शहद खरीदने गया था, लौटते समय अपने विश्वासों की भी जाँच साथ ले आया।
कल मैं स्थानीय मधुमक्खी पालक विकास पांडे के यहाँ से तीन किलो शहद लेकर लौटा। कीमत थी ₹400 प्रति किलो। चार-पाँच वर्ष पहले जब उनसे शहद लेना शुरू किया था, तब यही शहद ₹305 प्रति किलो मिलता था। कीमत बढ़ी तो घर आकर उत्सुकतावश अमेज़न पर शहद के ब्रांड और उनकी कीमतें देखने लगा। सैफोला और एपीज़ जैसे नामी ब्रांड ₹200–300 प्रति किलो के आसपास मिल रहे थे।
उधर विकास पांडे की पत्नी और बिटिया बता रही थीं कि मधुमक्खी पालन अब घाटे का सौदा होता जा रहा है। घर से पूँजी लगानी पड़ रही है। वे सोच रहे हैं कि यदि यही स्थिति रही तो यह व्यवसाय बंद करना पड़ेगा। आखिर घाटा सहकर कोई कब तक काम करेगा?
सवाल उठा—जब मधुमक्खी पालक ₹400 प्रति किलो में अपने घर से शहद बेचकर भी घाटा सह रहा है, तो पैकिंग, ढुलाई, विपणन और मुनाफ़े के बाद बड़े ब्रांड वही शहद लगभग आधी कीमत पर कैसे बेच रहे हैं? क्या शहद की जगह चीनी या कोई सिरप मिलाया जा रहा है? या फिर बड़े पैमाने पर खरीद, ब्लेंडिंग और प्रचारात्मक छूट के कारण लागत कम हो जाती है? बिना प्रमाण किसी ब्रांड पर उँगली उठाना उचित नहीं, पर यह प्रश्न सहज ही मन में आता है।
चार सौ रुपये प्रति किलो का शहद खरीदते-खरीदते मेरा प्रश्न बदल गया। असली प्रश्न यह नहीं रह गया कि “कौन सा शहद असली है?” बल्कि यह हो गया कि “क्या शहद हमारे लिए वास्तव में आवश्यक भी है, या वह स्वास्थ्य का एक लोकप्रिय मिथक बन चुका है?”
भारतीय परंपरा में शहद का बड़ा सम्मान है। आयुर्वेद में उसे मधु कहा गया है। अनेक चूर्ण शहद के साथ लेने की सलाह दी जाती है। च्यवनप्राश का भी वह प्रमुख घटक है। शहद को औषधि का वाहक, स्वादवर्धक और स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। आंवले का अच्छा मुरब्बा भी प्रायः शहद में बनाया और बेचा जाता है।
लेकिन हम जिस युग में जी रहे हैं, वह चरक, सुश्रुत और धन्वंतरी का युग नहीं है।

आज भारत मधुमेह की राजधानी कहलाने लगा है। मोटापा बढ़ रहा है। शारीरिक श्रम घट रहा है। अधिकांश लोग दिन भर कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं। चरक के समय ऐसी जीवनशैली की कल्पना भी कठिन रही होगी।
ऐसे में किसी भी मीठे पदार्थ को लेकर नए प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
पोषण विज्ञान बताता है कि शहद का लगभग 80 प्रतिशत भाग शर्करा है—मुख्यतः फ्रक्टोज और ग्लूकोज। हाँ, उसमें कुछ एंज़ाइम, एंटीऑक्सिडेंट, परागकण और सूक्ष्म खनिज भी होते हैं। यही उसे साधारण चीनी से अलग बनाते हैं।
पर प्रश्न यह है कि क्या इन सूक्ष्म तत्वों के लिए शहद खाना आवश्यक है? वह भी तब, जब अपना HbA1c नियंत्रित रखने के लिए हम चीनी, गुड़ और मिठाइयों को लगभग पूरी निर्दयता से भोजन से बाहर कर रहे हैं।
यदि भोजन संतुलित है—दालें, सब्जियाँ, फल, साबुत अनाज और दूध पर्याप्त मात्रा में हैं—तो इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति अन्य स्रोतों से भी हो जाती है। ऐसे में शहद कोई अपरिहार्य खाद्य नहीं रह जाता। वह स्वाद का विकल्प हो सकता है, आवश्यकता नहीं।
यहाँ एक भ्रम भी दूर होना चाहिए। अक्सर कहा जाता है कि “शहद चीनी से बेहतर है।” यह बात कुछ सीमा तक सही हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जितना चाहें शहद खाएँ। शरीर अंततः कुल शर्करा को ही देखता है। यदि एक बड़ा चम्मच चीनी की जगह एक बड़ा चम्मच शहद लिया जाए, तो कैलोरी और शर्करा का अंतर उतना बड़ा नहीं है, जितना विज्ञापन बताते हैं या जितना हमारी पारम्परिक सोच मान लेती है।
हाँ, यदि कभी गले की खराश हो, किसी आयुर्वेदिक चूर्ण के साथ थोड़ा शहद लेना हो, या स्वाद के लिए दही में आधा चम्मच मिलाना हो, तो शायद कोई विशेष आपत्ति नहीं। समस्या तब शुरू होती है, जब शहद को “सुपरफूड” मानकर नियमित और अधिक मात्रा में लिया जाने लगे।
आयुर्वेद के प्रति भी हमें संतुलित दृष्टि रखनी चाहिए। हमारे प्राचीन ग्रंथ ऐसे समाज के लिए लिखे गए थे, जहाँ लोग खेतों में श्रम करते थे, परिष्कृत चीनी उपलब्ध नहीं थी और मधुमेह आज जितना व्यापक नहीं था। इसलिए परंपरा का सम्मान करते हुए उसकी हर सलाह को आज की परिस्थितियों में भी परखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति का रक्त शर्करा स्तर बढ़ा हुआ है, तो यह पूछना अनुचित नहीं कि शीतोपलादि चूर्ण शहद की बजाय गुनगुने पानी के साथ लिया जा सकता है या नहीं।
मेरे लिए इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष अब सरल हो गया है।
यदि विश्वसनीय स्थानीय मधुमक्खी पालक का शहद उपलब्ध है, तो उसे खरीदना ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैव विविधता—दोनों के लिए अच्छा है। इसलिए सैफोला के ₹200–300 वाले शहद की बजाय मैं विकास पांडे का ₹400 वाला शहद ही खरीदूँगा। अभी तीन बोतलें ले आया हूँ। चार महीने चल जाएँगी।
उसके बाद मैं अपने ऊपर एक छोटा-सा प्रयोग करूँगा। रोज़ एक चम्मच शहद के साथ शीतोपलादि चूर्ण लेने की बजाय, बीच-बीच में वही चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लेकर देखूँगा। मेरा शरीर क्या कहता है, उसे भी सुनना चाहिए।
आख़िर मधुमेह के इस युग में सबसे बड़ी औषधि अब भी वही पुरानी है—संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और संयम।
शहद का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसकी मिथकीय प्रतिष्ठा का नहीं।
आख़िर सत्तर पार की उम्र अपने विश्वासों को बचाए रखने की नहीं, उन्हें परखते रहने की भी तो होनी चाहिए। नहीं?
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