एक तुच्छ सी किरिच का क्या भाग्य लिखा था!

Dr Maheshwari and French Scholar

अरविंदो आश्रम, पॉण्डिचेरी या रतलाम की स्मृतियों में कई बार ऐसी कथाएँ निकल आती हैं जो मन में यूं घुमड़ती हैं कि छोड़ती ही नहीं।

डॉ. हीरालाल माहेश्वरी ऐसे ही साधक थे, जिनकी बातें बार बार हम – मैं और मेरी पत्नीजी – याद करते हैं।

आज उनकी याद करते पत्नीजी ने उनकी बताई एक फ्रेंच युवती का ज़िक्र किया, जो पॉण्डिचेरी आश्रम आई थी, माहेश्वरी जी से यह अनुरोध करने कि वह संस्कृत सीखना चाहती है। यह कोई अनोखा आग्रह नहीं था, पर उसके स्वर में कुछ ऐसा था जो समय के साथ ध्यान खींचता चला गया।

माहेश्वरी जी ने पहले अपनी बेटियों से कहा कि वे उसे पढ़ा दें। बड़ी बेटी ने कहा कि उनके पास समय नहीं है। छोटी ने प्रयत्न किया, पर बात बनी नहीं। पर वह लड़की लौट कर गई नहीं, न ही उसने माहेश्वरी जी से अपना आग्रह छोड़ा।

वह बार-बार आती रही। उसमें उतावलापन नहीं था, न कोई तर्क। बस यह दृढ़ता थी कि उसे सीखना है। धीरे-धीरे माहेश्वरी जी को यह स्पष्ट होने लगा कि यह केवल सीखने की इच्छा नहीं है, यह ठहर कर प्रतीक्षा करने की क्षमता है। और जहाँ ऐसी प्रतीक्षा होती है, वहाँ अक्सर गुरु स्वयं आगे आता है। माहेश्वरी जी ने स्वयं उसे पढ़ाना शुरू किया।

माहेश्वरी जी और फ्रेंच साधिका
माहेश्वरी जी ने स्वयं उसे पढ़ाना शुरू किया। चित्र चैट जीपीटी द्वारा।

समय के साथ वह लड़की संस्कृत में पारंगत हो गई। भाषा अब उसके लिए बाहरी साधन नहीं रही, वह उसके भीतर बैठने लगी। एक दिन उसने इच्छा जताई कि वह संस्कृत किरिच की कलम से लिखना चाहती है। वही प्राचीन सरकंडे की कलम, जिसे स्याही में डुबोकर चलाया जाता है और जो लिखने वाले से धैर्य माँगती है। माहेश्वरी जी ने सहज भाव से कहा कि उनके पास ऐसी कोई कलम नहीं है, और बात वहीं समाप्त हो गई।

कुछ समय बाद माहेश्वरी जी ने मथुरा का अपना पुराना घर पूरी तरह समेटने का निश्चय किया। वर्षों की जमा वस्तुएँ छँट रही थीं, स्मृतियाँ निकल रही थीं। उसी क्रम में उन्हें अपने बच्चों की तीन-चार किरिच की कलमें मिल गईं। कब बनी थीं, किसने दी थीं — अब यह सब स्मृति से बाहर था। वे कलमें वर्षों तक पड़ी रहीं थीं, बिना किसी उपयोग या पहचान के। फैंक नहीं दी गई थीं।

वे उन्हें पॉण्डिचेरी ले आए। अगली बार जब वह फ्रेंच लड़की आई, तो माहेश्वरी जी ने वे कलमें उसके सामने रख दीं। कोई विशेष टिप्पणी नहीं, कोई भावुक क्षण नहीं। लड़की ने उन्हें देखा, हाथ में लिया, और उनमें से एक कलम चुन ली। मथुरा के माहेश्वरी जी के बचपन की वही एक कलम, जिसे उस फ्रेंच लड़की का साथ मिलना था।

फ्रेंच लड़की संस्कृत में गीता लिखती हुई
फ्रांस लौटकर उसने उसी किरिच की कलम से पूरी भगवद्गीता संस्कृत में लिखी। चित्र चैट जीपीटी का बनाया।

फ्रांस लौटकर उसने उसी किरिच की कलम से पूरी भगवद्गीता संस्कृत में लिखी। न अनुवाद, न सरलीकरण — जैसे श्लोक हैं, वैसे ही। कैलीग्राफी में, समय लेकर, ध्यान के साथ। पूरी श्रद्धा से उस किरिच की कलम को उसने चांदी के एक बहुमूल्य डिब्बे में सुरक्षित रखा।

अगली बार जब वह माहेश्वरी जी से मिली, तो वह पाण्डुलिपि और वह चांदी का डिब्बा साथ लाई। तब वह किरिच अब केवल लिखने का उपकरण नहीं रह गई थी। वह एक काल-यात्रा का साक्ष्य बन चुकी थी। वर्षों तक उपेक्षित पड़ी एक साधारण-सी वस्तु, एक संकल्पवान हाथ में पहुँच कर अपने भाग्य तक पहुँच गई थी।

मेरी राय में, इस कथा का संकेत यही है कि तुच्छ कुछ नहीं होता। वस्तुएँ भी, मनुष्यों की तरह, प्रतीक्षा करती हैं — सही समय की, सही हाथ की। एक साधारण-सी किरिच का भाग्य बदल जाना हमें यह याद दिलाता है कि मूल्य वस्तु में नहीं, उस संबंध में जन्म लेता है जो वह किसी मनुष्य की आकांक्षा से बनती है।

प्रश्न यह नहीं कि उस किरिच का क्या भाग्य लिखा था; प्रश्न यह है कि हमारे आसपास पड़ी कितनी चीज़ें, कितनी संभावनाएँ, बस ऐसे ही किसी हाथ की प्रतीक्षा में हैं।

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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