इन्दारा, सप्तगिरि में


मेरे घर “सप्तगिरि” में आज पीछे की तरफ देखा। सेमल का विशालकाय वृक्ष है। उसके पास गूलर और बेल के पेड़ भी हैं। सेमल की छाया में एक इन्दारा है – कुंआ। अब परित्यक्त है। कुंये की गोलाई में ईंट लगी हैं। उन्ही के साथ है एक पीपल का वृक्ष।

बहुत पुराने पन का अहसास। आसपास पेड़, जमीन पर छितरायी गिरी पत्तियां और इधर से उधर आती-जाती लतायें! यह सब देख रहा था तो कलेवा कर कुल्ला करता चन्द्रिका पास आ गया। बताने लगा कि कुंआ अब भठ गया है। कुछ साल पहले एक गेंहुअन गिर गया था इसमें। निकल नहीं पाया। कुछ दिन तो दूध गिराया गया उसे पीने के लिये। फिर खतम हो गया।

इन्दारा, पीपल और बांयी ओर सेमल के विशाल तने का अंश।
इन्दारा, पीपल और बांयी ओर सेमल के विशाल तने का अंश।

गूलर अभी लगना नहीं शुरू हुआ। बिल्वपत्र विवर्ण लगते हैं। कोई भी तीन पत्तियां मुझे कोमल, हरी और समूची नहीं दिखीं। “पड़ोस के विपुल सिंह सा’ब के घर में अच्छा बेल का पेड़ है। पत्तियां मंगानी हों तो वहां से ले आऊंगा”। चन्द्रिका ने कहा।

सेमल विशालकाय है। “साहेब पारसाल छंटवाये रहेन्; तब्बौं एतना बड़ा बा।”

सेमल, बेल, गूलर – सभी पवित्र वृक्ष हैं। पास में आंवला भी है। सप्तगिरि अपने आप में अनूठापन लिये है। पुराना, जर्जर, पवित्र और वर्णनीय!