
गांवदेहात डायरी
वह नौजवान साइकिल पर आगे एक बोर्ड लगाये था और पीछे कैरियर पर एक बैग। पहली नज़र में लगा—कोई फेरीवाला होगा, जो सवेरे-सवेरे निकल पड़ा है। गांव में ऐसे फेरीवाले अक्सर दिख जाते हैं।
जिज्ञासा हुई तो मैंने अपनी साइकिल आगे बढ़ाई और बोर्ड पढ़ा। तब पता चला—वे फेरीवाले नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर (बिहार) से वृन्दावन की साइकिल यात्रा पर निकले हैं। रोज़ लगभग पचास किलोमीटर चलते हैं, जहां जगह मिल जाये, वहीं रुक जाते हैं। कुल 970 किलोमीटर की यात्रा है, जिसमें अभी करीब 650 किलोमीटर शेष हैं।
नाम है—कुंदन आर्य। उम्र 28 वर्ष। अविवाहित। इससे पहले भी कई साइकिल यात्राएं कर चुके हैं—उज्जैन, ॐकारेश्वर, त्र्यम्बकेश्वर, घृष्णेश्वर और केदारनाथ तक। 2024 में केदारेश्वर की यात्रा की थी, फिर दो साल का विराम रहा। अब दोबारा निकल पड़े हैं।
मैंने पूछा—समय हो तो मेरे घर चाय पीते चलें? वे सहज ही मेरे साथ मुड़ लिये।
घर पर पत्नीजी ने उनका स्वागत किया। हाथ-मुंह धोकर कुंदन ने पहले मिठाई-पानी लिया, फिर चाय। इसी बीच उनकी बातें भी होती रहीं।
मुजफ्फरपुर में वे सरकारी अस्पताल में लोगों को निशुल्क भोजन कराते हैं। सप्ताह में एक-दो दिन, लगभग दो सौ लोगों को भोजन। इसके लिए उन्होंने एक संस्था बनाई है—महादेव फाउंडेशन। फेसबुक-इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं, और उनकी साइकिल पर सहायतार्थ क्यूआर कोड भी लगा है।
लोग मदद करते होंगे—मैंने सोचा। पर कुंदन ने कहा—यात्रा का खर्च तो अपना ही रहता है।
“लोग सहायता कर देते हैं, ढाबे वाले कभी बिना पैसे या कम पैसे में खिला देते हैं। पर मेरा ध्येय मुफ्त तलाशना नहीं है।”
यात्रा के लिए साइकिल भी उन्होंने साढ़े पांच हजार रुपये में खरीदी। मोटे टायर वाली ऑल-टेरेन साइकिल—दुकानदार ने उनका उद्देश्य देख कर रियायत दे दी।
पीछे कैरियर पर एक बैग और साथ में फोल्डिंग मच्छरदानी। जहां जगह मिले—किसी मंदिर के ओसारे में रुक जाते हैं। ज़मीन पर चादर, ऊपर मच्छरदानी—बस, रात गुज़र जाती है।
सुबह ठंडे समय में तीन-चार घंटे चलते हैं—बिना किसी जल्दबाज़ी के। शाम को फिर लंबा चलना होता है। कभी-कभी रात के बारह-एक भी बज जाते हैं।
मैंने पूछा—रास्ते में लोग कैसे मिलते हैं?
कुंदन बोले—“ज़्यादातर अच्छे ही मिलते हैं। मदद करने वाले। पर पांचों उंगलियां बराबर तो नहीं होतीं।”
आधा घंटा साथ बिताने पर लगा—यह लड़का सरल है। यात्राओं का कोई अहंकार नहीं। बार-बार अपनी संस्था और उसके काम की ही बात करता रहा—मानो वही उसका असली लक्ष्य हो।
सरल दिखने वाले लोग अक्सर भीतर से बहुत सुसंगत – व्यवस्थित होते हैं।
उन्हें खुद पता होता है कि वे क्या कर रहे हैं—बस भाषा में नहीं बताते।
वृन्दावन की यात्रा का विचार कैसे आया?
कुंदन कहने लगे—प्रेमानंद महाराज को सुनते रहे। मन में इच्छा जगी कि उनसे मिलना है—वह भी साइकिल यात्रा से उनके पास जा कर।
“दो-तीन दिन सपने में भी आये… फिर मैं रुका नहीं, निकल पड़ा।”
मेरे घर पर कुंदन ने तीस-चालीस सेकंड की एक रील भी बनाई। मैंने उनका फेसबुक पेज देखा—काफी लोग जुड़े हैं। सोशल मीडिया का अच्छा उपयोग कर रहे हैं।
पत्नीजी ने उनके साथ मेरा एक चित्र लिया—साइकिल सहित। गेट तक छोड़ने गया तो उन्हें गले लगा कर विदा किया। अच्छा लगा—28 साल के एक नौजवान से मिलना।
शायद आगे भी कभी बातचीत होती रहेगी।
भारत में केवल महापंडित राहुल सांकृत्यायन और बिमल डे ही नहीं हैं—कुंदन जैसे घुमक्कड़ भी हैं, जिन्हें अब सोशल मीडिया पहचान दे रहा है। उन्हें शायद किसी ग्रंथ-लेखन की दरकार नहीं। नये युग में ग्रंथ लेखन की जगह रील-लाइक्स-फालोवर्स ने बड़ी दक्षता से ले ली है।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
13 अप्रेल 2026
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