गिरीश केसरी का शोरूम

गिरीश जी के शोरूम से लौटते समय दो चीजें मेरे मन में छायी रहीं – एक तो गिरीश जी की विनम्रता और सज्जनता (कोई शक नहीं कि वे सफल व्यवसायी हैं), और दूसरे मध्यवर्ग के बारे में मेरा अपना बदला नजरिया।

पिछले वर्ष मुझे लगा कि गांव में गांव के स्तर पर जीवन जीने की जिद; गर्मी-बरसात के मौसम में बहुत सार्थक नहीं है। यहां बिजली की समस्या है, पर उससे भी ज्यादा; बरसात के उमस भरे मौसम में (जो चार महीने चलता है) चिपचिपाती गरमी में चल नहीं पाता। अपनी व्यक्तिगत उत्पादकता लगभग शून्य हो जाती है। पत्नीजी भी अब जवान नहींं रहीं। उन्हें भी शहरी मेमसाहब से गांव की फुआ में रूपांतरण में गर्मी-बरसात झेलने की क्षमता उतनी नहीं है, जितना मैं सोचता था।

लिहाजा, यह तय किया था कि इस बरसात से पहले एयरकण्डीशनर लगवा ही लिया जाये। बढ़ती उम्र में यह पहला बड़ा समझौता था, अपने रिवर्स माइग्रेशन की साधारण जीवन जीने की जिद का। और मुझे उसका बहुत पछतावा नहीं हो रहा।

मेरे साले साहब के मित्र श्री गिरीश केसरी जी से फोन पर बात हुई। उन्हें पहले से नहीं जानता था, पर साले साहब के रेफरेंस और गिरीश जी की अपनी सज्जनता का लाभ यह हुआ कि गिरीश जी ने बनारस से एक वाहन में उपकरण और लगाने वाले कारीगर भिजवा कर 4-5 घण्टे में ही 45 किलोमीटर दूर इस गांव में एयर कण्डीशनर लगवा दिये। यह अहसास हुआ कि अभी भी हम गंवई निरीह प्राणी नहीं, रेलवे के बड़े साहब जैसा स्तर रखते हैं। 😆

गिरीश केसरी

गिरीश जी ने कह दिया था कि उपकरणों में कोई भी दिक्कत आये तो वे कोरोना काल में तुरंत ठीक कराने का वायदा तो नहीं कर सकते, पर 2-3 दिन में अवश्य निदान करा देंगे।

यह समय सीमा, हमारे हिसाब से ठीक ही थी। … पर यह नहीं मालुम था कि सामान की नुक्स की बात जल्दी ही हो जायेगी। गांव के बिजली की खराब दशा के हिसाब से वोल्टेज स्टेबलाइजर साथ में लगवाया था। वह अचानक ओवर हीट का इण्डीकेशन देने लगा। शायद उसका फैन खराब हो गया था।

गिरीश जी ने कहा कि आप उसे बनारस आ रहे हों तो कार में साथ लेते आयें, तुरंत उसे रिप्लेस कर दिया जायेगा। अगले दिन बनारस निकलने से पहले गिरीश जी से बात नहीं की, पर जब रास्ते में उन्हें सूचित किया तो समस्या खड़ी हो गयी। कोविड-19 के प्रतिबंधों के कारण आधी दुकानें बारी बारी से वहां बंद रहती हैं। उस दिन उनके शो-रूम बंद होने का दिन था। उनके आसपास का पूरा मार्केट बंद था।

फिर भी, गिरीश जी ने हमारे लिये छुट्टी के दिन भी घर से आये और अपना शो-रूम खुलवाया। हमें पूरा परिसर घुमा कर दिखाया। इस बीच उन्होने दूसरा नया स्टेबलाइजर हमारे वाहन में रखवा दिया था। कुल मिला कर हमें बहुत तवज्जो दी उन्होने। यह भी कहा कि पूरा बाजार बंद होने के कारण वे हमारी मेहमान नवाजी नहींं कर पा रहे हैं, अन्यथा चाय-कॉफी तो आ ही जाता…।

शोरूम बड़ा है गिरीश जी का। ह्वर्लपूल के सभी तरह के ह्वाइट-गुड्स वहां उपलब्ध हैं। अन्य प्रतिष्ठित ब्राण्डों के भी बिजली से चलने वाले उपकरण भी वहां थे। पिछले साल भर हमने तो उपकरण कस्बे की मार्केट या अमेजन पर खरीदे होंगे, उनका बेहतर और वाजिब विकल्प वहां मौजूद था। लेने का मन तो कई चीजों पर ललचाया, पर अपने आप को हमने प्रयास कर रोका। अन्यथा कैशलेस मार्केट का यही घाटा है। आप खाली जेब लिये बाजार जायें तो अपने मोबाइल के बैंकिंग के एप्स के बल से पहाड़ जैसी खरीददारी कर लौट सकते हैं – अगर आपमें अतिरेक में खरीददारी (impulsive buying) करने की (बुरी) आदत हो। किसी तरह हम वहां बिना खरीददारी के निकल पाये – बाजार से गुजरा हूं, खरीददार नहीं हूं वाला भाव ओढ़ कर।

गिरीश जी से मार्केट की दशा पर बातचीत हुई। उन्होने बताया कि लॉकडाउन के समय तो सब कुछ ठप हो गया था। अब भी ग्राहक बहुत नहीं लौटे हैं। पर वे घोर आशावादी नजर आये।

“यह सब सामान जो आप देख रहे हैं, कोई लग्जरी नहीं है। मध्यवर्ग की आम जरूरत की चीज बन चुके हैं। लोग सिल बट्टे पर नहीं लौट सकते, मिक्सर-ग्राइण्डर खरीदेंगे ही। एयर कण्डीशनर अब जरूरत की चीज बन गया है शहरों में। छोटी फैमिली में वाशिंग मशीन के बिना काम नहीं चल सकता। इस लिये इन चीजों की मांग में अस्थाई कमी भले आये, बिक्री होगी ही।” – गिरीश जी का यह कहना गहरे निहितार्थ वाला था। उनके अनुसार पूरे शो रूम में डेढ़ करोड़ का सामान धनाढ्य वर्ग के लिये नहीं, आम शहरी के लिये है।

अपने बारे में गिरीश जी ने बड़ी बेबाकी से कहा – “हमें तो यही (व्यवसाय) ही करना है। और क्या करें। बनिया के बच्चे हैं। नौकरी तो हमारे लिये है ही नहीं। यही काम है हमारा।”

मध्यवर्ग़ की आर्थिक पेशियों की ताकत का जो प्रकटन उनके कथन से हुआ, वह मेरे नजरिये को बदलने वाला था। मिनिमलिज्म का राग भले ही लोग, बतौर फैशन गायें, वास्तविकता यह है कि ये सब ह्वाइट गुड्स अब इतने ह्वाइट नहीं रहे। वे सब बड़ी तेजी से आवश्यकता का अंग बन गये हैं। वह जमाना अतीत हो गया जब 16 इंच का शटर वाला टेलीवीजन खरीदने के लिये पूरा परिवार दो साल बचत करता था और दिवाली के पहले एक दिन उत्सव जैसी उमंग ले कर एक साथ बाजार जाता था। … वे भी क्या दिन थे। अब हर आदमी 40-50 हजार का मोबाइल दो तीन साल में बदल ले रहा है।

गिरीश जी के शो रूम का बाहर से दृष्य

गिरीश जी के शोरूम से लौटते समय दो चीजें मेरे मन में छायी रहीं – एक तो गिरीश जी की विनम्रता और सज्जनता (कोई शक नहीं कि वे सफल व्यवसायी हैं), और दूसरे मध्यवर्ग के बारे में मेरा अपना बदला नजरिया।

अपने आप से मैंने कहा – कभी कभी शहर भी हो आया करो और वहां नये लोगों से मिला भी करो, जीडी। वहां भी देखने समझने को तुम्हे अभी बहुत कुछ मिलेगा।

धन्यवाद, गिरीश केसरी जी!

Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://halchal.blog/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyan1955

2 thoughts on “गिरीश केसरी का शोरूम”

  1. रोचक रही यह यात्रा। वैसे सही कहा आपने गाँव में भी अब वही सुविधा हो चली हैं जो शहरों में मिलती हैं। हमारे पहाड़ में ए सी की जरूरत तो नहीं है लेकिन वाशिंग मशीन फिर भी मिल जाती हैं। हाँ, मिनिमालिस्म ज्यादातरों के लिए एक fad ही है। व्यक्तिगत तौर पर मैंने पाया है कि इसने मुझे ज्यादा स्वतंत्रता दी है। चीजें कम संचय करके धन को अनुभवों पर खर्च करने का मौका दिया है। भारतीय परिवेश में,जहाँ कुछ भी करते समय चार लोग क्या सोचेंगे का ध्यान रखना चाहते हैं, में मिनिमालिस्म फॉलो करना कभी कभार जी का जंजाल बन सकता है या यू कहूँ घर वाले बना देते हैं। उन्हें समझ नहीं आता है।

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  2. बधायी हो पांडे जी एसी लगवा लिया / गावों के लिए अब यह कोई नई बात नहीं है / मै तो पिछले 10 सालों से देख रहा हू कि गावों के लोग अपने घरों मे वह सभी सुविधाये भोग रहे है जो आमतौर पर शहर के लोगों को भी नहीं मिलती / हफ्ते मे तीन चार दिन का दौरा अभी भी लगता है और घनघोर गाँव मे मैंने देखा है की लोगों के पास वही सब सुविधा है जो आमतौर पर शहरों मे भी देखने को नहीं आती / लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के मौसम और शहरी मौसम मे मुझे असामान्यता दिखती है , यह सही है / लेकिन मुझे हर मौसम मे बहुत आनंद आता है / यही जिंदगी है और जिंदगी ”देवानंद” की स्प्रिट ”गाता रहे मेरा दिल ” की तर्ज पर और ”हर फिक्र को धुयें मे उड़ाता चला गया ” की मानसिकता पर एडजस्ट करना चाहिए / अब साधारण व्यक्ति की तरह जीवन जिए यही मानसिक शांति की पहल है /

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