महराजगंज कस्बे में हाईवे के ओवर ब्रिज़ की दीवार पर पेंट किये इन शब्दों का इश्तिहार मुझे समझ नहीं आया।
इतना जरूर लगा कि यह मानव के अज्ञात, रूहानी भय को; और उसको किसी न किसी तरह अपने पक्ष में मोड़ने का भरोसा देने का व्यवसाय भारत में करोड़ों-अरबों का है। और यह सब इनफार्मल सेक्टर है। यह जीडीपी का हिस्सा नहीं है।
इश्तिहार के शब्द –
कलमा कुरान छल्ला कशी द्वारा रोज़ी रोटी
छिनगवाह लड़ाई झगड़े की काट करवायें।
100% गारंटी शय्यद जीन्नाद ख्बीस सुल्लेमानी
मोहनी ब्रम कस्यायी माता बहनो की ब्रम थान गड़ंत भी बनवायें
समय से पहले गर्भ गिरने से पहले बचायें माता और बहनो
मोबाइल नम्बर **********, ********** दीपक भाई
महराजगंज बाईपास बसंतापुर रोड, कब्रिस्तान के सामने, कंसापुर
इसकी भाषा देखी जाये – देवनागरी में लिखी उर्दू-प्रभावित हिंदी—“कलमा कुरान”, “दुआ रोज़ी”, “इलाज”, “काट करवा” जैसे शब्द यह संकेत देते हैं कि विज्ञापन का लक्ष्य-समूह ग्रामीण/कस्बाई है। यहां भाषा शुद्ध नहीं, बल्कि कामचलाऊ और असरदार होनी चाहिए। वर्तनी और व्याकरण गौण हैं; समझ और भय का संचार प्रधान है। यह विज्ञापन पढ़ने वाले को शिक्षित नहीं, बल्कि उसकी समझ के स्तर पर उसे आश्वस्त करना चाहता है।

गांवदेहात में घास-फूस, खपरैल की बजाय पक्के मकान बन रहे हैं। बिजली आ गई है और टिकती भी है। लोग पैदल, साइकिल की बजाय मोटर साइकिल और चार चक्का पर चलने लगे हैं। पर इन सब के बावजूद जिन्न, जिन्नात, चुडैल, भूत, पिशाच, गंडा, तावीज, बरम और ब्रह्मराक्षस कम नहीं हुये। शायद बढ़ गये हों या नये युग के नये प्रकार के होने लगे हों।
शिक्षा और स्वास्थ्य – दोनो में हालत लचर होने के कारण इस तरह के विज्ञापनों में कमी नहीं आने वाली।
क्या समस्यायें सुझाने का भरोसा देता है यह? “लड़ाई-झगड़ा”, “काट करवाई”, “छिनगवाही”, “गर्भ गिरन से बचाव” —यह सब जीवन की आर्थिक या चिकित्सकीय नहीं, बल्कि सामाजिक-भावनात्मक बीमारियाँ हैं। उसके अनुसार रोग शरीर में नहीं, रिश्तों और भाग्य में है।
“काट करवा” जैसे शब्द यह संकेत देते हैं कि हिंसा या साज़िश की आशंका भी कोर्ट कचहरी नहीं, “इलाज” के दायरे में आने वाले विषय हैं।
कुरान, दुआ, कलमा—ये शब्द तर्क और विज्ञान नहीं, धर्म आर्धारित श्रद्धा को असरदार बताते हैं। दाहिनी ओर बना सूफी/फकीर जैसा चित्र इस धारणा को और गाढ़ा करता है।
यह विज्ञापन उस सामाजिक शून्य को भरता है; जहाँ पुलिस, अदालत, काउंसलिंग, और मानसिक-स्वास्थ्य सेवाएँ या तो पहुँच से बाहर हैं या भरोसेमंद नहीं लगतीं। यह इश्तिहार बताता है कि आधुनिक संस्थाएँ भले मौजूद हों, पर लोगों का डर अब भी इन्हीं गलियों में समाधान खोजता है।
रिंकू सोनकर; जिसकी दुकान से मैने सब्जी खरीदी; उसके सामने की पुल की दीवार पर यह विज्ञापन पुता था। मैं सड़क पार कर उसका चित्र लेने लगा तो रिंकू बोला – आप ये क्या कर रहे हैं? मानते हैं ये सब? यह भी कोई फोटो लेने की चीज़ है?

चित्र एआई द्वारा बनाया
रिंकू को तो मैने कुछ नहीं कहा; पर मन ही मन सोचा – यह विज्ञापन खुद ही खींच कर सुना रहा है कि “राज्य दूर है, विज्ञान कठिन है, रिश्ते उलझे हैं—पर यहाँ एक दरवाज़ा खुला है। … आइये यहां। घुमाइये फोन नम्बर!”
मैं एआई को दीवार के इश्तिहार का चित्र बनाने को कहता हूं, जिसे एक ग्रामीण पढ़ रहा है, ध्यान से। चित्र को देख सोचता हूं – अभी तो वह ग्रामीण ध्यान से इश्तिहार पढ़ता है। शायद मन ही मन फोन नम्बर भी नोट करता है। हो सकता है किसी से आगे पूछ्ता भी हो – कब्रिस्तान कहां है भाई जी।
कब्रिस्तान वाले दीपक भाई जी का लम्बा चौड़ा धंधा होगा। सौ-दो सौ की भीड़ जमा होती हो पीपल के नीचे थान पर तो कोई आश्चर्य नहीं!
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