केदारनाथ, 11वाँ ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न, प्रेमसागर


मैं प्रेमसागर से तालमेल नहीं बिठा पाया। उन्होने अपनी कांवर यात्रा का ‘लास्ट-पुश’ जोर से दिया। कल सवेरे तीन बजे निकल लिये फाटा से। सवेरे साढ़े आठ बजे उनका फोन सोनप्रयाग से आया। बाजार की चहल पहल के शोर के बैकग्राउण्ड में वे एक लाठी खरीद रहे थे – “भईया, अब यहां छड़ी और रेनकोट के बिना काम नहीं चलेगा। रेनकोट का इंतजाम कर लिया है। छड़ी खरीद कर आगे बढ़ूंगा। आज केदार दर्शन करने का कोशिश है। इसलिये सवेरे तीन बजे निकल लिया हूं। देर भी होगी, तो भी आज केदारनाथ पंहुच ही जाऊंगा।”

सोनप्रयाग में छड़ी और रेनकोट के साथ प्रेम सागर

फाटा से केदार 40 किमी दूर है। खड़ी चढ़ाई के बीच पैदल यात्रा चालीस किलोमीटर की; वह भी जिंदगी में पहली बार – मुझे लगा कि ज्यादा ही अटेम्प्ट कर रहे हैं प्रेमसागर। पर उनके कहे के बीच मुझे किंतु-परंतु कहने का अवसर नहीं था। नेटवर्क बहुत अच्छा नहीं था। बात बमुश्किल हो रही थी। उनके भेजे चित्र और उनकी लाइव लोकेशन तो मुझे मिल ही नहीं पाये। दिन में कहां कैसे यात्रा हुई, पता नहीं। शाम सात बजे उनका फोन आया पर कोई आवाज नहीं थी। मैंने दो सिम बदल बदल कर बात करने की कोशिश की पर एक भी शब्द नहीं आया-गया। ह्वाट्सएप्प पर ऑडियो कॉल तो लगी नहीं। इण्टरनेट काफी कमजोर था। … सो पता नहीं चला कि प्रेमसागर कहां से बात कर रहे थे।

दस मई, 2022 को शाम सात बजे के पहले केदार दर्शन के बाद अपनी लाठी और रेनकोट के साथ प्रेमसागर

असल में वे केदारनाथ दर्शन कर चुके थे। उसके बाद मुझे फोन कर सूचित करने का प्रयास कर रहे थे। पर फोन लगा नहीं।

आज मैंने सवेरे पांच बजे उन्हें रिंग किया। वे सोनप्रयाग में थे। बताया – “भईया कल शाम दर्शन हो गये। बाहर आ कर आपको फोन किया था, पर बात नहीं हुई। प्रवीण भईया, सुधीर भईया को भी फोन किया था, पर फोन लगा नहीं। दर्शन के बाद वहां से लौट कर रात में ही आज दो बजे सोनप्रयाग पंहुचा। साथ में दस पंद्रह दर्शन कर लौटने वाले लोग थे। यहां सरदारों की ओर से लंगर चल रहा है। उसी में भोजन किया। फिर आपस में बातचीत होती रही। अब नींद से आंख भारी हो रही है। पर फाटा लौट कर वहां दिन भर सोऊंगा।”

रास्ते का एक दृश्य, प्रेमसागर का भेजा हुआ

गजब आदमी! कल दिन भर चलता रहा। चालीस किलोमीटर चल कर फाटा से केदारनाथ दर्शन किये। फिर लौट कर चालीस किमी पैदल चल कर वापस फाटा पंहुचेगा (अपडेट – साढ़े नौ बजे फाटा पंहुच गये प्रेमसागर फाटा में, जहां उन्होने लॉज में अपना सामान रखा हुआ है)! अस्सी किलोमीटर की पहाड़ की पैदल यात्रा तीस घण्टे में। उस बीच केदारनाथ के ‘वंस-इन-लाइफटाइम’ वाले दर्शन। प्रेमसागर ने अपनी क्षमता की असीमता का सशक्त सिगनेचर प्रस्तुत कर दिया! हर हर महादेव!

पिछले तीन दिन की तरतीबवार यात्रा कर विवरण तो अलग से, प्रेमसागर से और इनपुट्स लेने के बाद प्रस्तुत करूंगा; फिलहाल यह बता रहा हूं, कि द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा का इग्यारहवां ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न हो गया है। बारहवां ज्योतिर्लिंग – बाबा बैजनाथ धाम – तो प्रेमसागर का अपना ‘घर’ है। जहां वे 100 से अधिक बार कांवर यात्रा कर चुके हैं। कई बाद दण्ड – दण्डवत करते हुये भी – यात्रा की है वहां की। सो एक प्रकार से कहा जा सकता है कि अपना संकल्प प्रेमसागर ने केदार दर्शन कर पूरा कर लिया है! जय हो!

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अब प्रेमसागर को बदरीनाथ जाना है। वह पैदल यात्रा होगी या वाहन से – मुझे मालुम नहीं। उनके नियमानुसार तो अब वाहन से वह यात्रा कर सकते हैं – जितना उपलब्ध हो। उसके बाद वाराणसी वाहन के प्रयोग से आकर, वाराणसी से सुल्तानगंज-देवघर की कांवर यात्रा करनी होगी उन्हें। पर वह सब बाद के लिये।

फिलहाल तो यह सूचना कि, प्रेमसागर का केदार दर्शन सम्पन्न हुआ।

प्रेमसागर का भेजा केदारनाथ का दृष्य

जय बाबा केदारनाथ। हर हर महादेव!


कांवरयात्रा – गंगोत्री से रुद्रप्रयाग और आगे


पांच मई 2022 – गंगोत्री से बौरारी (नई टिहरी शहर)

चार मई को, पिछले दिन की गोमुख की बर्फबारी भरी यात्रा में भीगने के बाद, प्रेमसागर मौनिया बाबा के आश्रम में विश्राम किये। पांच मई को उन्हें चलना था रुद्रप्रयाग के लिये। रुद्रप्रयाग से गंगोत्री की पैदल यात्रा वे कर चुके थे; इसलिये वापसी की यात्रा वाहन के प्रयोग से की। आश्रम के बंधु लोग उन्हें 94 किमी कार में ले कर आये और फिर उन्होने बस पकड़ी। शाम के समय वे नई टिहरी – बौरारी पंहुचे। बस अड्डे के पास ही एक लॉज में रात्रि विश्राम किया। उनके साथ नासिक के दो लोग – भगवान मारुति लाटे और वामन टी राव गायकवाड़ भी थे। इन सज्जनों से उनकी मुलाकात गंगोत्री आश्रम में ही हुई थी; वैसे नासिक में त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन के दौरान प्रेमसागर जहां रुके थे, इन दोनो सज्जनों का गांव/डेरा ज्यादा दूर नहीं था। पर महादेव ने उन्हें मिलाया गंगोत्री में ही।

उनके साथ नासिक के दो लोग – भगवान मारुति लाटे (बांये) और वामन टी राव गायकवाड़ भी थे।

ये दोनो सज्जन भी जाने वाले हैं केदार, पर पैदल नहीं बस में बैठ कर। बौरारी तक का ही उनका साथ प्रेमसागर के साथ था। बौरारी के बाद प्रेमसागर अकेले कांवर पदयात्रा करने वाले हैं केदारनाथ की। उसके बाद प्रेमसागर बदरीनाथ भी जायेंगे। वह यात्रा भी पैदल होगी या वाहन का प्रयोग होगा, मैं अभी नहीं कह सकता। प्रेमसागर से उसके बारे में बात नहीं हुई है।

प्रेमसागर ने बताया कि उत्तराखण्ड में वे हरिद्वार पंहुचे थे। वहां से ऋषिकेश, नीलकण्ठ, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, चंबा, जमुनोत्री, घरासूपिण्ड और वहां से गंगोत्री पंहुचे थे। गंगोत्री में उनका मुझसे सम्पर्क पुनः हुआ था।

अब नई टेहरी से वे रुद्रप्रयाग बस से जायेंगे। आगे केदार की यात्रा कांवर पदयात्रा होगी।

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मैं गंगाजी की यात्रा के मार्ग को गूगल मैप पर ट्रेस करता हूं। गोमुख से भागीरथी निकल कर गंगोत्री होते हुये देवप्रयाग पंहुचती हैं। वहां उनमें अलकनंदा आ कर मिलती हैं। इनके मिलन से देवप्रयाग संगम के बाद उनका नाम गंगा हो जाता है।

इस संगम के पहले रुद्रप्रयाग में भी एक संगम है। वहां मंदाकिनी नदी अलकनंदा में आ कर मिलती हैं। और आगे रुद्रप्रयाग से देवप्रयाग तक उनका नाम अलकनंदा रहता है। प्रेमसागर मुझे देवप्रयाग के अलकनंदा और भागीरथी संगम के चित्र नहीं दे पाये। शायद उनके मोबाइल में से डिलीट हो गये हैं। प्रेमसागर अपने मोबाइल में सम्भवत: पहले की यात्रा के चित्र भी डिलीट कर चुके हैं। नागेश्वर तीर्थ तक के चित्र तो मेरे ब्लॉग पर मिल सकते हैंंउसके बाद त्र्यम्बकेश्वर, भीमाशंकर, गृश्नेश्वर, मल्लिकार्जुन, रामेश्वरम और फिर गंगोत्री तक के चित्र हैं या नहीं, कह नहीं सकता। प्रेमसागर ट्रेवल लाइट में यकीन करने वाले हैं। और उस सिद्धांत से चित्र भी निकल गये! :-)

बौरारी (नई टिहरी) में राणा होटल

बौरारी में वे राणा होटल में ठहरे। साथ में दोनो महाराष्ट्रीय सज्जन भी थे। वहां के चित्र उन्होने भेजे हैं।

प्रेम सागर बताते हैं कि दोनों मराठी सज्जन उनकी हिंदी समझते हैं और वैसी हिन्दी बोलते हैं जो समझ में आ जाती है। सम्प्रेषण की असुविधा उनके साथ नहीं हुई।

छ मई 2022 – बौरारी से रुद्रप्रयाग

सवेरे छ बजे प्रेमसागर ने सम्पर्क किया तो वे अंतरराज्यीय बस अड्डे पर बस पकड़ कर रुद्रप्रयाग के लिये रवाना हो गये थे। उन्होने बताया कि बारह बजे तक वे रुद्रप्रयाग पंहुचने वाले हैं। वहां से वे ‘आज ही के दिन आगे पांच किलोमीटर ही सही, थोड़ा तो पैदल चलेंगे ही’।

पर वह चलना अंतत: नहीं हो पाया। अगले दिन प्रेमसागर ने बताया कि मौसम खराब हो गया था। आंधी पानी आ गया था। इसलिये रुद्रप्रयाग में ही केदारनाथ-बदरीनाथ आश्रम धर्मशाला में वे रुक गये। यह धर्मशाला वाली जगह यूं ही राह चलते उन्हें दिख गयी थी – “बारिश हो रही थी। यह जगह दिखी तो पूछने पर रुकने के लिये जगह मिल गयी। किराया होटलों की अपेक्षा कम था और भोजन तो प्रबंधक साहब ने अपने घर से मंगवा कर करा दिया। पूरा आतिथ्य!”

सात मई 2022 – रुद्रप्रयाग से आगे

सवेरे साढ़े छ बजे प्रेमसागर अपनी “कांवर कस” रहे थे। कांवर टाइट करना भी कांवरिया-जीवन में मुहावरा हो जाता है। मुहिम पर चलने के पहले की तैयारी कांवर कसना या टाइट करना होती है। अकेले यात्रा करनी है उन्हें। “अकेले ही चलेंगे भईया। कोई रास्ते में मिल जाये तो मिल जाये। वर्ना महादेव तो हैं ही।” प्रेमसागर ने कहा।

मैंने उन्हे उत्तर दिया – “महादेव तो सतत आपके साथ हैं। तभी तो इतनी लम्बी यात्रा कर पाये हैं!”

“सो तो है भईया। पर इतनी लम्बी यात्रा में कभी कभी बीच में हिम्मत डोल जाती है। आप जैसे लोग ही सहारा देते हैं। वर्ना कभी कभी तो चाय के लिये भी पैसा नहीं रहता।”

“पर मैंने तो सोचा कि बहुत से लोग साथ होंगे। गुजरात के लोग साथ नहीं हैं। उनसे बात नहीं होती?”

“होती है, बराबर बात होती है। वे लोग तो बहुत सहायता किये। गौशाला और वृद्धाश्रम के लिये जमीन भी मुहैय्या करा रहे हैं। पर मेन बात है भईया कि मेरे स्वभाव में मुंह खोलना नहीं है। वे लोग अपेक्षा करते हैं कि मुंह खोल कर बोलें तो।”

लगता है मुंह खोलने की अपेक्षा और न खोलने की वृत्ति के बीच द्वन्द्व है। पहले जब प्रेमसागर एकाकी चल रहे थे तो उनके यूपीआई एड्रेस को मैं ब्लॉग पोस्ट में दिया करता था। पता नहीं कि उसकी आवश्यकता बनती है या नहीं? वैसे उनका यूपीआई एड्रेस है – prem12shiv@sbi

शाम तक प्रेमसागर करीब पच्चीस किमी चले। रास्ते में उन्होने रुद्रप्रयाग से निकलते ही मंदाकिनी और अलकनंदा संगम और अन्य स्थलों के चित्र भेजे। मंदाकिनी का जल हरा-नीला और अलकनंदा का श्वेत दीखता है।

रुद्रप्रयाग संगम पर मंदाकिनी (गाढ़ा रंग) और अलकनंदा का जल अलग अलग पता चलता है। चित्र मंदाकिनी की ओर से लिया गया है। प्रेमसागर मंदाकिनी किनारे यात्रा कर रहे हैं।

शाम का डेरा अगस्त्य मुनि लॉज में था। किंवदंति के अनुसार यहीं मंदाकिनी के तट पर अगस्त्य मुनि ने तपस्या की थी। अगस्त्य मुनि (कुम्भज ऋषि) को सामान्यत: दक्षिण भारत से जोड़ा जाता है जिन्होने समुद्र को सोख लिया था या विंध्याचल को और उन्नत होने से रोक दिया था। रामायण में अगस्त्य का आश्रम गोदावरी तट पर था। पर केदार के रास्ते में भी उनकी तपस्थली/गृह स्थान है, यह नई जानकारी थी मेरे लिये।

(अगस्त्य मुनि लॉज और अगस्त्य मुनि तपस्थली, मंदाकिनी के तीर पर।)

आगे का विवरण आने वाली पोस्टों में!

हर हर महादेव! जय केदारनाथ-बदरीनाथ!!!


प्रेमसागर – गंगोत्री से गोमुख और वापस


करीब सप्ताह भर से प्रेमसागर गंगोत्री में थे। एक दिन मुझे गंगोत्री के परिवेश और गंगा माता के मंदिर के लाइव वीडियो-दर्शन कराये थे। उसके बाद किन्ही मौनी बाबा के आश्रम में डेरा जमाये। इस सप्ताह भर में मैं मन बनाता रहा कि गंगोत्री से केदार की यात्रा का विवरण ब्लॉग पर डालूं। मैं लगभग पैसिव था – लिखने का अर्थ दिन में तीन चार घण्टे डिजिटल-यात्रा में लगाना ही पड़ता। लेकिन जब प्रेमसागर ने गंगोत्री से गोमुख की यात्रा के बारे में मुझे बताया और यात्रा के चित्र भेजे तो लिखने के बारे में निश्चय हो ही गया।

मई तीन, 2022 की गोमुख यात्रा

आज पांच मई है। तीन मई को प्रेमसागर जी ने गोमुख की यात्रा की। बीस किलोमीटर पहाड़ की यात्रा में गंगोत्री से जाना और गोमुख से जल ले कर गंगोत्री वापस लौटना – बहुत कठिन काम है। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी में दम फूलता है। पर प्रेमसागर वह कर गये। राजेंद्रग्राम से अमरकण्टक की चढ़ाई में प्रेमसागर ने कहा था कि अगर संकल्प न लिये होते तो वह चढ़ाई कभी चढ़ते नहीं। गंगोत्री-गोमुख की चढ़ाई, मेरे अनुमान से उससे ज्यादा दुरुह होगी। पर अमरकण्टक से अब तक प्रेमसागर की प्रकृति, साहस और आत्मविश्वास में बहुत कुछ बदला है। बहुत कुछ सार्थक बदलाव आया है।

प्रेमसागर ने भी बताया कि ऑक्सीजन की कमी महसूस हो रही थी। साथ में आठ नौ लोग थे। वन विभाग के लोग थे। उसके अलावा कलकत्ता के कुछ यूट्यूबर थे। वन कर्मी साथ थे तो रास्ते में असुविधा नहीं हुई। रास्ता उनका जाना पहचाना था। उन्होने कहा कि गोमुख जा कर एक ही दिन में लौट आना है। वे नहीं चाहते थे कि रास्ते में ओवरनाइट स्टे किया जाये। इसलिये जाने आने की दूरी एक दिन में तय की। अन्यथा लोग रास्ते में आठ किलोमीटर बाद चीड़वासा और भोजवासा में रात्रि विश्राम करते हैं। गोमुख में रात गुजारने की सुविधा नहीं है।

रास्ते में साइनबोर्ड

रास्ता दुरुह था। करीब दो फिट चौड़ा। उतना संकरा रास्ता पैदल ही पार करने के लिये ही उपयुक्त होता है। वही किया जा रहा था। एक ओर पहाड़ की चढ़ाई और दूसरी ओर 1000 फीट (कम से कम) का गह्वर, जिसमें भागीरथी बह रही थीं। दर्शनीय तो था ही पूरा इलाका। कई जगह वन विभाग के बने पुल से पार करना पड़ा।

“बन वाले हमको अकेले जाने की परमीशन नहीं दिये। बोले – बाबा लोग का भरोसा नहीं। क्या पता कौन बाबा किस गुफा में आसन जमा ले। एक बार बैठ जाने पर उस बाबा को वहां से निकालना मुश्किल होता है।” – प्रेमसागर ने बताया।

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“बर्फ का पहाड़ था गोमुख। ऊपर मिट्टी जमा था। बर्फ गर्मी में पिघलने से पानी निकल रहा था। रास्ते में कई जगह मिट्टी के धसकने की चेतावनी के बोर्ड लगे हुये थे। पूरे रास्ते भर बर्फ की बारिश होती रही। बर्फ के छोटे छोटे टुकड़े थे। उसके कारण मोबाइल से चित्र लेना मुश्किल था। जो फोटो खींचे भी वे नीले नीले आये हैं। बर्फ की बारिश ऐसी थी कि विण्डचीटर होने के बाद भी भीग गये। यात्रा लम्बी और बहुत कष्टदाई थी। रात नौ बजे वापस गंगोत्री पंहुचने पर मौनीबाबा के आश्रम वाले कहे कि एक दिन विश्राम कर परसों निकलियेगा रुद्रप्रयाग के लिये। वैसे कार्यक्रम चार मई को ही निकलने का था।” – प्रेमसागर तीन तारीख की रात गंगोत्री वापस आ कर चार को वहां रुके और पांच मई को सवेरे आठ बजे तक वाहन से रुद्रप्रयाग के लिये निकल लिये।

प्रेमसागर अपने गंगोत्री-गोमुख के सहयात्रियों के साथ

रुद्रप्रयाग से गंगोत्री की पद यात्रा वे कर ही चुके थे गंगोत्री जाने के समय। अब रुद्रप्रयाग से केदार की अस्सी किलोमीटर की यात्रा – जिसमें तीन-चार दिन लगेंगे छ मई को सवेरे प्रारम्भ होगी। जब तक केदारनाथ पंहुचेंगे, वहां मंदिर खुल चुका होगा।

केदार की यात्रा के लिये गोमुख से भागीरथी का जल उठाना महत्वपूर्ण कृत्य था, जो तीन मई को प्रेमसागर ने सम्पन्न कर लिया। अब देवप्रयाग से केदार और फिर बदरीनाथ की यात्रा करनी है उन्हें। केदार की यात्रा के बाद चार-पांच दिन लगेंगे बदरीनाथ की यात्रा में। अर्थात कुल दस दिन। … दस दिन का पहाड़ का डिजिटल भ्रमण मेरा भी होगा। प्रेमसागर का साथ बीच में टूट गया था, तो अभी अटपटा लग रहा है। सम्पट बैठने में दो तीन दिन लगेंगे! प्रेमसागर अपने संकल्प से बंधे हैं और मुझे पहाड़ की यात्रा आकर्षित कर रही है। दोनो के ध्येय अलग अलग हैं; पर परिणति ब्लॉग की पोस्टों में होगी। … यात्रा इसी का नाम है। अलग अलग ध्येय के लोग एक साथ जुड़ते हैं और कुछ दूर साथ साथ चलते हैं। कुछ साथ चलते हैं तो सुहृद हो जाते हैं।

प्रेमसागर का अपना जो भी नेटवर्क बना हो, मेरे लिये वे अब भी वही प्रेमसागर हैं जो विक्रमपुर के ओवरब्रिज के पास भादौं महीने में कांवर उठाये जा रहे थे। देखते हैं अगले दस दिन हम दोनों के सामुहिक डिजिटल जुड़ाव से क्या क्या निकलता है।

हर हर महादेव!


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