गांवदेहात डायरी

उमरहाँ के विकास पांडे के यहां से शहद की दो बोतलें लेकर लौट रहा था। गांव के फाटक पर रुकना पड़ा—रेलवे फाटक बंद था।
इतने में एक मोटर साइकिल बगल में आकर रुकी। तीन सवार थे—नौजवान। कोई बात कर रहे थे नेपाल की। एक ने मुझसे पूछा—साइकिल बैटरी वाली है?
बात का दरवाजा उसने खोला तो मैंने भी पूछा—नेपाल की क्या बात हो रही है?
आगे वाला बोला—दद्दा, नहीं सुने? नेपाल की क्रिकेट टीम तीन सौ रन ठोंक गई। बहुत टॉप क्लास टीम है।
मुझे यह भी नहीं मालूम था कि नेपाल क्रिकेट खेलने वाला देश है। उम्र के साथ कई विषयों से विरक्ति होती है, उनमें शायद क्रिकेट भी एक है।
वह वाचाल था। बोला—बुढ़ापे में गंगा नहाया करिए। हम लोग जा रहे हैं, आप चलिये तो आपको भी नहला लाएं।
फिर बोला—चार बार गया हूं नेपाल। ट्रक चलाता हूं। बम्बई से ट्रांसफार्मर ले गया था—खाद की फैक्टरी में। बढ़िया जगह है।
खैनी थूंक, खिस्स से हंसकर बोला—लौंडियाँ भी बहुत मस्त हैं वहां।
फिर लगा, ज्यादा लिबर्टी ले गया है। तुरंत संभला—माने, घुमाने-फिराने के लिए।
पीछे बैठा लड़का जरीकेन लिए चुप था। पटरी की ओर देख आया—मालगाड़ी आ रही थी।
ट्रेन गुजर गई।
मैं सोचता रहा—क्या होगा उसमें, सीमेंट या फर्टिलाइजर? कहां जा रही होगी। देवरिया या रक्सौल?
वह नौजवान अभी भी शायद नेपाल में ही था। लड़की की कल्पना करता।
फाटक खुलते ही उसने गेट मैन को आवाज लगाई—
खोलअ भाई! गंगा जी इंतजार करत हईं हमार!
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
28 मार्च 2026
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