मैं पर्यटन पर नैनीताल नहीं आया। अगर आया होता तो यहां की भीड़ और शानेपंजाब/शेरेपंजाब होटल की रोशनी, झील में तैरती बतख नुमा नावें, कचरा और कुछ न कुछ खरीदने/खाने की संस्कृति को देख पर्यटन का मायने खो बैठता।
पैसे खर्च कर सूटकेस भर कर घर लौटना क्या पर्यटन है? या अब जब फोटो खीचना/वीडियो बनाना सर्व सुलभ हो गया है, तब पिंकी/बबली/पप्पू के साथ सन सेट का दृष्य उतारना भर ही पर्यटन है?
पता नहीं, मैं बहुत श्योर नहीं हूं। मैं इसपर भी पक्की तरह से नहीं हुंकारी भर सकता कि फलानी देवी या फलाने हनुमान जी को मत्था टेक पीली प्लास्टिक की पन्नियों में उनके प्रसाद के रूप में लाचीदाना ले लौटना भी पर्यटन है। मैने काठगोदाम उतर कर सीधे नैनीताल की दौड़ नहीं लगाई। मुझे वहां और रास्ते के अंग्रेजी बोर्डिंग स्कूलों में भी आकर्षित नहीं किया। एक का भी नाम याद नहीं रख सका।
ड्राइवर ने बताया कि काठगोदाम में कब्रिस्तान है। मेरी रुचि वहां जा कर उनपर लगी प्लेक पढ़ने में थी। ड्राइवर वहां ले नहीं गया। पर वह फिर कभी करूंगा। मुझे रस्ते के चीड़ के आसमान को चीरते वृक्षों में मोहित किया। और मैं यह पछताया कि मुझे कविता करनी क्यों नहीं आती। ढ़ाबे की चाय, रास्ता छेंकती बकरियां, पहाड़ी टोपी पहने झुर्रीदार बूढ़ा, भूस्खलन, दूर पहाड़ के ऊपर दीखती एक कुटिया – ये सब लगे पर्यटन के हिस्से।
खैर, यह मुझे समझ आता है कि सूटकेस भर कर घर लौटने की प्रक्रिया पर्यटन नहीं है।
चीड के पेड़, धान के खेत, पाकड़ के वृक्ष, पहाड़ी सर्पिल गौला नदी शायद अपनी सौन्दर्य समृद्धि में मगन थे। पर अगर वे देखते तो यह अनुभव करते कि ज्ञानदत्त का ध्यान अपनी घड़ी और अपने पर्स पर नहीं था – वह उनसे कुछ बात करना चाहता था। वह अभी पर्यटक बना नहीं है। अभी समझ रहा है पर्य़टन का अर्थ।
इतनी जिन्दगी बिता ली। कभी तो निकलेगा वह सार्थक पर्यटन पर!
मेरा सार्थक पर्यटन कहना शायद उतना ही सार्थक है जितना अपनी पुस्तक को समर्पित करती अज्ञेय की ये पंक्तियां:
यद्यपि उतना ही निष्प्रयोजन, जितना
एक प्राचीन गिरजाघर से लगे हुये एक भिक्षु-विहार में बैठ कर
अन्यमनस्क भाव से यह कहना कि “मैं जानता हूं
एक दिन मैं फकीर हो जाऊंगा।”

पर्यटक को जो भाये, सो पर्यटन का तात्पर्य है उसके लिए. मगर आपका गद्य पद्य की खुशबू देने लगा है. :) बधाई. कम से कम इतना तो भर ही लाये आप झोली में पर्यटन से.
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Quote @नीरज जाट जी============================================पर्यटन है अटैची भर कर और पर्स खाली करके घर वापस लौटना। ===========================================Unquoteपुरानी यादे!वर्ष १९९३कंपनी ने हमारा पोस्टिन्ग दक्षिणी कोरेया में तीन महिने के लिए किया था।मेरे मित्र भी साथ थे।रहने के लिए तीन महीने का Daily allowance, US Dollar में advance में ले गया था।मेरे मित्रों के लिए वह काफ़ी नहीं था क्योंकि वे तो अपने उपर अधिक खर्च करते थे। हम तो सीधे सादे आदमी हैं। हमारे पास, तीन महिने के बाद कुछ dollar बच हुए थे।केवल इसे खर्च करने के लिए लौटते समय हम सिन्गापोर होते हुए आए।सिन्गपोर में पहुँचते ही एक सूटकेस खरीदी और सेरंगून रोड पर मुह्म्मद मुस्टाफ़ा का वह मशहूर दूकान पर जाकर, अन्धाधुंध खरीदी की। सूटकेस भर गया था और पर्स खाली हुआ।इधर से पत्नि फ़ोन पर shopping list बता रही थी!इस shopping और purse emptying की चक्कर में हमने ठीक से सिन्गापोर देखी ही नहीं। उस उम्र में हम तो immature थे। पर्यटन करना जानते भी नहीं थे।आज, इस उम्र में मेरा सोच बिलकुल अलग है। खाली हाथ जाउंगा, खाली हाथ लौटूंगा और जैसा अजीत गुप्ताजी कहती हैं "मन की अटैची" को भरूंगा। हाल ही में मेरा अमरीका का प्रवास इस श्रेणी में आता है।शुभकामनाएंजी विश्वनाथ
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हमारे यहाँ डोंगर माफिया का प्रकोप है| हर छोटी पहाड़ियों और डोंगर पर मंदिर उग आये हैं, जाने कहां से और फिर लाउडस्पीकर के शोर और प्लास्टिक पन्नियों की बाढ़ से जंगल पट जाते हैं| मानव बस्ती से दूर पहाड़ियों पर शरण लिए वन्य प्राणी ऐसे में जाएँ तो जाएँ कहां—-मनुष्य के कदम जहां पड़ते हैं गंदगी पहुंच जाती है| महाराष्ट्र का कास क्षेत्र जंगली फूलों के लिए प्रसिद्द है| यहां हजारों की संख्या में पर्यटक आने लगे हैं| जिन जंगली फूलों के लिए कास प्रसिद्ध है उन्ही जंगली फूलों को रौंदकर पार्किंग की जाती है|चलिए कोई तो मिला जिसे बर्बादी लाने वाले पर्यटन से प्रेम नहीं—–
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@ नीरज जाट जी – सही! शायद पर्यटन शब्द नव धनाढ्यता ने हड़प लिया है। या सही शब्द देशाटन या घुमक्कड़ी हो।जो भी हो, मेरा आशय स्पष्ट है। शब्द को क्या छीलना? उसके लिये अजित/अभय/अनूप हैं न!
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मैं बताता हूं अपने मन की बात इस बारे में।पर्यटन है अटैची भर कर और पर्स खाली करके घर वापस लौटना। जबकि आप जिस चीज की बात कर रहे हैं वो घुमक्कडी है। घुमक्कडी में आदमी ना तो अपने पर्स को खाली होने देता और ना ही अटैची भरने देता।
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मेरे ख्याल से आज की तारीख में पर्यटन की कई किस्में और उनके भिन्न भिन्न उद्देश्य हैं जो इस एक शब्द को कई अर्थ देते हैं .अच्छा प्रश्न उठाया है .
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पर्यटन मेरी समझ में तन और मन को नयापन देने के लिये होना चाहिये। मैं हबड़ हबड़ में बहुत स्थान छू लेने के चक्र में नहीं रहता हूँ अपितु आराम से और धीरे धीरे प्रकृति का आनन्द लेने पर विश्वास रखता हूँ।
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'अथातो घुमक्कड़ी…' और 'एक बूंद सहसा…' जैसी पुस्तकें तो मानों पर्यटन पाठ्यक्रम की ऐसी पुस्तके हैं, जिनसे पर्यटन की डिग्री नहीं मिलेगी, घूमना चाहे सीख लें, फिर यह अपनी पसंद है कि किसके पर्यटन का उद्देश्य घुमक्कड़ी है और किसे परीक्षा में नंबर हासिल कर डिग्री लेनी है.पर्यटन में नापास, मैंने पर्यटन न सीख पाने की दास्तां बयां करने की कोशिश अपनी पिछली पोस्ट 'फिल्मी पटना' में की है.
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जल्दी से बनें पर्यटक…
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मैं तो पर्यटन के अर्थ समझती हूँ कि उस शहर की सांस्कृतिक धरोहरों को जानना और समझना। उस शहर की मिट्टी में कौन सी ऐतिहासिक खुशबू बसी है उसे जानना। अटैची भरने का नाम तो बिल्कुल भी नहीं है पर्यटन। बस मन की अटेची भरने का नाम ही है पर्यटन।
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