“आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की,
इस मिट्टी से तिलक करो, यह धरती है बलिदान की।”
यह गीत बचपन से हमें भारत से प्रेम करना सिखाता है। यह हमारे देश की सुंदरता, एकता और लोकतंत्र की बात करता है। जब भी मैं यह गीत सुनती हूँ, मुझे अपने देश पर गर्व होता है।
लेकिन कल जंतर-मंतर की घटनाएँ देखकर मेरा मन बहुत दुखी हो गया। मैंने कुछ छात्रों और प्रदर्शनकारियों को पुलिसकर्मियों को फूल देते हुए देखा। यह एक शांतिपूर्ण विरोध का प्रतीक था। लेकिन उसके बाद जो लाठीचार्ज और धक्का-मुक्की की तस्वीरें और वीडियो सामने आए, उन्हें देखकर मैं बहुत परेशान हो गई।
मैं बार-बार यही सोच रही थी—क्या हमारे देश में शांति से अपनी बात कहना इतना कठिन हो गया है? क्या लोकतंत्र में लोगों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए या नहीं? अगर आज छात्रों की बातें नहीं सुनी जाएँगी, तो कल हमारी बातें कौन सुनेगा? अगर हम विरोध प्रदर्शन में नहीं जा सकते, तो हम बोल सकते हैं। अगर हम बोल नहीं सकते, तो हम लिख सकते हैं। अगर हम लिख भी नहीं सकते, तो हमें किसी न किसी तरह से विरोध करना होगा। हमें कुछ न कुछ करना ही होगा। भारत ने कल अपना सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन देखा।
सोनम वांगचुक जैसे ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट , जो हमारे अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, मुझे यह याद दिलाते हैं कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध कितना ज़रूरी है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इस पूरे मामले में कोई भी सही काम नहीं कर रहा है।
हाल ही में अपने शांतिपूर्ण अनशन के दौरान पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर अस्पताल ले जाए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि यह उनकी इच्छा के विरुद्ध किया गया और उन्हें अपनी बात खुलकर रखने की आज़ादी भी नहीं दी गई। यह घटना कई लोगों के मन में एक प्रश्न छोड़ जाती है—क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना है, या फिर असहमति की आवाज़ को सम्मानपूर्वक सुनना भी है? यदि एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी की आवाज़ भी इस तरह दबाई जाए, तो फिर “भारत एक लोकतांत्रिक देश है” यह वाक्य केवल किताबों में अच्छा लगता है |
इतिहास में जब महात्मा गांधी जी ने अन्याय के विरुद्ध अनशन किया, तो उनकी आवाज़ को गंभीरता से लिया गया। आज जब सोनम वांगचुक जी शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने के लिए अनशन कर रहे हैं, तो मेरे मन में एक सवाल उठता है। क्या आज के लोकतांत्रिक भारत में शांतिपूर्ण विरोध को उतनी ही गंभीरता से सुना जाता है, जितनी कभी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सुना जाता था? यही तुलना मुझे सबसे अधिक सोचने पर मजबूर करती है।
मैं किसी से नफ़रत नहीं करती। मैं सिर्फ़ इतना चाहती हूँ कि हमारे देश में हर व्यक्ति की बात शांति से सुनी जाए और समस्याओं का समाधान बातचीत से निकले, न कि बल प्रयोग से। यही एक सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।
