चारवाक का युग आ गया है!


“जीवन का क्या भरोसा। जितना सामने है, उसका आनंद लो। कुछ नहीं है तो ऋण लेकर घी पियो।”

चारवाक ने यह बात बहुत पहले कह दी थी। तब शायद किसी ने गंभीरता से नहीं ली। आज लग रहा है — आदमी नहीं बदला, बस साधन बदल गये हैं। घी अब भी है, ऋण भी है; फर्क बस इतना है कि अब घी पेट में कम, पेट्रोल टैंक और सोशल मीडिया में ज़्यादा जाता है।

रेल फाटक बंद होता है तो जहां मुश्किल से कोई वाहन खड़ा होता था दस साल पहले, आज वहां डेढ़ दर्जन मोटर साइकिलें खड़ी हो जाती हैं। उतनी ही दूसरी ओर भी खड़ी हो जाती हैं।

रेल फाटक ही क्यों, बगल की सड़क पर आपसी कम्पीटीशन में दो ट्रेक्टर भी अगर फंस गये तो देखते देखते ढेरों मोटर साइकिलें रुक जाती हैं। मोटर साइकिलों का तो सैलाब आ गया है #गांवदेहात में।

मोटर साइकिलों का तो सैलाब आ गया है #गांवदेहात में।

इन मोटरसाइकिलों में से अस्सी प्रतिशत — या उससे भी ज़्यादा — लोन पर हैं। शायद यही वजह है कि उन्हें आंधाधुंध चलाने में ज़्यादा डर भी नहीं लगता। जो चीज़ पूरी अपनी नहीं होती, उसके गिर जाने का शोक भी आधा ही होता है।

लोन अब सिर्फ वाहन तक सीमित नहीं रहा।
बच्चे का जन्मदिन उधार पर मनाया जाता है। केक नहीं, पूरा इवेंट। कहीं-कहीं तो डीजे भी। शादी में नहीं — बच्चे के बर्थडे में। लगता है खुशी अब तभी पूरी होती है जब उसके साथ एक ईएमआई भी चल रही हो।

फलाने की बिटिया को बेटा हुआ तो पाँच बोलेरो भर कर लोग बधावा देने गये। डेढ़ लाख का सामान। कैशपोर से लोन उठा कर। पहले लोग खुशियाँ बाँटते थे, अब किस्तें बाँटते हैं। सामूहिक उत्सव अब सामूहिक देनदारी में बदल चुका है।

वह ज़माना गया जब महाजन “अनही ब्याज” पर कर्ज़ देता था — रुपया पर एक आना महीना — और देखते-देखते खेत लिखवा लेता था। अब महाजन सभ्य हो गया है। मात्र सतरह प्रतिशत पर लोन देता है। खेत नहीं लिखवाता, सिर्फ तारीख़ लिखवा लेता है।
डर अब डंडे का नहीं, मोबाइल के नोटिफिकेशन का है। उगाही करने आने वाले कर्मचारी का है।

कई लोग दो-तीन कंपनियों से अलग-अलग लोन लिये हैं। सब अपने-अपने तरीके से घी पी रहे हैं। कोई मोटरसाइकिल में, कोई मोबाइल में, कोई समारोहों में। चारवाक अगर आज होते तो शायद दर्शन नहीं लिखते — फाइनेंस एप लॉन्च करते।

Charvak Launching Loan App
चारवाक अगर आज होते तो शायद दर्शन नहीं लिखते — फाइनेंस एप लॉन्च करते।

शायद ही अब कोई घर, कोई परिवार, कोई गांव होगा जहाँ सुविधाओं के लिये लोन न लिया गया हो। सुविधा भी अब सुविधा नहीं रही — वह न्यूनतम जरूरत बन गई है। बिना उसके आदमी अधूरा लगता है। पेट भरने के लिये कमाने का युग अब नहीं है। राशन तो फ्री मिलता ही है।

लोगों का जीवन स्तर बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन जीवन का बोझ भी उसी अनुपात में बढ़ा है। फर्क बस इतना है कि बोझ अब कंधे पर नहीं, कैलेंडर पर टंगा रहता है।

मैं यह सब देखकर न परेशान होता हूँ, न रोमांचित।
रिटायर आदमी हूँ। किनारे बैठकर देखता हूँ।
चारवाक का युग आया है — यह नोट करता हूँ।
घी कौन पी रहा है, कितनी किस्त में — यह हिसाब दूसरों पर छोड़ देता हूँ।

बस, इसी जुगत में रहता हूं कि इस उम्र में महर्षि चारवाक का शिष्य न बनना पड़े।

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महराजगंज कस्बे का बदलाव – दांत की डाक्टरी


कस्बे के बाजार के बदलाव की कथा अगर कही जाए, तो वह पिछले एक दशक में कहीं ज़्यादा स्पष्ट दिखती है। जब मैं रिटायर होकर यहाँ आया था, तब इक्का‑दुक्का ही प्रशिक्षित फ़िज़ीशियन थे; बाकी झोलाछाप। छोटी‑सी समस्या के लिए भी बनारस जाना पड़ता था, और ख़राब हाईवे व बढ़े ट्रैफ़िक के कारण दो घंटे से कम में पहुँचना मुश्किल था। 

अब बनारस गये मुझे आठ महीना हो गया है। शहर जाने की जरूरत ही नहीं होती। सब यहीं काम चल जाता है। 

यहां तक कि दांत की समस्या के लिये भी बनारस नहीं जाना पड़ा। पिछले एक साल से महराजगंज के डा. स्वमित्र दुबे मेरे दांत के डाक्टर हैं।

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डा. स्वमित्र के यहां नई जूनियर डेंटिस्ट 

डा. स्वमित्र के यहां वह नवयुवती जूनियर डेंटिस्ट है। साल भर बाद हम वहां गये तो पाया कि सजा हुआ है उनका प्रतीक्षा कक्ष। नये साल का बधाई संदेश, झिलमिलाती झालर और दीवारों पर लटकते रंग बिरंगे गुब्बारे।

मेरी पत्नीजी ने कहा – ये नई लड़की के आने का परिणाम है। साफ सफाई और सजावट में एक नारी का टच है। और उसका व्यवहार भी कितना पॉलिश्ड है – गांव में होते हुये भी। 

जब हम पंहुचे तो वह शेल्फ में लगी देवताओं की मूर्तियों और चित्रों को साफ कर पूजा कर रही थी। अगरबत्ती की सुगंध वातावरण में थी।

Junior Dentist
काम शुरू करने से पहले अगरबत्ती जला पूजा करती खुशबू। वह जूनियर डेंटिस्ट है।

वह जूनियर डेंटिस्ट हैं—खुशबू दुबे, पास के लक्ष्मणा गाँव की। एक नवयुवती डॉक्टर का वर्णन करना मेरे लिए आसान नहीं, फिर भी—चेहरे पर शांत एकाग्रता, बिना बनावटी मुस्कान या दिखावटी आत्मविश्वास। काम पर टिकी निगाहें, सलीके से बँधे बाल, कमर तक जाती चोटी—गाँव और पेशेवर प्रशिक्षण का सटीक फ्यूज़न। न झिझक, न जल्दबाज़ी—बस यह भाव कि जो करना है, ठीक से करना है।

गाँव की पृष्ठभूमि और पेशेवर प्रशिक्षण का यह मेल उसके चेहरे पर और वेशभूषा से साफ़ पढ़ा जाता है; जैसे मेहनत ने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे गढ़ा हो, और अब वह बिना शोर किए मौजूद है।

ऐसा प्रोफाइल महराजगंज के कस्बाई एम्बियेंस में – मैं एक दशक पहले, या एक साल पहले तक भी, कल्पना नहीं करता था।

मेरा ट्रीटमेंट तो डा. स्वमित्र ने किया, पर खुशबू पूरे समय उनकी सहायता को मौजूद रही। यहां तक हुआ कि मैने अपने केस से सम्बंधित प्रश्न भी खुशबू से पूछना सही समझा। 

MAHRAJGANJ DENTIST
स्वमित्र और खुशबू ऑपरेशन करते हुये

यह बदलाव कस्बे के चरित्र में परिवर्तन के रूप में देखा जाना चाहिये।

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एक पीढ़ी पहले दांत का क्या इलाज था? 

राजन भाई 73-74 साल के हैं। उनका पीछे का एक दांत गायब है। पूछा कैसे और किसने उखाड़ा?

“छोट रहे – 11-12 साल के। गांउं में फलाने गुरू उखाड़े रहें।” – राजन भाई ने बताया।

फलाने गुरू किसानी करते हैं/थे। लगे हाथ दांत वांत भी देख लिया करते थे। औजार भी क्या रहे होंगे? हो सकता है रसोई की संडसी से उखाड़ा हो। एनीस्थीसिया के नाम पर बहलाने के लिये कोई कहानी सुनाई हो और दिमाग फिरते ही खट्ट से निकाल दिया हो दांत?

मैं जब गांव में रीवर्स माइग्रेट हुआ, तब भी इसी छाप की डाक्टरी देखा करता था। अभी भी बगल में मिरगी से ले कर भगंदर-फिश्तुला-बवासीर तक के इलाज की सिंगल विंडो झोंपड़ी है, जिसके सामने मैने 35-40 मोटरसाइकिलें खड़ी गिनी हैं। पचास साठ लोगों की लाइन! 

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भरोसे की धीमी लड़ाई

पर स्वमित्र के लिये अभी भी अपनी साख के लिये मेहनत करनी होती है। वे बता रहे थे – “एक सज्जन आये जो फीस का नाम सुनते ही बांहे पीछे कर सीना निकाल बोले – ई महराजगंज में कउन आया है जो दांत देखने की फीस लेने की बात कर रहा है।” 

“यही लोग बनारस जा कर खेत बेच मंहगा इलाज कराते हैं और वहां की फीस पर कुछ नहीं कहते।” 

लोग अपने आसपास गुणवत्ता के उभरते द्वीप को नोटिस नहीं करते। अभी उन्हें यकीन ही नहीं है कि यहां बगल में स्तरीय सुविधा मिल सकती है। वे मान कर चलते हैं कि यह तो गंगा के करार की जमीन है, जहां सिर्फ सरपत उगता है – उत्कृष्टता और प्रतिभा की खेती यहां कहां!

लीनियर नहीं, लॉगरिद्मिक बदलाव 

पर बदलाव तो हो रहा है। दस साल में बदलाव मैने देखा है। आगे वह और भी तेज होगा। 
दांत की डाक्टरी तो एक पक्ष है। खुशबू की खुशबू केवल एक अकेले की नहीं होगी। बदलाब लीनियर नहीं, लॉग्रिद्मिक होता है!

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महराजगंज बाजार में पानी की पाइप लाइन


बाबा प्रधान की तबियत कुछ नासाज़ थी। सवेरे देर से उठे थे, पर फिर भी मेरे साथ आ बैठे। बातचीत यूँ ही शुरू हुई और देखते-देखते महराजगंज बाजार के बढ़ने की कहानी आगे खुलने लगी—कैसे धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाएँ आईं, और पानी जैसी साधारण लगने वाली चीज़ कभी पूरे बाजार की सामूहिक चिंता हुआ करती थी।

ज्यादा पुरानी बात नहीं होगी—आज से कोई तीस साल पहले या उसके आसपास की। हुसैनीपुर-कंसापुर की संधि पर, जहाँ हुसैनीपुर के कोने पर बाबा प्रधान की मेडिकल की दुकान है, उससे दोनों ओर करीब-करीब सौ-सौ मीटर तक बनिया लोग बसे थे—सेठ, चौरसिया, जायसवाल। सड़क तब भी उतनी ही चौड़ी थी जितनी आज है, पर हालत बहुत खराब रहती थी। नालियों की कोई व्यवस्था नहीं थी। बरसात में घुटनों तक पानी भर जाता था।

आसपास तीन-चार कुएँ थे, पर सबका पानी खारा। पीने में दिक्कत, दाल ठीक से नहीं पकती थी और खारे पानी से कपड़े भी साफ़ नहीं होते थे। बाबा प्रधान बताते हैं कि पानी का स्वाद ही नहीं, पानी का असर भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता था।

हाईवे के उस पार, करीब पाँच-छह सौ मीटर दूर मंदिर था और उसके साथ जुड़ा तालाब। वह अब भी है। औरतें सिर पर अनाज और कपड़े लेकर वहीं जाती थीं—धोतीं, गीला अनाज और कपड़ा लेकर लौटतीं। पीने का मीठा पानी तो आसपास के गाँवों से आता था। तिउरी और तितराही में सिंचाई के लिए ट्यूबवेल लगे थे। वहीं से लोग सिर पर हंडा रखकर पानी लाते थे।

Mahrajganj Miniature Painting
महराजगंज का शिवाला और तालाब – पानी का प्रबंधन| मिनियेचर पेंटिंग।

“मैं तब पचीस साल का रहा,” बाबा प्रधान बोले। “अपने साथी-संगियों के साथ चर्चा की और एक दल बनाया—नाम रखा क्षेत्र विकास पार्टी।” उन्होंने बताया कि वे मेरे श्वसुर जी, पंडित शिवानंद जी, से भी मिले थे, और उन्होंने हमेशा सहयोग और प्रोत्साहन दिया।

इसी बीच एक सज्जन बगल से गुजर रहे थे। बाबा प्रधान ने उन्हें बुलाकर परिचय कराया—
“ये हैं नागेंद्र चौरसिया। मेरे अभिन्न मित्र। साथ-साथ पढ़े हम। औराई के काशीराज कॉलेज से इंटर पास किया। इलाके के लिए जो कुछ किया, इनके साथ किया।”

नागेंद्र जी से परिचय हुआ। बाबा प्रधान के हम-उम्र हैं। आगे उनसे भी विस्तार से बात होगी। ओरल हिस्ट्री के पात्र मिलते जा रहे हैं—और हर पात्र के साथ बाजार का एक नया कोना खुलता है।

बाबा प्रधान आगे बताते रहे—
“हम लोगों ने साइकिलें जुटाईं। तितराही-तिउरी के ट्यूबवेलों से बाल्टियों में मीठा पानी अपनी बस्ती तक लाने लगे। लोगों को लगने लगा कि नौजवान कुछ अपने लिए नहीं, पूरे समुदाय के लिए कर रहे हैं।”

“जायसवाल जी थे—लंबे, स्वस्थ शरीर के, गोरे, बड़ी शानदार पर्सनालिटी। उनके पास एक मारुति ओमनी वैन थी। हमने उन्हें भी पार्टी में जोड़ा। उस समय तेल सस्ता था। हम पाँच-सात लोग कई बार बनारस गए, अधिकारियों से मिले। अनुरोध और विनय की भाषा में बात रखी।”

परिणाम निकला।
सन 1993 में पानी की पाइप लाइन स्वीकृत हुई। जगह-जगह नल लगे। महराजगंज के लिए यह किसी क्रांति से कम नहीं था। कई घरों में पहली बार नल से गिरते पानी को लोग देर तक देखते ही रहे।

“अच्छा, तब पानी की टंकी बन गई थी?” मैंने पूछा।

“नहीं,” बाबा प्रधान बोले। “तब चकापुर में सरकारी ट्यूबवेल था, उसी से सप्लाई आती थी। टंकी तो बाद में बनी। पानी समय-समय पर आता था, पर घर-घर पानी पहुँचना—यह बड़ी बात थी।”

बात देर तक चली। फिर पुनः मिलने का वादा करके विदा हुआ।
बाबा प्रधान जी से सुनने को अभी और भी बहुत कुछ है—महराजगंज बाजार के विकास की यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।

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