रविशंकर जी का फोन आया एक दिन पहले — अगियाबीर का फिर एक चक्कर लगने वाला है कल। साथ में प्रोफेसर अशोक सिंह भी रहेंगे और एक अमेरिकी सज्जन भी हैं। वे आर्कियॉलॉजिस्ट नहीं हैं। वे कहते हैं अर्थ एनर्जी पर काम कर रहे हैं। हमें भी ठीक से नहीं मालुम कि यह कौन सा फील्ड है। उन्हें भी आमंत्रित किया है हमने। आपसे मिलते हुये जायेंगे हम अगियाबीर।
अगले दिन सवेरे 9 बजे वे लोग हमारे घर आये। माइकल पतले, छ फुटिया लम्बे सज्जन निकले। उनकी टी-शर्ट पर लिखा था — Earth Energy Explorers।
वे पोर्टो रिको, अमेरिका से आये हैं। उन्होने बताया कि वे 79° देशांतर पर भारत के 7 शिव मंदिरों की अर्थ एनर्जी पर अध्ययन कर रहे हैं। केदारनाथ से रामेश्वरम तक उसी देशांतर पर हैं। काशी उसपर नहीं है, पर काशी की विशेष स्थिति होने के कारण यहां वे आये थे।

रविशंकर जी ने मुझे बताया कि माइकल उन्हें बभनियांव की पुरातत्व साइट पर मिले थे अपने उपकरणों के साथ। जब रविशंकर जी ने अगियाबीर की बात की तो वे उत्सुक हो गये। उन्हें भी साथ जोड़ लिया गया।
भारत में भूगर्भ के रहस्य जानने की बात करते जल खोजकों का इतिहास रहा है। मेरे बचपन में – जब कुंये खुदवाना न केवल बहुत श्रमसाध्य था, और खर्चीला भी; तब ये जल खोजक या अंगरेजी में डाउज़र या वाटर डिवाइनर लोगों की बहुत मांग होती थी।
भारत ही नहीं, दुनियां भर में पाये जाते रहे इस तरह के लोग।
हम में से बहुत से लोग किसी न किसी जल खोजक का किस्सा जानते हैं। वह व्यक्ति एक Y आकार की कोई टहनी ले कर अपनी धुन में इलाके का सर्वेक्षण करता घूमता था और जहां वह रुक कर बताता था, वहां खुदाई की जाती थी। बहुधा वहां खुदाई पर पानी मिल जाता था और जल खोजक की ख्याति में एक और सफलता जुड़ जाती थी।
माइकेल मुझे उस डाउज़र प्रकार के व्यक्ति लगे। उनके पास एक थैले में ताम्बे के L आकार के दो मोटे छड़ थे। जिन्हे हाथ में ले कर वे मेल या फीमेल एनर्जी का प्रतीक मानते चक्कर लगाते तो उन छड़ों की दिशा अपने से बदल जाती थी। उनके एक वीडियो के अनुसार वे दोनो छड़ें उस जगह को इंगित करती थीं जहां शिव मंदिर या गर्भगृह में शिवलिंग होता था — या इसी तरह का कोई विशिष्ट स्थान।
वीडियो में कई सामान्य लोग-लुगाइयां इस प्रयोग में हिस्सा ले कर चमत्कृत होते दिखाई दिये।
बहुत से लोग इससे प्रभावित होते दिखे। पर क्या वस्तुत: ऐसा है? अथवा, क्या सदियों पहले का जल खोजक आज वाया अमेरिका माइकेल जी के रूप में — डाउज़र के रूप में — आया है?
माइकेल जी की वेबसाइट पर मुझे विशेष जानकारी नहीं मिली। उनके वीडियो भी प्राचीत भारतीय या पाश्चात्य ‘इतिहास’ को संदर्भित करते मिले। कोई रिसर्च पेपर या कोई पीयर रिव्यू नहीं नजर आया। पर तब भी, मैं न जल खोजकों को सीधे से अस्वीकार कर सकता हूं, न माइकेल जी को।
कई वैज्ञानिक या पानी-तेल की खोज करने वाले भी इस तरह के शोधकों की सेवायें लेते रहे हैं। हमारा देश आस्था, श्रद्धा और तर्क-विज्ञान के बीच झूलता है।
वे लोग — माइकल, डा. अशोक सिंह, डा. रविशंकर और अन्य हमारे घर आधा पौना घंटा रहे। मैं माइकल जी के साथ चलते हुये गले भी मिला — उनका विज्ञान या परा-विज्ञान भले ही मुझे समझ न आया; पर आदमी तो प्यारे ही लगे।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय, विक्रमपुर, भदोही 16 अप्रेल 26
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