एक चिठ्ठा गूगल को चुनौती के लिए चाहिए


बिजनेस वीक में “Is Google Too Powerful?“ के नाम से बड़ा रोचक लेख है। मैं तर्जुमा करने की स्थिति में अभी नहीं हूं। सो कृपया आप सीधा सोर्स से पढें।

लेख का मतलब यह है कि गूगल्जान (Google+Amazon) 2014 तक इतना पावरफुल हो जाएगा कि दुनिया के आनलाइन नालेज बैंक (फुटकर लोगों की खबर, मनोरंजन, ब्लोग आदि) के इपिक (Evolving Personalized Information Construct) संस्करण से हर एक को मन माफिक माल परोस कर पारम्परिक मीडिया को चौपट कर देगा।

अब यह भी कोई बात हुई – अमेरिकी जाएंट सबको सरपोट जाये? एक चिठ्ठा गूगल को चुनौती के लिए जरूर चाहिए।

बिजनेस वीक पर पोस्ट किये दो रियेक्शन पढें:


Nickname:
Juhi
Review: They must allow readers to PULL content by letting them participate in content choice, generatiFor newspapers/mags to compete with Google, editors must stop unilaterally deciding what readers should read and PUSHING content to them.on, feedback etc.
Date reviewed: Apr 4, 2007 8:05 AM

Nickname:
journalism junkie
Review: The catch is that nearly all professional news collecting and reporting rests on an advertising model, even NPRs sponsor announcements are ads. Google takes the ad revenue away that supports journalism. What happens to democracy when there’s no one around to file FOI requests or check out what’s happening at Walter Reed Hospital? We should all worry about this.
Date reviewed: Apr 4, 2007 1:14 AM

नारद और हिंदी के हर मर्ज की दवा


मैं अपने एक इंस्पेक्टर को कहा रहा था कि कहीं से दिनकर की उर्वशी खरीद लायें। मेरी प्रति खो गयी है।

मेरे एक गाडी नियंत्रक पास में खडे थे। बोले – साहब आपने पिछली बार दिल्ली भेजा था तो कुछ लोग वहां बात कर रहे थे कि आपकी हिंदी के बारे में अगर कोई प्राबलम हो तो एक साईट इण्टरनेट पर खुली है। नारद के नाम से। कोई कनाडे और दुबई वाले ने मिल कर खोली है। आप तो इन्टरनेट देखते रहते हैं, उनसे नारद पर सहायता ले सकते हैं।

मैं देखता रह गया । नारद की ख्याति फैल रही है। पर किसा रुप में!

अच्छा मित्रों, राम-राम!


महीना भर हिन्दी में लिखने की साध पूरी कर ली. रूटीन काम के अलावा रात में ट्रेन ऑपरेशन से जुड़ी़ समस्याओं के फोन सुनना; कभी-कभी ट्रेन दुर्घटना के कारण गाडि़यों को रास्ता बदल कर चलाने की कवायद करना; और फिर मजे के लिये दो उंगली से हिन्दी टाइप कर ब्लॉग बनाना – थोडा़ ज्यादा ही हो गया. यह चिठेरी इतनी ज्यादा चल नहीं सकती, अगर आपका प्रोफेशन आपसे एक्सीलेन्स की डिमाण्ड रखता हो.

मैं यूं ही चिठ्ठे पर हाइबरनेशन में जा सकता था. पर शायद नहीं. आपको अगर खैनी खाने की लत लग जाये तो उसे छोड़ने का तरीका यही है कि आप एनाउंस करदें कि अब से नहीं खायेंगे. मैने कभी तम्बाकू का सेवन नहीं किया है, पर चिठेरी छोड़ने को वही तकनीक अपनानी होगी. वर्ना एक पोस्ट से दूसरी पर चलते जायेंगे.

मैं यह लिख कर लत छोड़ने का एनाउन्समेंट कर रहा हूं.

नारद की रेटिंग में २-३-४ ग्रेड तक गुंजाइश है. उतना तो मेन्टेन कर ही लेंगे. ब्रेन-इन्जरी पर लिखना है. कई भाइयों ने सहायता का आश्वासन दिया है. तो अपने को तैयार करना ही है.

अभयजी (मैं अभय से अभयजी पर उतर रहा हूं – उनसे पंगे रिजाल्व जो नहीं हो पाये) से विशेष राम-राम कहनी है.

ब्लॉग में लिखने का अनुभव कुछ वैसा था – जैसे रेलवे के अपने कैरिज से निकल कर ट्रेन में गुमनाम सफर करते दोस्त बना रहा होऊं. रेलवे के कम्पार्टमेण्टलाइज्ड जीवन में वह मजा नहीं है. यहां तो ऊर्ध्वाकार सेट-अप में या तो आप अफसर हैं, या आपके ऊपर कोई अफसर है.

अच्छा मित्रों, राम-राम!

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