टाटा की लखटकिया कार आयेगी तो मोटर साइकल वाले अपग्रेड हो कर सड़कें पाट देंगे. सडकें जब गलियों में तब्दील हो जायेंगी (जैसे कि अब नहीं हैं क्या?) तब पतली गली से निकलने को साइकल ही उपयुक्त होगी. अत: मेरा लेटेस्ट चिंतन है कि मैं बैटरी वाली साइकल लूंगा.
इस बारे में मैने फाइनांस मिनिस्टरी (पढ़ें – मेरी पत्नी) से चर्चा कर अप्रूवल भी ले लिया है. वहां से अप्रूवल बड़ी मुश्किल से मिलता है. किसी जमाने में उनका नजरिया था कि मापेड पर चलने की बजाय गधे पर सवारी करना ज्यादा बेहतर विकल्प है. पर अब सवेरे की सैर के समय भीड और चांद की सतह वाली सडकें देख कर उन्होंने अपना मत बदल लिया है.
बैटरी वाली साइकल के मार्केट में कई प्लेयर कूदने वाले हैं. एवोन साइकल्स, के ई वी इण्डिया, कैसर आटो मोटो, एटलस साइकल्स, ऐस मोटर्स, इलेक्ट्रोथर्म, हीरो साइकल्स आदि अगले साल भर में डेढ लाख बैटरी वाली साइकलें बाजार में उतार देंगे.
दस पैसे में एक किलोमीटर चलना, कम प्रदूषण, कम स्पीड से कम दुर्घटना का जोखिम, रजिस्ट्रेशन से मुक्ति, पतली गली से मेन्यूवर कर निकल लेने की सुविधा – बड़े फायदे हैं इस साइकल के. बस दो बातों की समस्या है. एक तो इन साइकलों का पे-लोड केवल 75 किलो है. अत: अपना वजन कम करना होगा. दूसरे, पत्नी की यह चिंता कि वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड का सरकारी अफसर साइकल पर चलता कैसा लगेगा – कब सिर उठा कर फुंकारने लगेगी और अप्रूवल विड्रा हो जायेगी – कहा नहीं जा सकता. कई बार अपनी सहूलियत, सोच और निश्चय पर ‘लोग क्या कहेंगे’ भारी पड़ जाता है.
बैटरी वाली साइकलें यातायात में गम्भीर योगदान देंगी. इंटरनेशनल हेरल्ड ट्रिब्यून का यह पन्ना देखें.
