निरालाजी के इलाहाबाद पर क्या गर्व करना?


मुझे एक सज्जन ने पूरे फख्र से मेरी पोस्ट पर टिप्पणी में कहा है कि वे निराला के इलाहाबाद के हैं. उसपर एक अन्य मित्र ने बेनाम टीप करते हुये निरालाजी की मन्सूर से तुलना की है – “अगर चढ़ता न सूली पर तो वो मन्सूर क्या होता”. निराला, जैसा मुझे मालूम है, इलाहाबाद मेंContinue reading “निरालाजी के इलाहाबाद पर क्या गर्व करना?”

शहर में रहती है नीलगाय


शहर में आपसे 20-25 कदम पर चरती नीलगाय दिख जाये और आपको देख भागने की बजाय फोटो के लिए पोज देने लगे, तो कैसा लगेगा? आज मेरे साथ वही हुआ. इलाहाबाद में प्रयाग स्टेशन से फाफामऊ को जाने वाली रेल लाइन जब गंगा के पास पंहुचती है तब उस लाइन के दायें 200-250 मीटर कीContinue reading “शहर में रहती है नीलगाय”

इँदारा कब उपेक्षित हो गया?


बचपन में गांव का इँदारा (कुआँ) जीवन का केन्द्र होता था. खुरखुन्दे (असली नाम मातादीन) कँहार जब पानी निकालता था तब गडारी पर नीचे-ऊपर आती-जाती रस्सी (लजुरी) संगीत पैदा करती थी. धारी दार नेकर भर पहने उसका गबरू शरीर अब भी मुझे याद है. पता नहीं उसने इँदारे से पानी निकालना कब बंद किया. इँदाराContinue reading “इँदारा कब उपेक्षित हो गया?”

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