"यह पौधा मानवता का रक्षक बनेगा"!(?)



जट्रोफा से बायो डीजल बनाने पर बहुत सारे मित्र लोग बहुत कुछ कह चुके हैं. पंकज अवधिया (दर्द हिन्दुस्तानी) जी ने तो मुझे बहुत सामग्री भी दे दी थी यह बताते हुये कि इस खर-पतवार में बुरा ही बुरा है, अच्छा कुछ भी नहीं.

पर दो दिन पहले फ्रीकोनॉमिक्स ब्लॉग में एक पोस्ट है. उसमें भारत के रेल मंत्रालय के किसी हॉर्टीकल्चरिस्ट श्री ओ पी सिन्ह को उद्धृत कर कयास लगाया गया है कि यह “वीड” (जंगली खर-पतवार) “मानवता की रक्षा करेगा”. फ्रीकोनॉमिक्स ब्लॉग में वाल स्ट्रीट जर्नल को लिन्क किया गया है. इस पोस्ट पर टिप्पणियों में काफी अच्छी चर्चा हो रही है. कुछ लोग इसकी वकालत कर रहे हैं और कुछ पूरी तरह खिलाफ हैं. मुझे जो अच्छा लग रहा है वह यह है कि चर्चा हो रही है. अन्यथा हिन्दी ब्लॉगरी में तो सन 1907 के सामयिक विषय या फ़िर 2107 के सम्भावित विषयों पर चर्चा होती है; अगर आपस में वर्तमान की खींचतान न हो रही हो तो!

भारतीय रेल अब भी जट्रोफा प्लांटेशन करने में यकीन रखती है और बायो डीजल पर प्रयोग भी हो रहे हैं. ये श्री ओ पी सिन्ह कौन हैं, मुझे नहीं पता.

जट्रोफा में क्या है – सब सही है, सब गलत है, सब चर्चा का विषय है या इसमें प्रबल राजनीति है – समझ में नहीं आता. मैं विशेषज्ञ नहीं हूं. सो टांग नहीं अड़ाऊंगा इस बार – क्यों कि बहुत से बन्धु इस विषय पर कड़ी राय रखते हैं. पर फ्रीकोनॉमिक्स ब्लॉग की पोस्ट ने मेरी जिज्ञासा को पुन: उभार दिया है.

मुझे तो एक बैरल फ्यूल की विभिन्न स्रोतों से बन रही कीमत (वर्तमान खनिज तेल की कीमत $70) जो उस ब्लॉग पर लिखी है, बड़ी आकर्षक लगती है जट्रोफा और गन्ने के पक्ष में:

  1. सेल्यूलोस: $305
  2. गेंहू: $125
  3. रेपसीड: $125
  4. सोयाबीन : $122
  5. चुकन्दर: $100
  6. मक्का: $83
  7. गन्ना: $45
  8. जट्रोफा: $43

यद्यपि उस ब्लॉग पर चर्चा में इन आंकडों पर सन्देह भी व्यक्त किया जा रहा है.

बाकी पर्यावरण के मुद्दे पर तो – अपन कुछ नहीं बोलेगा!


समाधान चाहिये – ऊर्जा की जरूरतों का. अगर नाभिकीय ऊर्जा कहें तो भाजपाई और कम्यूनिष्ट खड़े हो जाते हैं – देश बेच दिया. जट्रोफा है तो मोनोकल्चर है, जमीन बंजर होगी, जमीन इतनी नहीं कि लोगों के लिये अनाज भर हो सके. पनबिजली की सोचें तो पर्यावरण वादी और विस्थापन विरोधी झण्डा लिये है. नेपाल में बांध बना दो – दशकों से बन रहे हैं. हर तरफ पेंच है. समाधान चाहिये!


रेल की दुनिया – सन 1999 में जनसत्ता में छपा लेख



स्क्रैप-बुक बड़े मजे की चीज होती है. आप 8-10 साल बाद देखें तो सब कुछ पर तिलस्म की एक परत चढ़ चुकी होती है. मेरी स्क्रैप-बुक्स स्थानांतरण में गायब हो गयीं. पिछले दिनों एक हाथ लगी – रद्दी के बीच. बारिश के पानी में भी पढने योग्य और सुरक्षित. उसी में जनसत्ता की अक्तूबर 1999 की कतरन चिपकी है. यह “दुनिया मेरे आगे” स्तम्भ में “रेल की दुनिया” शीर्षक से लेख है श्री रामदेव सिंह का. उस समय का सामयिक मुद्दा शायद दो सांसदों द्वारा टाटानगर स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के कण्डक्टर की पिटाई रहा हो; पर लेख की आज भी वही प्रासंगिकता है. मैं रामदेव सिंह जी से पूर्व अनुमति के बिना ब्लॉग पढ़ने वाले मित्रों के अनुरोध पर यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं, अत: उनसे क्षमा याचना है. आप कृपया लेख देखें:


रेल की दुनिया
रामदेव सिंह

हिन्दी के बहुचर्चित कवि ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता है “श्रमजीवी एक्स्प्रेस” जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:

सवाल यह है
श्रमजीवी एक्सप्रेस में
तुम श्रमिकों को
चलने देते हो या नहीं
कि अघोषित मनाही है उनके चलने की
कि रिजर्वेशन कहां तक है तुम्हारा, कह
बांह उमेठ, उमेठ लेते हो उनका अंतिम रुपैया तक
या अगले स्टेशन पर उतार देते हो
यदि सींखचों के पीछे भेजते नहीं

पूरी कविता तो भारतीय रेल की नहीं, सम्पूर्ण देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख देती है. इन पंक्तियों से भी भारतीय रेल की एक छवि तो स्पष्ट होती ही है जिसमें प्रतिनिधि खलनायक और कोई नहीं, रेल का टीटीई ही है, जिसका नाम कवि ने नहीं लिया है. इससे अलग हिन्दी का एक चर्चित उपन्यास “अठारह सूरज के पौधे” (लेखक रमेश बक्षी, जिसपर “सत्ताइस डाउन” नाम से फिल्म बन चुकी है) का नायक भी एक टीटीई है, जिसके संत्रास की कई परतें हैं. लोहे के रास्ते पर लगातार अप-डाउन करते, कन्धे छीलती भीड़ एवम नियम और व्यवहार के विरोधाभासों के बीच झूलते एक टीटीई का भी एक निजी संसार होता है जिसे सिर्फ बाहर से देख कर नहीं समझा जा सकता है. भागती हुई रेल के बाहर की दुनियां कितनी खुशनुमा होती है, खुले मैदान, खुश दिखते पेड़-पौधे, कल-कल बहती नदी, नीला आकाश, और अन्दर? अन्दर कितनी घुटन, कितना शोर, चिल्ल-पों, झगड़ा-तकरार! एक टीटीई इन दोनो दुनियाओं के बीच हमेशा झूलता रहता है.

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रीय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?

गांधीजी तो रेलों के माध्यम से हो रही राष्ट्रीय क्षति से इतने चिंतित थे कि उन्होने कभी यहां तक कहा था कि “यदि मैं रेल का उच्चाधिकारी होता तो रेलों को तब तक के लिये बन्द कर देता, जब तक लोग बिना टिकट यात्रा बन्द करने का आश्वासन नहीं दे देते.” आज से 15-20 वर्षों पहले तक गांधीजी का यह कथन बड़े-बड़े पोस्टर के रूप में रेलवे स्टेशन की दीवारों पर चिपका रहता था. अब यह पोस्टर कहीं दिखाई नहीं देता. ऐसा नहीं कि गान्धी के इस कथन पर लोगों ने अमल कर लिया हो और अब ऐसे पोस्टरों की जरूरत नहीं रह गयी हो. सच्चाई तो यह है कि जैसे गांधी जी की अन्य नैतिकतायें हमारे देश के आम लोगों से लेकर राजनेताओं के लिये प्रासंगिक नहीं रह गयी हैं, उसी तरह रेलवे स्टेशनों पर प्रचारित यह सूत्र वाक्य उनके लिये महत्वहीन हो गया. अब तो यह दृष्य से ही नहीं दिमाग से भी गायब हो गया है. अब के राजनेता तो अपने साथ बिना टिकट रैलियां ले जाना अपनी शान समझते हैं.

टाटा नगर रेलवे स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्प्रेस के कण्डक्टर की पिटाई सत्ताधारी दल के दो सांसदों ने सिर्फ इसलिये करदी कि उन्हें वातानुकूलित डिब्बे में जगह नहीं मिली. जबकि उनका आरक्षण पहले से नहीं था, न हीं तत्काल डिब्बे में कोई जगह थी. सांसद द्वय के गणों ने घण्टों गाड़ी रोक कर रेल प्रशासन की ऐसी-तैसी की. सैकड़ों लोग तमाशबीन बन कर यह सब देखते रहे. रेलवे में बिना टिकट यात्रा का प्रचलन पुराना होते हुये भी इधर 20-25 वर्षों में ऐसे यात्रियों के चरित्र में एक गुणात्मक फर्क आया है, जो गौर तलब है. पहले जहां रेलगाड़ियों में टीटीई को देख कर बिना टिकट यात्री दूर भागता था, ऐसी चोर जगहों में बैठ कर यात्रा करता था जहां टीटीई नहीं पंहुच सके वहीं अब बिना टिकट यात्री ठीक वहीं बैठता है जहां टीटीई बैठा हो. बल्कि तरह तरह की फब्तियों को सुनने के बदले टीटीई ही वहां से हट जाना पसन्द करता है. भिखारियों और खानाबदोशों को छोड़ दें तो गरीब और मेहनतकश वर्ग के लोग बिना टिकट यात्रा से परहेज करते हैं. टिकट लेने के बाद भी सबसे ज्यादा परेशान वही होते हैं जबकि खाते पीते वर्ग के लोग ही सबसे अधिक बिना टिकट यात्रा करते हैं. सुप्रसिद्ध व्यंगकार परसाई जी ने अपने संस्मरणों में उन कई तरीकों का वर्णन किया है जिनके सहारे टीटीई पर या तो धौंस जमा कर या गफलत में डाल कर लोग बिना टिकट यात्रा करते हैं.

यह नयी रेल संस्कृति है जिसकी दोतरफा मार टीटीई झेलता है. एक तरफ अपने बदसलूक और बेईमान होने की तोहमद उठाता है जिसमें बड़ा हिस्सा सच का भी होता है. दूसरी तरफ वह ईमानदारी से काम करने की कोशिश करता है तो बड़े घरों के उदण्ड मुसाफिर अपनी बदतमीजियों के साथ उसे उसकी औकात बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते.


टीटीई की नौकरी के विरोधाभास



ट्रेन के समय पर कोच के टीटीई को निहारें. आप कितने भी लोक प्रिय व्यक्ति हों तो भी आपको ईर्ष्या होने लगेगी. टीटीई साहब – “कोई बर्थ खाली नहीं है” कहते हुये चलते चले जा रहे हैं; और पीछे-पीछे 7-8 व्यक्ति पछियाये चल रहे हैं. टीटीई साहब मुड़ कर उल्टी दिशा में चलने लगें तो वे सभी लोग भी पलट कर फिर पछिया लेंगे.बिल्कुल अम्मा बतख और उसके पीछे लाइन से चलते बच्चे बतखों वाला दृष्य!

टीटीई साहब को गोगिया पाशा से कम नहीं माना जाता. वे आपके सामने पूरा चार्ट फैलादें, पूरी गाड़ी चेक कर दिखादें कि कोई बर्थ खाली नहीं है. पर हर आदमी सोचता है कि वे अगर इच्छा शक्ति दिखायें तो आसमां में सुराख भी कर सकते हैं और एक बर्थ का जुगाड़ भी. उनके पीछे चलने वाली “बच्चा बतख वाली” जनता यही समझती है. इसी समझ के आधार पर अर्थशास्त्र की एक शाखा कार्य करती है. कई उपभोक्ता लोग हैं जिन्हे इस अर्थशास्त्र में पीएचडी है. और वे इस अर्थशास्त्र को गाहे-बगाहे टेस्ट करते रहते हैं.

मेरे पिताजी किस्सा सुनाते है कि उनके छात्र होने के दिनों में फलाना टीटीई था, जिसका आतंक इलाहाबाद से मेजा-माण्डा तक चलने वाले स्टूडेण्टों पर बहुत था. टीटीई-पावर और स्टूडेण्ट-पावर में अंतत: स्टूडेण्ट-पावर जीती. स्टूडेण्टों ने एक दिन मौका पा कर टौंस नदी में उस फलाने टीटीई को झोक कर उसका रामनाम सत्त कर दिया. यह आज से 50 साल पहले की बात होगी.वैसे मैं अपने पिताजी की पुराने समय की बातों को चुटकी भर नमक (पिंच ऑफ सॉल्ट) के साथ ही लेता हूं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने दिनों के जितने वे किस्से सुनाते हैं; उन्हें वैलिडेट करने का मेरा न कोई मन है और न संसाधन. पर फलाने टीटीई के टौंस नदी में झोंकने की जो कथा वे सुनाते हैं, उससे छात्र वर्ग में टीटीई के प्रति गहन अरुचि स्पष्ट होती है.

रेलवे की दुनिया

(रामदेव सिंह के सन 1999 में जनसत्ता में छपे एक लेख के अंश):

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रिय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?@

ब्लॉग पढ़ने वाले 8-10 परसेण्ट लोग परदेस में भी हैं – वहां टीटीई जैसी जमात के क्या जलवे हैं? कोई सज्जन बताने का कष्ट करेंगे?

जलवे तो तभी होते हैं जब डिमाण्ड-सप्लाई का अंतर बहुत हो. यह अंतर टीटीई की “जरूरत” और ग्राहक की “तत्परता” में हो या ट्रेनों में उपलब्ध बर्थ और यात्रा करने वालों की संख्या में हो. आप समझ सकते हैं कि जलवे ग्रीष्मकाल या दशहरा-दिवाली के समय बढ़ जाते हैं. ऐसा कोई अध्ययन तो नहीं किया गया है कि इस जलवे के समय में टीटीई वर्ग छुट्टी ज्यादा लेता है या वर्षा ऋतु के चौमासे में. पर यह अध्ययन किसी रिसर्च स्कॉलर को एच.आर.डी. में पीएचडी की डिग्री दिलवा सकता है.

मैं यहां टीटीई पर केवल व्यंग नहीं करना चाहता. उनकी नौकरी में जोखिम बहुत हैं. बहुत से वीवीआईपी सही-गलत तरीके से यात्रा करते हैं. कभी किसी सही को गलत तरीके से या गलत को सही तरीके से उन्होनें चार्ज कर लिया तो बड़ा हाई-प्रोफाइल मामला बन जाता है – जो बड़ों-बड़ों के सलटाये नहीं सलटता. बेचारे टीटीई की क्या बिसात! उसकी नौकरी तलवार की धार पर है. इसके अलावा उस जीव से दो विरोधी आवश्यकतायें हैं – व्यवहार विनम्र हो और बिना टिकट की वसूली कस के हो. भारत में शराफत से सीधी उंगली कुछ नहीं निकलता. अत: जब टीटीई यात्रियों से जायज पैसे वसूलता है तो उसपर अभद्र व्यवहार, नशे में होने और (अनुसूचित जाति-जनजाति के मामले में) जाति सूचक अपशब्द प्रयोग करने के आरोप तो फट से लगा दिये जाते हैं. हर तीसरा-चौथा टीटीई इस प्रकार की शिकायत का जवाब देता पाया जाता है. और अगर वह जड़भरत की तरह निरीह भाव से काम करता है – तो उसे प्रशासन की लताड़ मिलती है कि वह कसावट के साथ टिकट चैकिंग नहीं कर रहा.

जब टीटीई की बात हो रही है तो मैं एक टीटीई की भलमनसाहत की चर्चा के बिना नहीं रह सकता. हम लोग, एक दशक से भी अधिक हुआ, रेलवे स्टाफ कॉलेज बडौदा में कोई कोर्स कर रहे थे. हमें दो-दो के ग्रुप में बडौदा स्टेशन पर कर्मचारियों की कार्य के प्रति निष्ठा जांचने भेजा गया. चूकि हम लोग लोकल नहीं थे, हमें बतौर यात्री स्वांग रच कर यह जांचने को कहा गया था. मेरे साथ मेरे मित्र थे. हेड टिकेट कलेक्टर के दफ्तर के बाहर मैं अचानक लंगड़ाने लगा. मेरे मित्र मुझे सहारा देकर हेड टीसी के दफ्तर में ले कर गये. मैने पूरी पीड़ा से बयान किया कि फुट ओवर ब्रिज से उतरते हुये सीढ़ियों की चिकनाहट से मेरा पैर स्लिप कर मोच खा गया है. तेज दर्द है. हेड टीसी ने तुरंत मुझे बैठने को कुर्सी दी. मोजा उतार कर मेरा पैर चेक किया और बोला कि फ्रेक्चर नहीं लगता. वह दौड़ कर दवा की दूकान से मूव/आयोडेक्स ले आया. मेरे पैर पर धीरे-धीरे लगाया और कुछ देर आराम करा कर ही मुझे जाने दिया. धन्यवाद देने पर वह हल्का सा मुस्कुराया भर. मुझे हेमंत नाम के उस नौजवान हेड टीसी की याद कभी नहीं भूलेगी.

तो मित्रों टीटीई की नौकरी अलग अलग प्रकार की अपेक्षाओं से युक्त है. टीटीई करे तो क्या करे!


@ रामदेव सिंह जी का यह लेख मेरी ब्लॉग पोस्ट से कहीं बेहतर लिखा गया लेख है. लालच तो मन में ऐसा हो रहा है कि पूरा का पूरा लेख प्रस्तुत कर दिया जाय, पर वह लेखक के साथ अन्याय होगा और शायद चोरी भी.


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