निजी सम्पत्ति – नन्दीग्राम – साम्यवाद – कार्पोरेट कल्चर


टाइटल में चार समूहों में शब्द हैं। ये चारों एक दूसरे से जुडे हैं। नन्दीग्राम का बवाल निजी सम्पत्ति को सरकार द्वारा कब्जा कर लेने के यत्न से उपजी किसानों की कुंठा का हिंसात्मक प्रदर्शन है। साम्यवाद निजी सम्पत्ति को अहमियत नहीं देता है। यह अलग बात है की चीन की संसद ने पिछले महीनेContinue reading “निजी सम्पत्ति – नन्दीग्राम – साम्यवाद – कार्पोरेट कल्चर”

धन पर श्री अरविन्द


भारतीय मनीषियों व दार्शनिकों ने धन पर बहुत सकारात्मक नहीं लिखा है. ‘माया महा ठगिनी’ है – यही अवधारणा प्रधान रही है. धन को साधना में अवरोध माना गया है. स्वामी विवेकानन्द ने तो अपने गुरु के साथ उनके बिस्तर के नीचे पैसे रख कर उनके रिस्पांस की परीक्षा ली थी. धन के दैवीय होनेContinue reading “धन पर श्री अरविन्द”

टाटा डकैत तो नहीं है


अज़दक जी बहुत बढ़िया लिखते हैं. हमें तो लिखने का एक महीने का अनुभव है, सो उनकी टक्कर का लिखने की कोई गलतफ़हमी नहीं है. लेकिन सोचने में फर्क जरूर है. अपने चिठ्ठे में अजदक ने सिंगूर में टाटा के प्लान्ट के लिये हो रहे जमीन के अधिग्रहण को बदनीयती, धांधली, “जनता का पैसा लुटाContinue reading “टाटा डकैत तो नहीं है”

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