संगम क्षेत्र में कल्पवासी दम्पति

Aniket Bajpayi

त्रिनाथ मिश्र अपनी पुस्तक कुम्भ गाथा की प्रस्तावना में लिखते हैं – तीन प्रकार के तीर्थ होते हैं – जंगम, मानस और स्थावर। जंगम तीर्थ चलते फिरते तीर्थ हैं। उस आधार पर मुझे लगता है कि सही अनुशासन में कल्पवास करते बाजपेई दम्पति भी जंगम तीर्थ हैं। दो दिन पहले मेरे पास अवसर था उनसे मिलने का, पर योग नहीं बना।

ईश्वर योग भी यूंही नहीं बनाते शायद। हम गांव से प्रयागराज (शिवकुटी) इसलिये गये थे कि बाजपेई दम्पति से एक दो घंटे मुलाकात कर आयेंगे।

उससे पहले मेरे दायें चौभर (molar teeth) में असहनीय दर्द था। डाक्टर साहब ने दो दिन के लिये एंटीबायोटिक और पेन किलर दे दिये थे। इन दोनो दवाओं को मैने दो दिन लिया था और तीसरे दिन प्रयाग पंहुचा था। पर दांत का दर्द तो कायम रहा, दवाओं ने आतंक मचा दिया। उन्होने खराब बेक्टीरिया तो मारे, पर पाचन तंत्र के अच्छे बेक्टीरिया पर भी झाड़ू मार दिया।

मैं दांत का दर्द ले कर तो बाजपेई दम्पति से मिलने जा सकता था, पर वहां जाते ही पाचन तंत्र का आतंक सीधे उनके टेण्ट के शौचालय में जाने को बाध्य करता – यह अत्यंत अशोभनीय होता। अत: मै चाहते हुये भी उनसे मिलने न जा पाया। मेरे परिवार की महिलायें गईं वहां। मेरी पत्नीजी, बहू, पोती और नौकरानी।

वे लोग वहां से जो अनुभव ले कर आये, उन्होने मुझे और भी ललचाया वहां जाने के लिये।

Kalpvas Tent
बाजपेई दम्पति का कल्पवास टेण्ट

करीब 14फुट का वर्गाकार टेण्ट होगा उनका। उसमें सब कुछ करीने से – पूरे सौंदर्यबोध के साथ – व्यवस्थित था। दो तख्ते, जिनपर बाजपेई दम्पति रहते होंगे, जमीन पर बिछा पुआल और उसपर दरी। एक तरफ किचनेट, पूजा की चौकी और एक और तरफ टॉयलेट। चित्र में एक म्यूजिक सिस्टम और एक ढोलक भी दिखती है। शायद कीर्तन के लिये मंजीरा और झल्लक भी हो।

मैं जाता, तो शायद और विस्तार से देखता। पर गया होता, तब न!

टेण्ट में रहने वाले साढ़े चार लोग थे – बाजपेई दम्पति, उनका बेटा अंकुर और बहू तेजस्विनी। साथ में अंकुर-तेजस्विनी का एक साल का बालक अनिकेत। अनिकेत एक साल का होने पर भी कल्पवासी है। फिनलैंड से आया है कल्पवास करने। संकीर्तन के शब्द शायद न समझता हो, पर धुन पकड़ता है। उसके साथ साथ उसका शरीर उचकता है। कभी कभी जोश में ज्यादा उचक कर दरी पर लुढ़क भी जाता है। कभी ढोलक पर धुन मिलाते ढप ढप पीटता है। … अनिकेत सबके आकर्षण का केंद्र है।

अनिकेत जैसे कितने कल्पवासी होते होंगे? और वे तप-साधना में विघ्न डालते होंगे या वे साक्षात रामलला या लड्डू गोपाल होते होंगे? इस प्रश्न के उत्तर तो मुझे मिले होते अगर मैं वहां गया होता।

कई और प्रश्न हैं मेरे पास। ये लोग साल भर में एक महीना अपना शारीरिक-मानसिक डीटॉक्स करते हैं। आध्यात्मिक अनुशासन तो उनके पास पहले से ही होगा, अन्यथा इस तरह का कठोर अनुष्ठान काहे करते, सतत, साल दर साल। पर इस डीटॉक्स के क्या लाभ हैं? सामग्री छानूं तो शायद किसी विश्वविद्यालय या शोध संस्थान की रीसर्च मिल जाये; पर असल आनंद तो बाजपेई दम्पति से सुनने से ही मिल सकता है।

aniket Bajpayi
अनिकेत जैसे कितने कल्पवासी होते होंगे? और वे तप-साधना में विघ्न डालते होंगे या वे साक्षात रामलला या लड्डू गोपाल होते होंगे?

और वह आध्यात्मिक अनुशासन तथा मानसिक-शारीरिक डीटॉक्स अपने आसपास, बिना संगम के स्थावर तीर्थ के; सम्भव है? यह भी बाजपेई जी से पूछना रह गया। उनके पास मानस तीर्थानुशासन – दया, क्षमा, शांति, दान, संतोष, ज्ञान, धैर्य आदि भी पर्याप्त होगा। वह कैसे विकसित हुआ होगा? स्थावर तीर्थ – माघ मास में संगम – ने क्या भूमिका निभाई होगी उनकी उन्नति में?

एक चित्र में वे सभी दिखते हैं – बाजपेई जी एक कोने पर हैं। बाकी महिलायें हैं – श्रीमती बाजपेई, मेरी पत्नीजी, बहू, पोती, तेजस्विनी (गोदी में अनिकेत) और हमारे साथ गई अरुणा। बाजपेई जी कैमरे की ओर नहीं देख रहे। वे शून्य में देखते प्रतीत होते हैं। बाकी सब के चेहरे पर प्रसन्नता है और वे चित्र खींचने वाले अंकुर के मोबाइल की ओर निहार रहे हैं।

ये जो व्यक्ति शून्य में निहार रहा है, उसके पास सबसे गहन ऑब्जर्वेशन होने चाहियें। मुझे बाजपेई जी से मिलना चाहिये था…

Kalpvas Tent Group Pic
बाजपेई दम्पति के कल्पवास टेण्ट में ग्रुप फोटो

अगले दिन हमें वापस लौटना था। शिवकुटी से रवाना होने पर मैने अंकुर को कहा भी कि झूंसी पंहुच कर पुल से नीचे उतर हम उनसे मिलते जायेंगे। पर वह भी नहीं हो सका। मेला क्षेत्र में घुसने से बैरीकेड लगाये सिपाही ने मना कर दिया – आप जा नहीं सकते। जहां जा रहे हैं, वहीं चीफ मिनिस्टर साहब का विजिट है। ट्रेफिक रोक दिया गया है। आपको अगर मेला क्षेत्र जाना है तो वापस पुल पर लौटिये और उस ओर से मेला क्षेत्र में जाइये।

अंकुर को फोन कर मैने बताया। बगल के सतुआ बाबा आश्रम के शिविर में योगी आदित्यनाथ आये थे और चीफ मिनिस्टर के नाम पर कोई पुलीस-प्रशासन वाला जहमत नहीं उठाता। सब को रोक देता है।

आम जनता इस असुविधा को सहज भाव से लेती है। वह सामंती शासन व्यवस्था की आदी भी है और उसके भौकाल से कुछ सीमा तक चमत्कृत भी। नेता-परेता उसके माई बाप हैं। डेमी गॉड। मुझे यह डेमी-गॉडत्व खिझाता है।

एक बारगी लगा कि यह नेता मेरा वोट पाने लायक नहीं है। पर फिर लगा कि मेरे पास विकल्प क्या है। जो विकल्प हैं, वे तो शायद योगी आदित्यनाथ से भी ज्यादा भौकालिये हैं! वर्तमान शासन इसलिये नहीं चल रहा कि वह आदर्श है। वह इसलिये चल रहा है कि विकल्प उससे ज्यादा खराब है, शायद।

खैर, हम वापस अपने गांव की ओर निकल लिये। अब देखते हैं बाजपेई दम्पति से मिलने और उनपर अपनी जिज्ञासाओं की बौछार करने का कोई अवसर भविष्य में मिलेगा या नहीं। राम जानें।


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

2 thoughts on “संगम क्षेत्र में कल्पवासी दम्पति

  1. अगर ना जा पा रहे हों तो कुछ जिज्ञासाएँ तो बाजपेयी जी से फ़ोन पर संपर्क साध कर भी मिटाई जा सकती हैं – आप बेहतर समझते हैं वहाँ की स्थिति – अच्छा लगा आलेख – समीर लाल

    Liked by 1 person

    1. जी! अभी मेला महीना भर चलेगा। तब देखा जायेगा। वैसे बाजपेई जी प्रयाग में ही रहते हैं, कभी भी मिला जा सकता है।

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