मेरा वाहन चालक यहां से एक-सवा घण्टे की दूरी से सवेरे अपने गांव से आता है। देर रात को वापस लौटता है। लगता है अगर काम उसको जम जायेगा तो यहीं इलाहाबाद में डेरा जमायेगा। वह प्रथम पीढ़ी का प्रव्रजक होगा। इस शहर में और अन्य शहरों में भी पिछले पचीस तीस साल में गांवों से आये लोगों की तादाद तेजी से बढ़ी है। यद्यपि भारत अभी भी गांवों का देश है, पर जल्दी ही आधी से ज्यादा आबादी शहरी हो जायेगी।
गांवों से शहरों की ओर तेजी से आ रहे हैं लोग। होमो अर्बेनिस (Homo Urbanis) एक बड़ी प्रजाति बन रही है। पर हमारे शहर उसके लिये तैयार नहीं दीखते।
शहर के शहरीपन से उच्चाटन के साथ मैने उत्क्रमित प्रव्रजन (Reverse Migration) की सोची। इलाहाबाद-वाराणसी हाईवे पर पड़ते एक गांव में बसने की। वहां मैं ज्यादा जमीन ले सकता हूं। ज्यादा स्वच्छ वातावरण होगा। पर मैं देखता हूं कि उत्क्रमित प्रव्रजन के मामले दीखते नहीं। लगता है कहीं सारा विचार ही शेखचिल्ली के स्वप्न देखने जैसा न हो।
कुछ सीधे सीधे घाटे हैं गांव के – बिजली की उपलब्धता अच्छी नहीं और वैकल्पिक बिजली के साधन बहुत मंहगे साबित होते हैं। कानून और व्यवस्था की दशा शहरों की अपेक्षा उत्तरप्रदेश के गांवों में निश्चय ही खराब है। गांवों का जातिगत और राजनीतिगत इतना ध्रुवीकरण है कि निस्पृह भाव से वहां नहीं रहा जा सकता!
फिर भी लोग गांव में बसने की सोचते होंगे? शायद हां। शायद नहीं।
उत्क्रमित नाव खेवन:
रोज सवेरे गंगा की धारा के विपरीत नायलोन की डोरी से बांध एक दो आदमी नाव खीचते ले जाते हैं। आज नाव खाली थी और एक ही व्यक्ति खींच रहा था। मैने पूछा – कहां ले जाते हो रोज नाव। चलते चलते ही वह बोला – ये धूमनगंज थाने पर जाती है।
धूमनगंज थाने पर जाती इस नाव का उत्क्रमित खेवन देखें 6 सेकेण्ड के इस वीडियो में:

प्रवीण जी ने पूरा खाका ही खींच दिया है प्रवास का/आश्रम का । मुझे खूब आकर्षित कर रहा है । आकर्षित तो आपकी प्रविष्टि ने भी किया-शीर्षक से ही – ’उत्क्रमित प्रवजन’ ।
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आश्रम का आईडिया जोरदार है. शत प्रतिशत सफलता की गेरेंटी
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बड़े नगर में ऊँचे मूल्य पर मकान लेने से अच्छा है कि आबादी से १०-१२ किमी दूर डेरा बसाया जाये । शहर की (कु)व्यवस्थाओं पर आश्रित रहने की अपेक्षा कम सुविधाओं में रहना सीखा जाये । यदि ध्यान दिया जाये तो सुविधायें भी कम नहीं हैं ।१. नगर के बाहर भूमि लेने से लगभग ६-७ लाख रु का लाभ होगा । इसका एक वाहन ले लें । यदाकदा जब भी खरीददारी करने नगर जाना हो तो अपने वाहन का उपयोग करें ।२. मकान में एक तल लगभग आधा भूमितल के अन्दर रखें । भूमि के १० फीट अन्दर ५ डिग्री का सुविधाजनक तापमान अन्तर रहता है जिससे बिजली की आवश्यकता कम हो जाती है । सीपेज की समस्या को इन्सुलेशन के द्वारा दूर किया जा सकता है ।३. प्रथम तल में पु्राने घरों की तरह आँगन रखें । प्रकाश हमेशा बना रहेगा । यदि खुला रखना सम्भव न हो तो प्रकाश के लिये छ्त पारदर्शी बनवायें ।४. एक कुआँ बनवायें । पानी पीने के लिये थोड़ा श्रम आवश्यक है ।५. सोलर ऊर्जा पर निर्भरता कभी भी दुखदायी नहीं रहेगी । तकनीक बहुत ही विकसित हो चुकी है । यदि एक विंड पैनेल लगवाया जा सके तो आनन्द ही आ जाये ।६. एक गाय अवश्य पालें । गायपालन एक पूरी अर्थव्यवस्था है ।७. इण्टरनेट के बारे में निश्चिन्त रहें । डाटाकार्ड से कम से कम नेशनल हाईवे में आपको कोई समस्या नहीं आयेगी और आपका सारा कार्य हो जायेगा ।८. स्वच्छ वातावरण के लिये पेड़ ही पेड़ लगायें । नीम के भी लगायें ।९. निर्लिप्त भाव से साहित्य सृजन करें । हिन्दी की प्रगति होगी ।१०. वहाँ के समाज को आपका आगमन एक चिर प्रतीक्षित स्वप्न के साकार होने जैसा होगा ।११. अगल बगल कुछ प्लॉट रोक कर रखें । बहुत से लोग जल्दी ही टपकेंगे ।
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सुबह-सुबह गांव की याद। जय हो। सोचने में जाता क्या है। एक पोस्ट निकल आती है।
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गांवों में सिर्फ थोडी बिजली की कमी ही दिक्कत पैदा करती है बाकि गांव में आजकल सभी सुविधाएँ उपलब्ध है और जो कुछ कमी है वह पास के शहर से पूरी की जा सकती है | जातिगत धुर्विकरण भी गांव में कितना भी क्यों न हो इज्जत सबको शहर से बढ़िया मिलती है | मेरी निगाह में तो गांव में रहने का मजा ही निराला है | मै तो गांव की प्रष्ट भूमि का आदमी हूँ रिटायर्मेंट लेने के बाद सीधा गांव जा कर ही रहूँगा | सुविधा के लिए दो डेस्कटॉप रखूँगा एक खेत वाले घर में और एक गांव की हवेली में | वही से बैठकर इत्मिनान से ब्लॉग लिखा करूँगा | वाणी गीत जी आजकल गांव के लोग जितना आप समझते है उतने सीधे नहीं होते शहर से वापस गांव में जाकर बसने और उन्हें गंवार समझ हांकने वाले को गांव वाले एसा हांकते है कि वह अपना सारा शहरी ज्ञान भूल जाता है |
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हमने भी कभी उत्क्रमित प्रवजन का स्वपन देखा था कि उत्तराँचल में नौकरी लगी तो अपने गाँव वापस चले जाएँगे पर यह स्वपन अधूरा ही रह गया।
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कुछ सोलर पैनल, एक बड़ा लोन्ग बैकअप इंवार्टर लाख से दो लाख के बीच मिल जाएँगे. एक इंजीनियर इंवार्टर का थोड़ा बहुत मैंटेनेंस-रिपेयर आसानी से सीख सकता है. सॉफ पानी के लिए एकवगार्ड और जोड़ लें. बस इंटरनेट नहीं मिलेगा. पर आराम के लिए इतनी कीमत चुकाई जा सकती है, थोड़ा व्यस्त रहना चाहें तो किसी पर्यावरण, सामाजिक, ग्रामीण, प्रशिक्षण, रोज़गार संबंधी एनजीओ को अपनी शिक्षा और परामर्श का लाभ दे सकते हैं उसके सदस्य बनकर.
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एकदम तैयारी कीजिए। सोलर पॉवर अब महंगा नहीं है। बैटरी वगैरह की भी देखभाल हो जाती है। मोबाइल कनेक्सन तो हर जगह उपलब्ध है। उस वक्त तक तीव्र गति नेट भी गाँव में उपलब्ध हो जाएगा। ..गाँवों में ध्रुवीकरण तो हमेशा से रहा है। कोई नई बात थोड़े है। आप का आश्रम ध्रुवीकरण का एक नया केन्द्र होगा, यह क्यों नहीं सोचते। सत्ता और प्रभाव का आधुनिक केन्द्र – महंत चचा की कुटी। यहाँ इंटरनेट से लेकर अल्ल सुबह दार्शनिक चर्चा की सुविधा उपलब्ध है। साहित्यकार लोग दूर रहें….वाणी गीत जी को बताइए कि गँवार कितना सीधा होत है !_____________आपात कारणों से कहीं 5 बजे ही जाना था। कल ही ड्राइवर से सब सेट कर लिया था। भाई साहब अब तक नहीं आए। मोबाइल ऑफ कर परुआ मना रहे हैं। शायद गाँव से आते हैं ;) पूछने पर इतना सुन्दर बहाना मारेंगे कि आप मुग्ध हो जाएँगे। लखनऊ काहिलों की धरती है जिसका प्रभाव आस पास के गाँवों तक है। प्रयाग की क्या स्थिति है?
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गांवों का जातिगत और राजनीतिगत इतना ध्रुवीकरण है कि निस्पृह भाव से वहां नहीं रहा जा सकता!और ये हाल तब है जबकि गाँव के लोग सीधे सच्चे ईमानदार होते हैं …हाँ …शायद तभी इन्हें हांकना इतना आसान होता है ….शुभ दीपावली …!!
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यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।युग सदा विज्ञान का, चलता रहेगा।।रोशनी से इस धरा को जगमगाएँ!दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!
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