सड़क पर होती शादियां


हिन्दुस्तान में सड़क केवल सड़क नहीं है. जन्म से लेकर परलोक गमन के सभी संस्कार सड़क पर होते हैं. जीवन भी इन्हीं पर पलता है. सचिन तेन्दुलकर से लेकर मुन्ना बजरंगी तक इन्ही सड़कों पर बनते हैं.

लोग ज्यादा हो गये हैं तो स्कूल, मैदान, मैरिज हॉल, धर्मशालायें कम पड़ने लगी हैं. लिहाजा शादियां इन्ही सड़कों पर होती हैं.

समाज के रहन-सहन के मैन्युअल में यह कोडीफाइड है. आपके घर में शादी है तो सड़क पर टेंण्ट गाड़ लो. किसी नगर पालिका, मुहल्ला समिति, पास पड़ोस से पूछ्ने की जरूरत नहीं. और पूछना क्यूं? जब पड़ोस के लाला/सुकुल/गोयल/पासवान जी के पप्पू या गुड्डी की शादी में किसी ने सड़क बन्द करते समय आप को नहीं ग़ांठा तो आपको क्या जरूरत है?

(यह सड़क देख रहे हैं आप। पास में बफे डिनर का कचरा भी था जो मैं केप्चर नहीं कर पाया)

रात भर कान फोड़ू संगीत बजाना, ट्रेफिक की ऐसी तैसी कर देना, सवेरे बचे-खुचे भोजन और थर्मोकोल/प्लास्टिक के इस्तेमाल हुये प्लेट-गिलास-चम्मच सड़क पर बिखेर देना, जयमाल के लिये लगे तख्त-स्टेज-टेण्ट को अगले दिन दोपहर तक खरामा-खरामा समेटना…..यह सब हिन्दू/मुस्लिम पर्सनल लॉ में स्पेसीफाइड है. सवेरा होने पर बरात और टेण्ट हाउस के बन्दे सड़क पर सोते मिलते हैं और गाय-गोरू बचे-खुचे भोजन में मुंह मारते पाये जाते हैं. सवेरे की सैर के जायके में मिर्च घुल जाती है.

प्रवचन देने की तथागती मुद्रा अपनाना बेकार है. जन संख्या बढ़ती रहेगी. सड़क का चीर हरण होता रहेगा और भी फ्रीक्वेंट हो जायेगा.

सड़क आपकी, आपकी, आपकी.
सड़क हमारे बापकी.

प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने के तरीके.


मैं यह क्लिक-इफेक्टिव पोस्ट नहीं लिख रहा। प्लास्टिक के कचरे के बारे में कम ही लोगों ने पढा। पर आप क्लिक के लिए नहीं लिखते हैं। जिस मुद्दे पर आप महसूस करते हैं, उसपर कलम चलानी चाहिये। कम से कम ब्लागिंग है ही इस काम के लिए.
मुझे लगता है की अपना कैरी बैग ले कर बाजार जाना बड़ा ही इफेक्टिव तरीका है प्लास्टिक पर अपनी निर्भरता कम करने का। इसके अलावा निम्न उपाय किये जा सकते हैं:

  1. प्लास्टिक सेशे का प्रयोग कम कर दें। जहाँ तक हो बड़ी क्वान्टिटी में ख़रीदें और कोशिश करें कि वह शीशे के जार में हो.
  2. जो खुला या बिना प्लास्टिक के कंटेनर के मिले, उसे लेने में रूचि दिखाएँ। मसलन अनाज खुला लें और अपने थैले में ही भरवा लें।
  3. घर में रखने के लिए शीशे के जार या स्टील के कंटेनर का प्रयोग करें।
  4. किराने की दुकान का प्रयोग करें अगर सुपर मार्केट/बिग बाजार आप के कैरीबैग को मान्यता नहीं देता। वालमार्ट या बिग बाजार शायद प्लास्टिक के उपयोग को बंद करने वाले अन्तिम लोग हों।
  5. प्लास्टिक का रिप्लेसमेंट तलाशें। कई चीजें कागज, शीशे या लकडी/मिटटी की मिल सकती हैं। प्लास्टिक के खडखडिया कप की बजाय कुल्हड़ को वरीयता दें।
  6. अगर प्लास्टिक का कैरीबैग लेना ही पड़े तो मोटा और मजबूत लें, पतली फट जाने वाली पन्नी नहीं।
  7. आपका प्लास्टिक कम करना आपके सामान्य व्यवहार का अंग हो, कोई मेनिया नहीं।

जरा अपने आस-पास के लैंडफिल का मुआयना करें – कितना बड़ा प्लास्टिक का कब्रिस्तान बनता जा रहा है!

प्लस्टिक का कचरा कब तक चलेगा?


इकनामिस्ट” में है कि सेनफ्रंसिसको में प्लास्टिक के शॉपिंग बैग पर पाबन्दी लग गयी है. किराना वालों ने इस का विरोध किया है. पर कानून बनाने वालों ने सुनी नहीं. पता नहीं कैसे कानून बनाने वाले हैं वहां. हमारे यहां तो जनता के बिना बोले बहुत कुछ सुन लेते हैं. खैर.

प्लास्टिक का कचरा वास्तव में जिन्दगी तबाह कर रहा है. एक महीना हार्लिक्स और डाबर का च्यवनप्राश सेहत बनाता है पर उनकी बोतल हमारे आगे की सौ पीढ़ियां झेलेंगी. रिसाइकल्ड प्लास्टिक न जाने कौन कौन से स्वास्थ्य नाशक तत्व लिये रहता है. आपमें लम्बा लेख पढ़ने की पेशेंस हो तो बेस्टलाइफ मैगजीन में यह लेख पढ़ें. प्लास्टिक अब भोजन कि चेन को भी प्रदूषित कर रहा है। गायें प्लास्टिक का कचरा खाते देखी जा सकती हैं। पक्षी, समुद्री जीव, मछलियाँ – ये सब प्लास्टिक की चपेट में हैं। वहा दिन दूर नहीं जब मानव शरीर में प्लास्टिक प्रवेश कर जायेगा – या कर ही चुका है। प्लास्टिक कि बोतल से दूध पीते नवजात के दिमाग, प्रतिरोधक क्षमता और प्रजनन अंगों पर प्रभाव पड़ रहा है। केंसर और डायबिटीज के मामले प्लास्टिक प्रदूषण से बढ़ रहे हैं. लेख बड़ी भयानक तस्वीर सामने रखता है।

ड़ेढ़ सौ साल से बने प्लास्टिक का एक छोटा सा हिस्सा ही नष्ट हुआ है. हर साल 60,000,000,000 टन प्लास्टिक बनता है. उसमें से ज्यादातर तो केवल एक बार ही इस्तेमाल किया जाता है. अपने मजे के लिये हम धरती और समन्दर दोनों को कब्रिस्तान बना दे रहे हैं.

एक बड़ी खोज वह होगी जो प्लास्टिक के बायोडिग्रेडेबल बनाने के बारे में होगी. खोजने या उसको कमर्शियल रूप देने वाला बिल गेट्स जैसा धनी बन जायेगा और आगे आने वाली पीढ़ियां उसका गुण गान करेंगी.

तब तक हम क्या करें? घर में तो हमने नियम बना लिया है बाजार जायेंगे तो अपना थैला लेकर जायेंगे. दुकानदार को विनम्रता से मना कर देते हैं कि भैया, आपका कैरी बैग नहीं चाहिये। पर यह तो मात्र आत्मसंतोष के लिए है। समस्या का समाधान तो नहीं है।

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हमारे एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, उनका कहना है कि जब वे नार्थ फ्रंटियर रेलवे में असम में पोस्टेड थे तो उनके एक प्लास्टिक के थैले को (जिसमें किताबें थीं) दीमक पूरी तरह चट कर गयीं थींथैले समेतप्लास्टिक को बायो डीग्रेडेबल करने के लिए उस दीमक की खोज की जा सकती है

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