कटिया फंसाने को सामाजिक स्वीकृति है यहां


मिसिराइन (कल्पित नाम; फिर भी सभी मिसिर-मिसिराइन जी से क्षमा याचना सहित) हफ्ते भर से फड़फड़ी खा रही थीं. बिजली वाले से किसी बात पर तनी तना हो गयी थी और वह इलेक्ट्रानिक मीटर लगा गया था. मीटर फर्र-फर्र चल रहा था और मिसिराइन का दिल डूबा जा रहा था. वो जिस-तिस से समस्या काContinue reading “कटिया फंसाने को सामाजिक स्वीकृति है यहां”

ये अखबार की कतरनें क्यों बटोरते हैं लोग?


अखबार में हिन्दी ब्लागिंग के बारे में छप जाये तो सनसनी छा जाती है. नोटपैड एक दिन पहले बताता है कि कल कुछ छ्पने वाला है. अपनी प्रति सुरक्षित करा लें. एक और जगह से विलाप आता है कि अरे हमारे यहां तो फलां पेपर आता नहीं – भैया, स्कैन कर एक पोस्ट छाप देना.Continue reading “ये अखबार की कतरनें क्यों बटोरते हैं लोग?”

विकलांगों को उचित स्थान दें समाज में


भारतीय समाज विकलांगों के प्रति निर्दय है. लंगड़ा, बहरा, अन्धा, पगला, एंचाताना – ये सभी शब्द व्यक्ति की स्थिति कम उसके प्रति उपेक्षा ज्यादा दर्शाते हैं. इसलिये अगर हमारे घर में कोई विकलांग है तो हम उसे समाज की नजरों से बचा कर रखना चाहते हैं – कौन उपेक्षा झेले.. या यह सोचते हैं किContinue reading “विकलांगों को उचित स्थान दें समाज में”

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