अगियाबीर की कंकही 

मेरे सामने कंघी के साथ कंकही पड़ी है। कंकही वह साधारण उपकरण है जो बालों से जुएं निकालने के काम आता है। मानव इतिहास में शायद ही कोई समाज रहा हो जहां जुएं न रही हों। जहां जुएं रहीं, वहां उन्हें निकालने के उपाय भी विकसित हुए। तेल लगे बालों को फैलाना और कंकही से बीनना शायद सबसे पुरानी तकनीक रही होगी।

घर की महिलाओं ने मुझे धमकाया कि मैं इस विषय पर न लिखूं और न चित्र पोस्ट करूं। जुएं अस्वच्छता का प्रतीक मानी जाती हैं। पर अगर किसी साधारण वस्तु के पीछे बहुत अलग सी कहानी हो, तो मैं ऐसी धमकी में नहीं आता।

कंकही आज की चीज नहीं है। उसका इतिहास कम से कम चार हजार साल पुराना तो जाता ही है। संभव है उससे भी पुराना हो। मिस्र की ममियों के साथ जो वस्तुएं मिली हैं उनमें कंकही भी है। सरस्वती नदी घाटी सभ्यता की खुदाइयों में भी सघन दांतों वाली कंकहियां मिली हैं।

मुलतानी मिट्टी, मेडिकेटेड साबुन और अब मेडिकर — ये सब बाद के उत्पाद हैं। पर तेल और कंकही वाली पुरानी तकनीक शायद आज भी सबसे भरोसेमंद मानी जाती है।

कंकही का समाजशास्त्र
कंकही का समाजशास्त्र

कंकही मानव के साथ सौंदर्य की आवश्यकता से नहीं, स्वच्छता की जरूरत से जुड़ी रही है। समय के साथ उसे बनाने की सामग्री बदलती रही। पहले वह हड्डी, हाथीदांत या लकड़ी से बनती थी। बीच में धातु की कंकहियों के प्रयोग भी हुए। अब जो मेरे सामने पड़ी है, वह प्लास्टिक की सस्ती और टिकाऊ कंकही है।

अगियाबीर के चाल्कोलिथिक काल की एक कंकही देखने का सौभाग्य मुझे मिला है। डॉ. अशोक सिंह वहां अपनी खुदाई पूरी कर जाने वाले थे। उन्होंने हमें द्वारिकापुर में अपनी साइट के उस कमरे में बुलाया जहां खुदाई में मिली वस्तुएं रखी थीं। अधिकांश वस्तुएं तो हम खुदाई के दौरान देख चुके थे। उनका खनन लगभग हमारे सामने ही हुआ था।

पर एक चीज डॉ. सिंह ने इस तरह निकाल कर दिखाई मानो कोई जादूगर अपने हैट से खरगोश निकाल रहा हो।

वह कंकही थी। हाथीदांत की कंकही। उसके दांत अत्यंत बारीक थे। वह लगभग पूरी थी, पर बीच में कई दांत टूट गये थे — जैसे किसी बूढ़े के कुछ दांत टूट गये हों। और रही भी तो वह तीन हजार साल से अधिक पुरानी।

जो कंकही हम देख रहे थे, वह केवल उपयोग की वस्तु भर नहीं थी। वह उस समय के शिल्प कौशल और सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न भी थी। उसे देखने का रोमांच मेरी पत्नीजी और मैं अब तक नहीं भूले हैं।

हम महसूस कर रहे थे कि उस समय — हजारों साल पहले — अगियाबीर में विशेष शिल्पकार रहे होंगे, समृद्धि रही होगी, उत्तरापथ और शायद दक्षिणापथ से भी व्यापारिक संपर्क रहे होंगे, और लोगों के पास सामान्य जरूरतों से इतर अतिरिक्त संसाधन भी रहे होंगे। वह किसी मुखिया, व्यापारी या सम्पन्न शिल्पकार परिवार की वस्तु रही होगी। संभव है उपहार या दहेज में दी गई हो।

जूं बीनने का अपना समाजशास्त्र भी रहा होगा। यह महिलाओं की आपसी बतकही, फुर्सत और सानिध्य का समय भी रहा होगा। कंकही सिर्फ औजार नहीं, संस्कृति का प्रतीक भी रही होगी।

भारत के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तेल, अलग केश-विन्यास और अलग प्रसाधन रहे होंगे; पर जो चीज सबको जोड़ती रही होगी वह शायद कंकही ही रही। चाहे बंगाल हो, तमिळनाडु हो, राजस्थान हो या बस्तर का आदिवासी इलाका — कंकही नेशनल इंटीग्रेशन का प्रतीक रही होगी!

मेरे ख्याल से यह पढ़ कर पत्नीजी अब यह नहीं कहेंगी — “खबरदार, यह पोस्ट जानी नहीं चाहिये!” 😅🤣

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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