[ छियालीस साल हो गये हमारी शादी को। याद नहीं आता कि किसी ने सालगिरह के अवसर पर उपहार दिया हो। इस बार उन लोगों ने दिया जो शादी के समय तो हो नहीं सकते थे — हमारे बिटिया और दामाद ने!
उपहार था एक माइक्रोवेव ओवन। ]
उसे इंस्टॉल करने दो दिन बाद आए मयंक। काम तो उनका दस मिनट का था, पर उसके बाद चाय पीते वे गांव-बाजार-समाज की एक खिड़की खोल गए मेरे सामने।
मयंक आईएफबी के इंस्टॉलेशन इंजीनियर हैं। बनारस में दफ्तर, मिर्जापुर-भदोही का इलाका। पिता किसान हैं। इंटर के बाद पॉलीटेक्निक किया — पढ़ाई के साथ-साथ फ्रेंचाइजी में काम भी, ताकि खुद का खर्चा खुद निकले। 17-18 साल की उम्र में ही पिता पर बोझ नहीं रहे। सोलह साल के सफर में ढाई हजार घरों की चाय पी चुके हैं — चाय के साथ-साथ लोगों का मनोविज्ञान भी जान गये हैं।
वही मनोविज्ञान बता रहे थे — फ्रिज, टीवी, कूलर, एसी अब सामान्य हो गये दहेज में। अब चाहिये कुछ नया, कुछ जो दूसरों के पास न हो। तो चालीस हजार से ऊपर का डिशवाशर आ गया दहेज की लिस्ट में। पिछले एक साल में उन्होंने मिर्जापुर-भदोही के ग्रामीण इलाकों में पंद्रह डिशवाशर इंस्टॉल किये हैं — सक्तेशगढ़, लालगंज, ड्रामंडगंज जैसी जगहों पर।
और डिशवाशर सिर्फ दहेज की नुमाइश नहीं है — पंद्रह में से आठ-नौ घरों में इस्तेमाल भी हो रहा है। कारण? बड़े मकान हैं पर रहने वाले दो ही लोग। बच्चे बड़े शहरों में हैं, कुछ परदेश में। उन दो लोगों के लिये वाशिंग मशीन और डिशवाशर जरूरत बन गये हैं।
माइक्रोवेव के बारे में भी एक बात कही उन्होंने — “लोग सोलो-ग्रिल-कन्वेक्शन का कॉम्बो लेते हैं, चार-पांच हजार ज्यादा खर्च करते हैं। पर बाटी या पिज्जा कोई नहीं बनाता।” यह भी उनकी नजर है — घर-घर जाते हैं तो दिखता है कि लोग क्या खरीदते हैं और क्या इस्तेमाल करते हैं।
चाय खत्म होने को थी तो उन्होंने एक और बात कही — बहुत से घरों में अलग से निकाले प्लास्टिक के गिलास में चाय मिलती है। जाति का अनुमान लगाते हैं लोग, कभी-कभी पूछ भी लेते हैं।
“मैं पटेल हूं। कुछ नीचा मानते हैं, कुछ बराबर का। पर मैं सब बड़ी सहजता से लेता हूं।”
सोलह साल में ढाई हजार घर। हर घर में चाय, हर चाय में एक कहानी। मयंक का नंबर ले लिया है — बातचीत और मित्रता के योग्य लगे।


आदरणीय जी डि पांडेय जी
आप के सभी लेखो का मैं एक नियमित पाठक हूँ और आपके कलम की दाद देता हूँ। ग्रमीण परिवेश में शहरी सुविधाओं का किस तरह विस्तार हो रहा है इस पर आज आपका लेख एक नया नजरिया खोलता है। मयंक बाबू का चाय किस बर्तन में दी जाती है ये हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है ; लेकिन तसल्ली इस बात की है की धीमे ही सही लेकिन हमारे समाज में कुछ जातिगत भेद भाव में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है,
आप यूँ ही लिखते रहिये और हो सके तो अपनी इन छोटी छोटी कहानियो का एक संग्रह भी प्रिंटेड फॉर्मेट में छपवा दीजिये। धन्यवाद
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आपको टिप्पणी और सुझाव के लिये बहुत बहुत धन्यवाद महोदय!
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घर घर घूम कर, बतिया कर कितना कुछ जाना लेता इंसान
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