भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
वह आदमी दुबला सा, गौरैया जैसा था। ओरोंथोलॉजिस्ट सलीम अली की तरह— शांत, पर्यवेक्षक। स्पेंसर्स के सुपर बाजार में अपनी बुर्का पहने पत्नी के साथ। ट्रॉली नहीं लिये था, एक बास्केट में थोड़ा सामान लेने आये थे दंपति।
मेरी ओर देखा तो मैने कह दिया – आपकी पर्सनालिटी बहुत आकर्षक लग रही है।”
वे मुस्कुराए, बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया। नाम बताया—इकराम अंसारी। भदोही में ही रहते हैं। नया बाजार में।
उनकी उम्र उनकी पत्नी ने बताई 75 प्लस। मैने अपनी बताई – सत्तर प्लस। उनकी बेगम इस अचानक मुलाकात से खुश नजर आ रही थीं।
बस। कोई धर्म-चर्चा नहीं। कोई राजनीति नहीं। कोई ज्ञान नहीं बघारा – न उन्होंने न मैंने।
अपरिचित व्यक्ति, पर एक छोटी बातचीत दोनो को प्रसन्न कर गई!
आजकल हिन्दू–मुसलमानों के बीच बड़ी खाई हो गई है। यह बात आंशिक रूप से सही भी है। लेकिन मुझे लगता है—खाइयाँ नारे से नहीं, अनुभव से भरती हैं।
कभी अगर इकराम जी की किसी महफ़िल में हिन्दुओं को लेकर कड़वी बात चले, तो शायद वे इतना कह सकें— “नहीं, एक सज्जन अच्छे भी मिले थे स्पेंसर्स के मार्केट में।”
और कभी मेरी किसी बातचीत में मुसलमानों को एक ही रंग में रंगने की कोशिश हो, तो मेरे दिमाग में भी इकराम साहब का ‘सलीम अली’ वाला चेहरा आ जाएगा।
समाज को जोड़ने का काम बड़े भाषण नहीं करते, छोटे, सच्चे मानवीय क्षण करते हैं।
आज का दिन ऐसा ही एक छोटा क्षण दे गया। बस, साझा कर लिया। 🌱
इकराम अंसारी और उनकी बेगम
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शायद समाज को जोड़ने के लिए हमें बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी बस इतना काफ़ी होता है कि हम सामने वाले को पहले एक इंसान की तरह देखें, फिर बाकी पहचानें अपने-आप अपनी जगह पर आ जाती हैं। सुपरमार्केट जैसे साधारण स्थानों में, ऐसे साधारण क्षण चुपचाप याद दिला जाते हैं कि सामाजिक रिश्तों की मरम्मत अक्सर बहुत छोटे औज़ारों से हो जाती है।
इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है।
हमारे घर में, हर सुबह आँगन में बिखरे फीके नमकीन पर जो दृश्य बनता है, वह प्रकृति का खेल नहीं लगता, एक छोटा-सा समाज लगता है।
कौव्वे तेज़ी से आते हैं, तेज़ी से खाते हैं और ज़्यादा ले जाते हैं। उन्हें रोकने के लिये डंडा रखना पड़ता है, यानी शक्ति को शक्ति से संतुलित करना पड़ता है। चरखियाँ समूह में आती हैं, और समूह ही उनका अधिकार-पत्र होता है; वे किसी दाने को साझा करने की वस्तु नहीं मानतीं, उसे अपने लिये आरक्षित मान लेती हैं। यह सब स्वाभाविक लगता है, जब तक निगाह बुलबुल और रॉबिन पर नहीं जाती।
बुलबुल और रॉबिन मीठा गाती हैं, पर दाने के समय चुप रहती हैं। वे न तो भीड़ में घुस सकती हैं, न किसी को डराकर हटा सकती हैं। उनके लिये न गति हथियार है, न संख्या, न आक्रामकता। आप चाहकर भी उनकी सहायता नहीं कर पाते, क्योंकि जो दाना आप उनकी ओर फेंकते हैं, उस पर भी पहले वही क़ब्ज़ा कर लेते हैं जो पहले से ताक़तवर हैं। यह असमर्थता किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरी व्यवस्था की है।
यहीं से पक्षियों का दृश्य समाज में बदलने लगता है। भारत की सामाजिक संरचना में भी कुछ वर्ग ऐसे हैं जो न तो संघर्ष की भाषा जानते हैं, न भीड़ की राजनीति कर सकते हैं। वे अपनी दरिद्रता को नैतिक प्रश्न बना लेते हैं, अधिकार का नहीं। वे माँगने को अपमान मानते हैं, और लड़ने को अपनी प्रकृति के विरुद्ध। मेरे मत में यही वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित होता है, क्योंकि वह किसी भी वितरण-प्रणाली के लिये अदृश्य रहता है।
हाशिये पर बुलबुल
गरीब बाभन की स्थिति कुछ ऐसी ही है। वह न परम्परागत शक्ति-संरचनाओं में बचा है, न नई प्रतिनिधित्व-आधारित राजनीति में समाया है। उसके पास न तो संख्या का बल है, न संगठन की आदत, न आक्रोश का वैध मंच। वह मान लेता है कि आरक्षण “उसके लिये बना ही नहीं”, और इसी मान्यता के साथ वह अपने को चर्चा से बाहर कर देता है। यह आत्म-बहिष्कार किसी नीति से कम क्रूर नहीं।
समस्या यह नहीं कि उसे कुछ मिलता नहीं; समस्या यह है कि उसके लिये “मिलना” कोई नैतिक रूप से स्वीकार्य स्थिति ही नहीं रह जाती। जैसे बुलबुल दाना माँग नहीं सकती, वैसे ही यह वर्ग अपने अभाव को मांगपत्र में बदल नहीं पाता। उसे लगता है कि अगर वह माँगेगा, तो उसकी सांस्कृतिक पूँजी भी गिर जायेगी। इस डर का समाज में कोई उपचार नहीं है, क्योंकि नीति भय नहीं देखती, केवल आँकड़े देखती है।
चरखियाँ दाना आरक्षित मानती हैं, क्योंकि उन्हें आरक्षण की भाषा आती है। कौव्वे डर पैदा करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि संसाधन डर से सुरक्षित होता है। मैना थोड़ी लड़ लेती है, क्योंकि वह मोल-भाव की राजनीति समझती है। गिलहरी सबके बीच निडर होकर खा लेती है, क्योंकि उसके पास अपने होने का सहज आत्मविश्वास है। बुलबुल और रॉबिन के पास इनमें से कुछ भी नहीं है—न डर, न दावा, न संघर्ष, न आरक्षण।
मेरे मत में आज का भारत इन्हीं बुलबुलों और रॉबिनों को समझने में असफल है। हम या तो आक्रामक वंचना को पहचानते हैं, या संगठित असंतोष को। जो वर्ग चुप है, जो नैतिक है, जो “लाइन में खड़ा” है—वह स्वतः मान लिया जाता है कि ठीक होगा। लेकिन इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है।
यह लेख किसी के पक्ष में नहीं, एक असुविधाजनक खाली जगह की ओर इशारा है। जैसे आँगन में बिखरे नमकीन के बीच कुछ पक्षी हमेशा भूखे रह जाते हैं, वैसे ही हर खुली अर्थव्यवस्था में कुछ वर्ग हमेशा बाहर रह जाते हैं। वे किसी के शत्रु नहीं होते, पर किसी के एजेंडा में भी नहीं होते। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी है।
आज का भारत भी उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ नीति लड़ने वालों के लिये है, और नैतिकता देखने वालों के लिये। बुलबुल और रॉबिन फिर भी गाती हैं। सवाल यह नहीं कि उनका गीत सुना जायेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या उनके लिये कभी दाना भी बचेगा।
दिलीप से सवेरे बात होती है। वे महराजगंज में अपनी मेडिकल की दुकान पर हैं। उनका जो छोटा भाई मैडीकल दुकान चलाता है, बीमार हो गया है। अस्पताल में भर्ती है। उसका भी काम देखना होता है।
हाईवे पर ऊपरी मंजिल में उनकी साड़ी की दुकान है — वहां मिलना हुआ उनसे। मैडीकल दुकान से मुझे मिलने वे साड़ी की दुकान में आ गये। गद्दी पर बैठे मिले।
उनकी उम्र 55-56 साल की है। अपने, अपने पिताजी और अपने बाबा — जो पांच भाई थे; के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और उनके माध्यम से जानते हैं महराजगंज का इतिहास। बाबा का जमाना 1920 का रहा। अर्थात सौ साल का इतिहास वे अच्छे से बता सकते हैं।
दिलीप चौरसिया
“आप सुनेंगे तो बहुत कहानियां हैं मेरे पास। अपने बचपन की तो हैं ही, पिताजी और बाबाजी के जमाने की भी हैं।” – दिलीप कहते हैं।
उनके बचपन में उनकी बिरादरी के 15-20 घर थे। बाबा प्रधान के घर के पास जो गली है पूरब की तरफ, उसी में बाजार था। बाबा प्रधान के घर के पास का कुआं खारे पानी का था, बाकी सब कुयें – जो दिलीप के बाबा जी और भाइयों ने खुदवाये वे मीठे पानी के थे। पर फिर भी पानी की दिक्कत हो जाती थी। गर्मी आते आते कुयें सूख जाते थे। तब साइकिल से बाल्टा लटका कर पानी सरकारी ट्यूबवेलों से लाना पड़ता था।
बिजली तो कभी कदा आती थी। आने पर इतना शोर मचता था कि अंधे को भी पता चल जाये बिजली आ गई है।… जब बिजली आती थी तो शोर मचता था, और जब नहीं होती थी—ज़िंदगी फिर भी चलती थी।
कुंये पर भी जातिगत अनुशासन था। पहले उनकी बिरादरी (चौरसिया, अग्रहरी आदि) के लोग कुंये का इस्तेमाल करते थे, चूकि कुंआ उनका खुदवाया था। उसके बाद जायसवाल लोग कुंये पर आते थे। फिर खटीक और मुसलमान लोगों की बारी आती थी।
एक जाति दूसरे के साथ कुयें की जगत पर नहीं चढ़ती थी। कभी हम लोगों को देरी हो गई और मुसलमान चढ़ गये तो हम उनके चले जाने के बाद ही कुंये पर जाते थे।
नहाने, बर्तन मांजने, कपड़े धोने के लिये दो तालाब थे। एक हुसैनीपुर में सड़क किनारे और दूसरा कंसापुर में। अब तो कंसापुर में तालाब वैसा रहा नहीं, पहले बहुत मनोरम हुआ करता था वह। आदमी लोगों का घाट अलग था और महिलाओं का अलग। महिलाओं के दो घाट थे। पूरा तालाब चारों ओर पटिया के घाटों वाला था।
तालाब का चालीस-पचास साल पहले का दृष्य
सब लोग तालाब पर जाते थे। बीमार भी। उनके साथ घर का कोई और भी रहता था। कपड़े लोग दऊरी या बाल्टी में ले कर जाते आते थे।
सभ्यता और संस्कार थे लोगों में। कोई पुरुष औरतों के घाट की ओर नहीं जाता था। बच्चा भी जब 11-12 साल का होता था तो वह भी स्त्रियों के घाट की ओर नहीं जाता था।
हर आदमी तालाब को साफ रखता था। कोई साबुन लगा कर पानी गंदा नहीं करता था। अब तो वे सारे नियम टूट गये हैं।
“हम लोग खूब तैरते थे उसमें। गाय भैंस भी ले जाते थे और उसमें नहाती भैसों पर घन्टों आनंद लेते थे हम।” – दिलीप जिस तरह बता रहे थे, मानो वे अपने बचपन में खो गये हों! …तालाब में नहाती भैंसों पर बैठे बच्चे नहीं जानते थे कि वे भविष्य की स्मृतियाँ रच रहे हैं।
“सन 1968 में हमारे परिवार की मैडीकल की दुकान थी। बनारस से बैलगाड़ी से दवा आया करती थी। पूरे जिले में इस दुकान से दवा सप्लाई होती थी। जब मेरे बड़े पिताजी और पिताजी में बंटवारा हुआ तो वह दुकान बड़े पिताजी के हिस्से गई।”
बनारस से बैलगाड़ी से दवा आया करती थी।
“मेरे पास कोई चारा न था। हमने पढ़ाई की और फिर मैने सड़क के उस पार एक लोहे की गुमटी में दवा की दुकान खोली। मेह्नत की और ईश्वर ने बहुत साथ दिया। वह गुमटी की दुकान खूब चली। मैने काफी पैसा कमाया और उसी के बल पर आज 4-5 दुकानें हैं।”
यह इतिहास किताबों में नहीं मिलता—यह कुओं की जगत, तालाब के घाट और गुमटी की कमाई में दर्ज है।
बहुत कुछ सुनाया और बहुत कुछ सुनाने को है दिलीप के पास। उनसे फिर मिलने की बात तय कर, मैने उनसे गले मिल कर विदा ली।
फिर मिलना होगा उनसे – 100 साल का इतिहास खोलने का वायदा जो किया है उन्होने! महराजगंज का अतीत किसी राजमहल में नहीं, दिलीप चौरसिया जैसे लोगों की यादों में सुरक्षित है।