होना हो तो मस्त व्यंग लिखना ही होगा. अब देखिये हमें तो बहुत समय बाद समझ में आया पर नीरज गोस्वामी तो तीन गज़ल ठोकने के बाद ही “मैं हूं डॉन” वाला शुद्ध मुम्बइया-हिन्दी में सटायर लिख गये.

हमारे लिये सतत व्यंग में स्थितप्रज्ञ रहना कठिन है. दफ्तर में काम के जो झमेले हैं वे विकट करुणा पैदा करते हैं. करुणा न भी हो तो उच्चाटन एक स्थाई भाव की तरह जुड़ा रहता है. ऐसे में व्यंगकारों की ***टोली की मेम्बरशिप कैसे पायी जाये – यह समझ नहीं आता.

कुल मिला कर ब्लॉगरी करना उत्तरोत्तर कठिन लग रहा है. (यह कहने का शुद्ध हिन्दी में अर्थ होता है कि एक टिप्पणी का सवाल है भैया!)


बरखा बिगत सरद रितु आई



मित्रों; वह समय आ गया जिसका ६ महीने से इन्तजार था. गरमी की घमौरियां और फिर वर्षा ऋतु की चिपचिपाहट गयी. अब मौसम आ गया है सवेरे की सैर, विभिन्न प्रकार की सब्जियां-फल-पकवान सेवन का. लोई-कम्बल-रजाई में उत्तरोत्तर प्रोमोट होने का. मस्त पाचन क्षमता का प्रयोग करते हुये भी शारीरिक वजन कम करने के लक्ष्य को सार्थकता से चेज करने का. झिन्चक!

हम तो ये छ महीना जीते हैं और बाकी छ महीना इन छ महीनों का इन्तजार करते है. इन महीनों में भी कभी-कभी अस्थमा-सर्दी-जुकाम-बुखार दबेरते हैं. पर कुल मिला कर आनन्ददायक रहता है यह समय. पश्चिमी देशों की प्रोडक्टिविटी का राज ही शायद यह सर्द मौसम होता है.

Gyan(019) राजा रामचंद्र ने भी ऑपरेशन लंका इसी मौसम में प्रारम्भ किया था. वानर भालू भी वर्षा में परेशान रहे होंगे. भोजन जुटाना ही टफ रहा होगा. मौसम बदलने पर जोश भी आया होगा और लॉजिस्टिक्स की समस्यायें भी कम हुई होंगी. जब भगवान भी बड़े एक्स्पीडीशन के लिये शिशिर-शरद का इन्तजार करते हैं तो हम जैसे मर्त्य मानवों के लिये तो वह बहुत उपयुक्त हो जाता है. स्वामी शिवानंद अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि सर्दियों का प्रयोग हमें स्वास्थ्य सुधारने और आत्मिक उन्नति के लिये करना चाहिये.

Gyan(018)कल मैने महीनों बाद घर की छत पर चढ़ कर घर से सटी टण्डन बगिया (रमबगिया) का अवलोकन किया. मेरे घर की दीवार और गंगाजी के बीच यह हरी पट्टी है. यहीं पर महल(अशोक कुमार, मीना कुमारी) फिल्म की पचास के दशक में शूटिंग हुई थी. आजकल उसका रख रखाव बढ़िया नहीं है. पर पेड़ हरे पत्तों से लहलहा रहे है. मेरे घर के छोटे से बगीचे में भी गुलमेंहदी पूरे यौवन में फूली है. सभी पौधे मगन हैं. आने वाले नवरात्र पर्व की प्रतीक्षा में सज गये हैं. दफ्तर जाते हुये कहीं-कहीं कास फूली दीखती है. सफेद झक्क. वर्षा ऋतु के अवसान को घोषित करती हुई.

फूले कास सकल महि छाई, जनु वर्षा कृत प्रगट बुढ़ाई।  Gyan(001)

बानर सेना ने तो वर्षा के अवसान पर लंका विजय का अभियान सिद्ध कर लिया था. पता नहीं ब्लॉगर सेना क्या कर सकती है इस मौसम में. बानर हों या ब्लॉगर – असली अन्तर तो शायद राम के माध्यम से आता है. उनका तो अस्तित्व ही आजकल रीडिफाइन हो रहा है. अत: लगता नहीं कि इस साल कोई बहुत जबरदस्त काम होगा. पर जो भी हो, सामुहिक न सही, वैयक्तिक स्तर पर ब्लॉगर लोग उत्कृष्टता के दर्शन करा ही रहे हैं. शरद ऋतु में शायद वे और ऊंचाइयां छुयें.

ब्लॉगरी की उत्कृष्टता कालजयी बना सकती हो; यह मुगालता तो मन में नहीं है हमारे; पर अगले ६ महीनों मे उसे सर्वाधिक तो नहीं, प्राथमिकता अवश्य दी है. प्रयोग धर्मिता जीवित रहेगी – यह आशा है.


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