श्री अम्बिका शक्तिपीठ, विराटनगर


03 जून 2023

गीताप्रेस की “शक्तिपीठ दर्शन” में एक पैराग्राफ है – जयपुर के 64किमी उत्तर में महाभारतकालीन विराटनगर के पुराने खण्डहर हैं … यहीं पर विराट ग्राम में शक्तिपीठ है। यहां देवी के दांये पैर की उंगलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति “अम्बिका” और भैरव “अमृत” हैं।

यह शक्तिपीठ एक पहाड़ी पर है। सीढ़ियां बनी हैं वहां जाने के लिये पर बहुत ज्यादा नहीं चढ़ना पड़ता। भोर में ही पंचवटी आश्रम के हनुमान मंदिर, जहां प्रेमसागर रुके थे, से निकल कर ढाई किलोमीटर चल कर शक्तिपीठ तक पंहुचे। रास्ता भी सीधा सीधा नहीं है। जंगल सा है। पूछते हुये गये।

श्री अम्बिका शक्तिपीठ की सीढ़ियां

मंदिर के पास कुछ सवेरे पूजा अर्चना करने आई महिलायें भर हैं। उन्होने ही बताया कि पुजारी जी तो आठ बजे तक आते हैं। मंदिर खुला ही रहता है। प्रेमसागर ने खुद ही घण्टी बजाई, ध्यान किया और दर्शन कर बाहर निकले। “भईया, मंदिल छोटा ही है। शक्तिपीठ का बोर्ड जरूर लगा है। माता की आंखें बड़ी सुंदर हैं। लगता है कुछ बोल रही हैं। अकेले वहां अच्छा लगा पर भईया हमको यह समझ नहीं आता कि वह पुजारी कैसे हैं जो ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर देवी देवता की अर्चना नहीं करते? उस पुजारी से ज्यादा अच्छी तो वे औरतें हैं जो सवेरे सवेरे वहां आई थीं।”

मंदिर के पास कुछ सवेरे पूजा अर्चना करने आई महिलायें भर हैं। उन्होने ही बताया कि पुजारी जी तो आठ बजे तक आते हैं। मंदिर खुला ही रहता है।

अरावली की पहाड़ियों से झांकता सवेरे का सूरज – बहुत मोहक दृश्य है और प्रेमसागर ने अपने मोबाइल के साधारण कैमरे से खींचा भी अच्छे से है। चित्र में बिजली के खम्भे और तार जरूर आ गये हैं, पर उनको दरकिनार कर दिया जाये तो सब कुछ वैसा ही है जैसा महाभारतकाल में अज्ञातवास झेलते पाण्डवों ने देखा होगा।

अरावली की पहाड़ियों से झांकता सवेरे का सूरज – बहुत मोहक दृश्य है

“यहां से भईया पंचवटी जा कर अपना सामान उठाऊंगा और चल दूंगा जयपुर की तरफ। थोड़ा लेट निकलना होगा। आज गर्मी भी ज्यादा होगी, ऐसा लगता है। देखें कितना दूर चलना हो पाता है। पुष्कर में शक्तिपीठ दर्शन कर हफ्ता भर आराम करूंगा और फिर निकलना होगा गुजरात। या फिर मध्यप्रदेश के अमरकण्टक। इन जगहों पर पहले जा चुका हूं तो चलना कम पड़ेगा। अमरकण्टक, जबलपुर, उज्जैन और फिर गुजरात। … ” प्रेमसागर आगे की सोचने लगते हैं।

श्री अम्बिका शक्तिपीठ

“भईया एक बात हमको समझ नहीं आता। मध्यप्रदेश में भी जगह देखा। उसको भी विराट नगर कहा जाता है। वहां भी पाण्डवों के रहने के परमान हैं। लोग जनकपुर में भी विराटनगर की बात करते हैं। यहां बहुत ज्यादा बताने वाले नहीं मिले। लोग कहते हैं कि आज आगे वह जगह मिलेगा जहां हनुमान जी भीम के सामने पूंछ रास्ते में रख कर लेटे मिले थे और दोनो में लड़ाई में भीम हो पटक दिये थे। पर भईया विराट नगर के इतने दावेदार हैं कि हम कंफ्यूज हो जाते हैं।” प्रेमसागर ने अपनी शंका व्यक्त की। कायदे से यह शंका उन्हें अपने आध्यात्मिक प्राइम मूवर्स के सामने रखनी जी, जिनकी प्रेरणा से वे यात्रा पर निकले हैं। पर जब मुझसे पूछा तो मैंने चैट जीपीटी को उत्तर देने के लिये पकड़ा।

मैंने उससे पूछा – Where is Virat kingdom of Mahabharat era. I understand many places claim to be the real Virat Nagar. Which is most authentic.

उसने उत्तर में कई स्थान बताये। उसको मैंने दिये उत्तर का हिंदी अनुवाद करने को भी कहा।

सो, विराट नगर के दावेदार बहुत हैं। चित्तौड़गढ़, हनुमानगढ़, बठिंडा, झुंझनू, होशियारपुर, दंतेवाड़ा, चण्डीगढ़, हरियाणा — अनेक स्थल। पर चैटजीपीटी के अनुसार सबसे सम्भावित दावेदारी बैरठ या विराट नगर की है। वह स्थान जहां प्रेमसागर अभी खड़े थे!

चैटजीपीटी का चैट एक मुद्दे को तो फ्लैग करता है। भारत में पुरातत्व को ले कर बहुत काम है जो किया जाना है। इसकी ओर विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और आर्कियॉलॉजिकल सर्वे को काम करने का न तो पर्याप्त मोटीवेशन है और न संसाधन। और तथाकथित हिंदू गौरव की सरकार तो इस दिशा में रत्ती भर भी नहीं कर रही। उसका एक ही काम है – चुनाव दर चुनाव जीतना! :sad:

इस शक्तिपीठ स्थल की दावेदारी का कोई और स्थान मुझे नहीं मिला। कई अन्य स्रोत तो इस शक्तिपीठ को सूची में डालते भी नहीं। मसलन अलका पाण्डे की पुस्तक ‘शक्ति’ में तो राजस्थान का कोई शक्तिपीठ वर्णित ही नहीं है।

चैटजीपीटी का चैट एक मुद्दे को तो फ्लैग करता है। भारत में पुरातत्व को ले कर बहुत काम है जो किया जाना है। इसकी ओर विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और आर्कियॉलॉजिकल सर्वे को काम करने का न तो पर्याप्त मोटीवेशन है और न संसाधन। और तथाकथित हिंदू गौरव की सरकार तो इस दिशा में रत्ती भर भी नहीं कर रही। उसका एक ही काम है – चुनाव दर चुनाव जीतना! :sad:

पर मुझे अच्छा लगा कि इस मनोरम, एकांत और छोटे स्थान की यात्रा प्रेमसागर ने की। मेरे ख्याल से देवी (या देवता) ऐसे निर्जन स्थलों पर ही रहते हैं जहां मानव ने उनका कमर्शियल दोहन नहीं किया है।

शक्तिपीठों में अगर किसी एक जगह मुझे जाने को कहा जाये तो मैं कामाख्या, मंगला गौरी, विशालाक्षी, छिन्नमस्ता … इनके दर्शन की बजाय बैरठ के इस मंदिर में आना पसंद करूंगा। ॐ मात्रे नम:!

श्री अम्बिका शक्तिपीठ से पहाड़ियों का मनोरम दृश्य

हर हर हर हर महादेव। यहां भैरव ‘अमृत’ हैं। भगवान हमें अमृतत्व प्रदान करें!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

सरिस्का से बैराट, विराटनगर


2 जून 2023

बाबा प्रेमदास के मिष्टान्न भण्डार में रात गुजारने के बाद अगले दिन (2 जून को) प्रेमसागर आगे रवाना हुये। वे सरिस्का बाघ अभयारण्य से गुजर रहे थे। सड़क बफर जोन और अभयारण्य की सीमा से गुजरती है। मिष्टान भण्डार के मालिक जी से उन्हें सलाह दी कि भोर में न निकलें। कुछ समय गुजर जाने दें। सड़क पर थोड़ी चहल पहल हो जाये तभी जाना ठीक होगा। उन्हें रास्ते के लिये एक लाठी भी दे दी। अन्यथा, कम सामान ले कर चलने के हिसाब से प्रेमसागर एक स्लिंग बैग भर ले कर यात्रा कर रहे थे। यह यात्रा उनकी कांवर यात्रा से बिल्कुल अलग है। उस यात्रा में तो कांवर और पोटली आदि मिला कर कांधे पर तीस किलो का वजन हुआ करता था।

सफारी का बुकिंग ऑफिस और जीप

एक स्थान पर अभयारण्य सफारी का बुकिंग ऑफिस मिला। एक जीप खड़ी थी। उसमें प्रति व्यक्ति 1200रुपये के हिसाब से बुकिंग हो रही थी। jजीप में छ सैलानी आते हैं। उन्हें दोपहर तीन बजे से शाम सात बजे तक यह जीप अभयारण्य में लोगों को घुमाने के बाद इसी स्थान पर वापस ला कर छोड़ती है। जीप वाला बोल रहा था कि उसको इस सफारी से प्रति व्यक्ति तीन सौ मिलते हैं। बाकी सरकार (वन विभाग?) लेती है।

एक वेब साइट पर मुझे सफारी का रेट 800रुपये दिखा। हो सकता है कि साइट अपडेट न की गयी हो। या यह भी हो सकता है कि जीप वाला चार सौ रुपया ज्यादा झटक रहा हो। फिलहाल प्रेमसागर को सफारी भ्रमण नहीं, शक्तिपीठ की यात्रा करनी थी। वे आगे बढ़े।

एक जगह एक भले सज्जन कौव्वों और मछलियों को रोटी और कबूतरों को दाना खिलाते मिले।

वन्य क्षेत्र मोहक था। एक जगह एक भले सज्जन कौव्वों और मछलियों को रोटी और कबूतरों को दाना खिलाते मिले। “लोग बड़े भले हैं इस इलाके में भईया।”

कुछ छोटे जानवर उन्हें रास्ते में मिले। एक जगह जंगली सूअर भी दिखा। लगा कि वह हमला कर सकता है, पर यह भी लगा कि अगर हमला करेगा तो पास में लाठी है। दो चार लाठी तो जमा ही सकते हैं। “भईया इतनी यात्रा का एक बदलाव तो है। अब भय उतना नहीं लगता। पहले जंगल और पानी में अकेले नहीं हिल सकता था। अब जाने में कोई दिक्कत नहीं होती। शक्तिपीठ यात्रा का यह प्रभाव तो हुआ है।”

“यहां हर बड़ी मिठाई की दुकान पर मावा स्टीम से बनता है।”

“मैने आपको एक मशीन के फोटो भेजे हैं। यहां हर बड़ी मिठाई की दुकान पर मावा स्टीम से बनता है। एक जगह भाप बनाई जाती है। वह पाइप से तीन कड़ाहों पर जाती है। दूध गरम होता है और तीसरे कड़ाहे में वह मावा बनता है।” – प्रेमसागर ने बताया। मुझे इस मशीन के बारे में नहीं पता था। नेट पर देखा तो ज्यादा मंहगी नहीं है चालीस-पचास हजार की है। हाथ से पल्टा चला कर खोआ बनाने की जरूरत नहीं होती। खोआ जलने की सम्भावना भी नहीं होती। प्रेमसागर की पदयात्रा का लाभ हुआ कि ऐसी मशीन का पता चला।

चाक गोरवारी में। यहां करन अर्जुन की शूटिंग हुई थी। बकौल प्रेमसागर – “जो दाये साइड में भैया हैं वो दुकानदार बलविंदर सिंह का
किराएदार निभाए थे”

शाम के समय, विराट नगर के कुछ पहले एक गांव – चाक गोरवारी (प्रेमसागर चाक गौदावरी लिखते हैं, पर मैं स्थानों के नामों के बारे में उनकी बजाय गूगल को ज्यादा सही मानता हूं) – में कोई फिल्म करन-अर्जुन की शूटिंग हुई थी, ऐसा प्रेमसागर को पता चला। जिस दुकान में शूटिंग हुई थी, वह देखी। जिस सज्जन ने कोई “बलविंदर सिंह” का रोल अदा किया था, वे सज्जन भी मिले। “चित्र में दांये साइड जो भईया हैं, वे बलविंदर सिंह का किरायेदार अदा किये” – प्रेमसागर ने अपनी भाषा में भेजे गये चित्र के साथ लिखा। अब चित्र में प्रेमसागर के साथ तीन व्यक्ति हैं। कौन किरदार अदा करने वाले हैं – वह मुझे स्पष्ट नहीं होता। वह जानने के लिये मैंने पूछा भी नहीं। फिल्म में दिलचस्पी नहीं मुझे! :-)

शाम सात आठ बजे पंहुचे होंगे प्रेमसागर विराट नगर। वहां पंचवटी में हनुमान मंदिर में उन्हें रहने को जगह मिली। श्री अम्बिका शक्तिपीठ वहां से ढाई किलोमीटर आगे पहाड़ी पर है। मंदिर चौबीस घण्टे खुला रहता है पर रास्ता जंगली और सुनसान है। पंचवटी के हनुमान मंदिर वालों ने सलाह दी कि वे रात में दर्शन करने की बजाय अगले दिन सवेरे दर्शन करने जायें।

पंचवटी में सीतेश मिश्र के साथ प्रेमसागर

रात हनुमान मंदिर में गुजारी प्रेमसागर ने। मंदिर के प्रबंधक-पुजारी हैं सीतेश मिश्र जी। एक बालक प्रेमसागर के लिये भोजन बनवा कर लाया अपने घर से। महेश सैनी जी उसके बाबा हैं।

पदयात्रा में कोई करन-अर्जुन के किरदार, कोई सीतेश मिश्र, कोई महेश सैनी जी, कोई बाबा प्रेमदास मिल जाते हैं प्रेमसागर को। जहां यात्रा में सहायता स्नेह मिलता है, वहां यात्रा सुखद होती है। वहां मंदिरों में भगवान होते हैं। जहां नहीं होता, वहां कुड़बुड़ाहट व्यक्त करते हैं प्रेमसागर। पर यात्रा की प्रकृति पर उन सब से फर्क नहीं पड़ता। अगला दिन होता है और प्रेमसागर आगे की यात्रा पर निकल लेते हैं।

[यह लेखन तीन दिन के समयांतराल के बाद है। इस बीच प्रेमसागर अस्वस्थ हो चुके हैं और यात्रा बीच में रोक कर लौट गये हैं। अभी सलेमपुर से गुजर रहे हैं। बड़ी बहन जीरादेई रहती हैं। सिवान के पास। जीरादेई बाबू राजेंद्रप्रसाद का पैत्रिक स्थान है। … अजब गजब है यह पदयात्री! लू लगने पर एक हजार किमी की बस और कार से यात्रा कर घर जा रहा है कि वहां हफ्ता भर आराम कर फिर निकलेगा!

प्रेमसागर की लोकेशन, सलेमपुर, देवरिया के आगे।

खैर, इस दौरान प्रेमसागर की पदयात्रा के एक सप्ताह के पैचेज बाकी हैं। जिन्हे टुकड़े टुकड़े में रोज लिखने का प्रयास करूंगा।]

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

वेटरन्स का ग्रुप और रेल रक्षा कवच


कोरोमण्डल एक्स्प्रेस की भीषण दुर्घटना से मेरी दिनचर्या में खलल पड़ा है। रिटायरमेण्ट के बाद गांव में अपने घर के बगल के रेलवे क्रॉसिंग के अलावा मैं रेलवे के बारे में सोचता नहीं था। यूं मैं कई ह्वाट्सएप्प के रेल अधिकारी समूहों का सदस्य हूं जिनपर दिन भर में हजार दो हजार अपडेट्स रहते हैं। पर मैं उनमें निष्कृय सदस्य हूं। उनका नोटीफिकेशन भी मैंने म्यूट कर रखा है।

इनमें सबसे सक्रिय ग्रुप आईआरटीएस वेटरन्स का है। इसमें रिटायर्ड वरिष्टतम अधिकारी हैं जो तरह तरह के विषयों पर अपने विचार देते रहते हैं। पिछले पांच छ साल में शायद ही कभी मैंने इसे खंगाला हो या टिप्पणी की हो। वे सब प्रबुद्ध जन हैं और उनमें अलग तरह का, गांव में बैठा और साइकिल पर घूमता मैं हूं। सो मेरे पास उनके लायक कहने को कुछ होता नहीं है। :-)

पर दुर्घटना के बाद पिछले एक दो दिनों से मैं वहां लोगों के स्टेटस पढ़ रहा हूं। मैं जानना चाहता हूं कि बालासोर के पास कोरोमण्डल एक्स्प्रेस की दुर्घटना के बारे में उनके पास क्या जानकारी है। और वहां जानकारी बहुत ही अद्यतन है। उनके पास बहनागा बाजार दुघटना का स्केच है, दुर्घटना के बाद का गतिविधि लॉग है, सीनियर सबॉर्डिनेट्स की प्राथमिक रिपोर्ट है। बहुत कुछ है। निश्चय ही वे लोग कार्यरत अधिकारियों के भी सम्पर्क में हैं और लगभग हर एक के पास अपनी थ्योरी है कि वास्तव में क्या हुआ होगा। उनके पास अपने अनुभव भी हैं, जिनमें इसी तरह की अनेकानेक दुर्घटनाओं का इतिहास है। कमिश्नर रेलवे स्टेफ्टी की जांचों की गाथायें हैं और रेल मंत्रियों के बारे में अपने अपने विचार हैं।

निष्पक्ष हो, वह सब पढ़ना बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक है। उनको पढ़ कर यह भी लगता है कि उस दुनियां से असम्पृक्त रह कर मैं कितना अजनबी सा बनता जा रहा हूं। वे 160-170 लोग हैं जो रेलवे के शीर्षथ पदों पर रह चुके हैं। उनकी भाषा परिष्कृत है। उनके स्टेटस “सुप्रभात, गुड नाइट, जै श्री राम” छाप टिल्ल सी बातों के नहीं होते। वे अगर कोई अन्य ग्रुप या व्यक्ति का संदेश शेयर भी करते हैं तो शेयर करने का अपना कारण भी बताते हैं। भारत की राजनीति अर्थशास्त्र पर वे अलहदा विचारों वाले लोग हैं – धुर वामपंथी से ले कर धुर दक्षिणपंथी तक। कोई सज्जन नॉस्टाल्जिया में जी रहे हैं, कोई संगीत में अपने प्रयोग कर रहे हैं, कोई खबरों से अपडेट हैं और कोई अपनी कार में निकले हैं भारत भ्रमण पर। बुद्धिजीवियों की क्रीम है वहां।

मुझे लगता है कि मैं भले ही ग्रुप में कोई विचार व्यक्त न करूं, वहां मुझे जानकारी बहुत मिल सकती है। जानकारी भी और विचार भी।

इस बालासोर के समीप की तीन गाड़ियों की दुर्घटना पर काफी जानकारी मुझे मिलती है उस ग्रुप में। मेरे पास इस बारे में बातचीत करने को कोई नहीं है। मैं चैटजीपीटी को पकड़ता हूं। वह भी हाथ खड़े कर देता है। कहता है कि उसके पास 2021 के बाद का खबर, राजनीति या अर्थशास्त्र का डाटा नहीं है। वह यह भी नहीं जानता कि उसके पास 2023 तक की जानकारी कब तक आ जायेगी। वह कहता है –

OpenAI, जो मेरे पीछे स्थित है, नियमित रूप से अपडेट और नई जानकारी प्रदान करता है। तारीखों और जानकारी की अद्यतनता के बारे में सटीक जानकारी के लिए, आपको OpenAI या मेरे उपयोगकर्ता इंटरफेस से सीधे जाँच करना चाहिए।

शरीफ है वह। मैं उससे घुमाफिरा कर जानकारी लेने की कोशिश करता हूं, पर जानकारी उसके पास है नहीं। रक्षा कवच या एण्टी कोलीजन डिवाइस के बारे में वह गोलमोल बोलता है –

एंटी-कोलीशन डिवाइस भारतीय रेलवे द्वारा विकसित और लगाया जाता है ताकि ट्रेनों के बीच टक्करों की संभावना को कम किया जा सके। यह डिवाइस गति, पथ और अन्य मापदंडों को ध्यान में रखते हुए रेलवे ट्रैक पर चलने वाली ट्रेनों को संचालित करता है। इसके उपयोग से ट्रेनों के बीच की दूरी को समायोजित करके, गति नियंत्रण करके और रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम के साथ इंटीग्रेट करके आपत्तिजनक स्थितियों को रोका जा सकता है।

[…] भारतीय रेलवे नियमित रूप से नवीनतम सुरक्षा तकनीकों का अध्ययन करती है और इन्हें अपने रेलवे नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश करती है, ताकि दुर्घटनाएं और ट्रेन संघर्ष की संभावना को कम से कम रखा जा सके।

अखबार, ह्वाट्सएप्प के लिये वेटरन्स ग्रुप के स्टेटस और चैटजीपीटी से नोकझोंक – इन सब से मैं रेल की दुनिया में, अस्थाई तौर पर ही सही, एकबार लौटता हूं।

दुर्घटना के बारे में कोई विचार व्यक्त करना जल्दबाजी होगी। किसी एक पर – ट्रेक वालों पर, सिगनल मेण्टेनर्स पर या यातायात कर्मियों पर तरफदारी दिखाना सही नहीं होगा। पर मुझे यह तो लगता है रेलवे को एक अलग मंत्री चाहिये जो सिस्टम समझता हो, बुली न हो और रेल यातायात से आमदनी और सुरक्षा पर खर्चे में सही तालमेल बिठाने वाला हो। झकाझक रेलवे स्टेशनों पर खर्च करने – जो एयरपोर्ट से कम्पीट करते होंं – की बजाय यातायात इंफ्रा पर खर्च होना चाहिये।

रेल दुर्घटना स्थल पर गुमसुम प्रधानमंत्री की फोटो से कुछ अंदाज लगाया जाये तो शायद कुछ अलग होना भी चाहिये। आखिर चुनाव भी तो साल भर में होने हैं।


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