कर्ज लेते हैं पर लौटाते समय कोसते हैं बाजारवाद को!


बाजार है – वह भग्वद्गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन पर नहीं चलता है. वह उपभोक्ता केन्द्रित होता है और पूंजी तथा वस्तुओं के विनिमय को सुविधजनक बनाता है. बैंक बाजार की एक महत्वपूर्ण इकाई है. बैंक वाले रेलवे स्टेशन के हॉकर की तरह चाय-चाय की रट जैसा बोल लोन बाटें तो लोग अच्छा महसूस करते हैं.Continue reading “कर्ज लेते हैं पर लौटाते समय कोसते हैं बाजारवाद को!”