स्वागत!


Prachand 1 स्वागत!

यह कटिंग मैने बीबीसी हिन्दी की साइट से उतारी है। मुझे यह नहीं मालुम कि नेपाल में क्या होने जा रहा है। पर यह अच्छा लगा कि सेना में माओवादी दखलंदाजी को नेपाल की जनता ने सही नहीं माना।

दहाल ने कहा; "मैंने (नेपाल के) प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। राष्ट्रपति का क़दम असंवैधानिक और लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है। देश का अंतरिम संविधान राष्ट्रपति को एक समांतर शक्ति के रूप में काम करने की अनुमति नहीं देता।" अगर राष्ट्रपति असंवैधानिक हैं तो दहाल उन्हे हटाने का उपक्रम करते। इस्तीफा का मतलब तो राष्ट्र उनके साथ नहीं है।

भारत में भी अनेक प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवारों की बात है। साम्यवादी प्रधानमन्त्री भी उसमें चर्चा में हैं। अगर वैसा हुआ तो भारतीय सेना में भी साम्यवादी दखल सम्भव है? कल्पना करना बहुत प्रिय नहीं लगता।


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

33 thoughts on “स्वागत!

  1. बांग्ला देश के बाद नई फ़ुंसी उगी है नेपाल मे।यही हाल रहा तो आगे चल कर ये भी फ़ोड़ा और नासूर बन जायेगा।

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  2. नेपाल वाकई गंभिर स्थिति में है.. और नेपाल ही क्यों भारत के ज्यादातर पडौसी दुखःद स्थिती में है.. हम अभी ठीक लग रहे है.. पर राजनिति का स्तर देख कह नहीं सकते कब तक.. नेता भ्रष्ट, जनता निश्क्रीय..

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  3. नेपाल का घटना क्रम भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है.भारत के पड़ोस में स्थिर सरकारें ही केवल भारत के हित में हैं.

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  4. ज्ञान Sir ,होने को तो बहुत कुछ हो सकता है लेकिन सेना में राजनीति का दखल होने की संभावनाएं बहुत ही कम हैं.अभी वही एक क्षेत्र है जो बचा हुआ है.बहुत से बहस कर सकते हैं इस विषय -पर..सच्चाई यही है..की भारतीय सेना में अभी भी अनुशासन है और रहेगा.

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  5. भगवान न करे कभी वह दिन आए जब चीन के आक्रमण के समय चीन का समर्थन करने वाले देश की सत्ता सम्भाले. भारत को तशतरी में सजा कर चीन को दे देने में इन्हे कोई गुरेज नहीं होगा. तिब्बत को निगलने के बाद अब लाल ड्रेगन नेपाल की ओर बढ़ रहा है. अमेरिका को सम्राज्य वाद की गालियाँ देने वाले लाल विचारक चीन के विस्तारवाद पर मौन है, इसे ही बौद्धिक बेईमानी कहते है. नेपाल के राष्ट्रपति ने भारत के हितों की एक बार तो रक्षा कर दी मगर कब तक? भारत को नेपाल से माओवादियों का सफाया करना चाहिए.

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  6. प्रचंड के लिए भारत के साम्यवादियों ने अभी तक कुछ नहीं किया, यह आर्श्चय की बात है. वैसे देखा जाय तो करेंगे भी क्या? अब तो सत्ता में भी नहीं है कि गृह मंत्रालय पर दबाव डालकर रा के द्बारा प्रचंड से मिलने का कार्यक्रम दिल्ली में करवाते.नेपाल की सेना में एक बार गोरिल्ला लोग भर्ती हो जाएँ. इससे बहुत लोगों को प्रेरणा मिलेगी.@ आलोक जी,नेपाल की जनता को फर्जी लोकतंत्र भी नहीं दे रहे हैं भाई लोग. जो वहां की जनता को मिल रहा है, उसे ‘दर्जी लोकतंत्र’ कहते हैं. ठीक दर्जी की तरह हैं प्रचंड जी. पहले कपड़ा जगह-जगह आड़ा-तिरछा काट डालो, उसके बाद उसकी सिलाई के लिए धागा खोजते फिरो. जय ‘दर्जी लोकतंत्र.’

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