इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है।
“जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।” — इकबाल की नज़्म का हिस्सा।
भारत में अपीज़मेंट—तुष्टिकरण—की राजनीति है।
कभी “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे सुनाई देते हैं।
जहाँ उम्मीद होनी चाहिए, वहाँ मायूसी है।
शिक्षा लचर है; न्यायपालिका (कम से कम लोअर ज्यूडीशियरी) भ्रष्ट है; और सार्वजनिक विमर्श चीख बन चुका है।
सोशल मीडिया खेमाबंदी है।
ऐसे में मेरे जैसा क्या कर सकता है?
सत्तर साल की उम्र कोई उछाल की अवस्था नहीं होती। यह वह उम्र है जब आदमी न सत्ता का आकांक्षी रहता है, न क्रांति का स्वयंसेवक। वह बस यह देखना चाहता है कि जिस समाज में वह रहा, पसीना बहाया, टैक्स दिया, बच्चे पाले—वह किस दिशा में जा रहा है। आज की जम्हूरियत में यह देखना और भी बेचैन करता है, क्योंकि यहाँ आदमी तो गिना जाता है, पर सुना नहीं जाता।
इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है।
भीड़ को उपदेश देकर नहीं बदला जा सकता—न व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड रोककर, न टीवी एंकरों को कोसकर।
संख्या अपना काम करती है—वह सत्ता बनाती है, गिराती है, और फिर अगली संख्या की तैयारी में लग जाती है।
सत्तर साल का जीडी अगर अब भी यह माने कि वह “जनता को समझा देगा”, तो वह खुद को धोखा दे रहा है।
दूसरी, और अधिक कठोर समझ यह है कि चीख दोनों ओर है।
लेफ्ट की चीख भद्रलोक की चीख है—नैतिक श्रेष्ठता की चीख।
राइट की चीख सांस्कृतिक आक्रोश की।
दोनों में संवाद नहीं, सिर्फ़ प्रतिस्पर्धा है।
ऐसे में सत्तर साल के जीडी को यह तय करना पड़ता है कि वह किस भीड़ में अपनी आवाज़ मिलाए—या फिर भीड़ से अलग खड़ा रहे।
यह अलग खड़ा होना आसान नहीं है, पर यही एकमात्र सार्थक विकल्प है।
इस उम्र में जीडी को विचारधारा नहीं, विवेक चुनना चाहिए।
हर मुद्दे पर राय देना ज़रूरी नहीं।
हर अन्याय पर प्रतिक्रिया देना भी ज़रूरी नहीं।
लेकिन जहाँ वह बोले, वहाँ उसकी बात इतनी साफ़ हो कि उसे किसी खांचे में न डाला जा सके—न लेफ्ट का, न राइट का।
जीडी का सवाल सीधा होना चाहिए—
“क्या यह कदम समाज को दीर्घकाल में बेहतर बनाता है?”
संख्या के तराज़ू से नहीं, दीर्घकालिक परिणाम का अनुमान लगाता सवाल।
सत्तर साल का जीडी अब न आंदोलन खड़ा करेगा, न संस्थाएँ बदलेगा।
लेकिन वह छोटे विमर्श-द्वीप बना सकता है—
ब्लॉग, स्थानीय बातचीत, पारिवारिक चर्चाएँ, पत्नी और पोती के साथ संवाद।
यह कोई कम काम नहीं है।
लोकतंत्र का असली बीज वहीं पड़ता है जहाँ कोई व्यक्ति बिना भय, बिना लाभ, बिना तालियों की चाह के सोचता और बतियाता है।

इस उम्र में सबसे ज़रूरी काम है—अपने भीतर अधिनायकवाद को मरने देना।
यह मान लेना कि “मेरी पीढ़ी ज़्यादा समझदार थी” भी एक तरह का अधिनायक भाव है।
जीडी को सुनना होगा—युवा की उलझनें, उनकी ग़लतियाँ, और कभी-कभी उनकी मूर्खताएँ भी।
क्योंकि जम्हूरियत अगर संख्या की है, तो भविष्य भी संख्या का ही होगा।
अंततः, सत्तर साल के जीडी को यह स्वीकार करना चाहिए कि वह इतिहास नहीं बदल पाएगा।
पर वह यह तय कर सकता है कि इतिहास के किस हिस्से में वह खड़ा था—
चीख में, चुप्पी में, या सोच में।
और शायद, इसी को जीना कहते हैं।
आगे के पाँच, दस या तीस साल—
भगवान जाने हाथ की आयु-रेखा कितनी लंबी है—
उसे यही करते रहना चाहिए।
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समसामयिक चिंतन के आपके अनोखे अंदाज का ऐसा मुरीद बन गया हूं कि अगले मानसिक हलचल के आने का बेसब्री से इंतजार रहता है और नया अंक आते ही सब काम छोड़कर एक सांस में फिनिश करने की आदत सी हो गयी है। अपने इर्दगिर्द के सूक्ष्म निरीक्षण परिणामों को वैश्विक दृष्टि के सापेक्ष विश्लेषित कर प्रस्तुत करने.की जो कला या तकनीक आपके पास है, वह अत्यंत दुर्लभ है। ईश्वर आपको शारीरिक और मानसिक रुप से स्वस्थ रखें जिससे यह हलचल अनवरत रुप से पाठकों तक पहुंचता रहे।अभिवादन।
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आपकी जय हो!
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अपनी तरफ के युवाओं को बताना चाहिये कि वे भी अपना हिस्सा लेने के लिए प्रेशर ग्रुप बनायें और अपना स्वार्थ साधें. समाज का ठेका नहीं ले रखा हमने.
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आप सही हैं। शायद वे कर भी रहे हों।
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