भोपाल, बारिश, वन और बातचीत


18 अक्तूबर 21, सवेरे –

कल सवेरे वन विभाग के रेस्ट हाउस परिसर की नर्सरी देख कर कई चित्र भेजे प्रेमसागर ने। उनका मूल ध्येय मुझे सूचना देना था। वन की वनस्पति, जीव जंतुओं और चिड़ियों के बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं। शायद वहां शहर या पर्यटक आते हों। उनकी जानकारी के लिये अच्छी बातें हैं होर्डिंग्स में। गौरय्या, मकड़ी, बया, सर्प दंश, शेर, दीमक … अनेकानेक जीवों की जानकारी है उनमें।

वन की वनस्पति, जीव जंतुओं और चिड़ियों के बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं।

प्रेमसागर का समय धर्म और उसके इर्दगिर्द की जानकारी में ज्यादा लगता है। वे कल मंदिरों के दर्शन की बात कर रहे थे। कुछ मंदिरों के नाम भी लिये, जो आसपास हैं। मुझे उनके बारे में याद नहीं है चूंकि मेरी वासना उस ओर नहीं है। जाने कब भवसागर से विरक्ति का भाव मुझमें आयेगा और यह ब्लॉग-श्लॉग छोड़ कर मैं जप-ध्यान-मनन और मंदिरों के चक्कर में अपना समय देने लगूंगा। फिलहाल मेरे लिये ईश्वर सरलता से जीने और ईश्वरीय सौंदर्य – जो आसपास दिखता है – को अभिव्यक्त करना मुझे ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

प्रेमसागर मंदिरों के दर्शन को जा नहीं पाये। दिन भर बारिश होती रही। बारिश थी और रविवार का दिन; सो लॉजिस्टिक की भी समस्या रही। वाहन तो बहुत से खड़े थे, पर उन्हें चलाने वाले ड्राइवर लोग नहीं आ पाये थे। दिन भर कहीं निकले नहीं। “अब वापसी में भोपाल आऊंगा, तब देखूंगा मंदिरों को।” मैं यह कथन समझ नहीं पाता। प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग पद यात्रा तो फारवर्ड यात्रा है। एक से दूसरे ज्योतिर्लिंग को छूने की। उसमें यह वापस आने की बाद कैसे फिट होती है। खैर, अपनी बात वे जानें। फिलहाल उन्हें भोपाल से उज्जैन को निकलना है। कल तो कोई मूवमेण्ट नहीं हुआ। उन्होने अपनी लोकेशन शेयर करने का जो लिंक दिया था, वह एक ही स्थान बताता रहा।

आज सवेरे चार बजे से ही प्रेमसागर तैयार बैठे हैं पर बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही। आष्टा पंहुचने का तय हुआ था। प्रेमसागर के हिसाब से वह 50-55 किलोमीटर है। मेरे पास गूगल मैप की जानकारी के अनुसार वह 87 किलोमीटर दूर है। बीच में कोई रुकने का स्थान बन नहीं पाया। और आज आठ बजे तक तो निकल भी नहीं सके। आष्टा तक पंहुचना सम्भव ही नहीं लगता, चाहे वे सड़क छोड़ कर एक सीधी लकीर खींच कर भी वन विभाग के रेस्ट हाउस से वहां जाने की सोचें।

“अब तक कभी कितना अधिकतम चले हैं एक दिन में?”

प्रेमसागर का ऐसी बात का उत्तर ‘मोटा-मोटी’ से शुरू होता है। उनके कुछ तकिया कलाम हैं। मोटा-मोटी के अलावा जो बहुत ज्यादा प्रयोग होता है, वह है – “फिर-जो”। यह फिर-जो इतना घिस गया है कि वह ‘फिन-जे’ या ‘फिंजे’ सुनाई पड़ता है। कोई व्यक्ति अपने तकिया कलाम के बारे में कभी सजग नहीं होता। अगर हो जाये तो वह तकिया कलाम बन ही न पाये। मेरे नाना जी का तकिया कलाम था – जौन बाटई, तौन बाटई (जोहै सो है)। और वे हर वाक्य के अदि-मध्य-अंत में इतना जौन बाटई, तौन बाटई बोलते थे कि सुनने वाला मूल कथ्य भूल ही जाता था। :lol:

प्रेमसागर ने उत्तर दिया – “मोटा-मोटी, फिर-जो, पैंसठ किलोमीटर मान सकते हैं। सुबह जल्दी सुल्तानगंज से जल ले कर निकलते थे और दिन भर में इतना चल लेते थे।”

पैसठ किलोमीटर! गजब!

मैंने बिल ब्रायसन की पुस्तक “अ वाक इन द वुड्स” को पढ़ना-सुनना शुरू किया है।

प्रवीण पाण्डेय के द्वारा एपलेचियन ट्रेल की पदयात्रा के बारे में एक लिंक देने पर मैंने बिल ब्रायसन की पुस्तक “अ वाक इन द वुड्स” को पढ़ना-सुनना शुरू किया है। उसमें बिल ब्रायसन एक दिन में 12 मील चल रहे हैं और जिस दिन 14 मील हो गया उस दिन वह बड़ा अचीवमेण्ट हो गया! और यहां प्रेमसागर आये दिन पचास किलोमीटर तो धांस ही देते हैं। पचास किलोमीटर यानी 30-32 मील! ग्रेट हो प्रेमसागर जी! और अब तक पौने आठसौ मील चल लिये हैं इस पदयात्रा में!

अपने सेण्डिल के बारे में प्रेमसागर का कहना है – “भईया, सेण्डिल भी सोचता होगा कि दुकानदार ने किस आदमी को मुझे थमा दिया। चैन लेने ही नहीं देता। महीने भर में में ही घिस गया है। जल्दी ही बदलना पड़ेगा।” वह तो गनीमत है कि प्रेमसागर का सेण्डल सस्ता वाला है – तीन-चार सौ का। किसी रीबॉक या आदिदास का खरीदे होते तो बारम्बार खरीदने में उन्हें लोगों से पैसे की अपील करनी पड़ती।

वैसे, बाई-द-वे, यह पढ़ने वाले प्रेमसागर जी की जरूरतों के लिये कुछ न कुछ दे सकते हैं। उनकी सहायता तो की जानी चाहिये। एक फोन पे का अकाउण्ट है उनका, जिसमें डिजिटली भेजा जा सकता है। प्रेमसागर खुद तो किसी से आगे बढ़ कर मांगने की बात करते नहीं। पर उनकी मितव्ययता के बावजूद, जरूरतें तो हैं ही।

कल एसडीओ साहब – तरुण कौरव जी आये थे उनके पास। वे बड़े सज्जन व्यक्ति हैं। प्रवीण दुबे जी ने उन्हे जब प्रेमसागार की सहायता के लिये कहा तो वे कई दिन से प्रेमसागर की यात्रा ट्रैक कर रहे थे। अनेकानेक बार उन्हें फोन किया होगा। लगता है प्रवीण दुबे के साथ प्रगाढ़ता होगी उनकी। प्रेमसागर ने बताया कि उनकी बिटिया पढ़ाई पूरी कर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही है। शुभकामनायें।

एसडीओ साहब – तरुण कौरव जी

प्रेमसागर ने अग्निहोत्री जी का भी चित्र भेजा है। अग्निहोत्री जी इस रेस्ट हाउस की देखभाल करते हैं। प्रेमसागर को परिसर भी उन्होने ही दिखाया। यात्रा के दौरान अग्निहोत्री जी की तरह अनेकानेक भले लोगों ने अपना योगदान दिया है और आगे भी बहुत से लोग मिलेंगे। जब तक मैं यह यात्रा विवरण लिख रहा हूं, तब तक उनके बारे में लिखने और उनके चित्र ब्लॉग पर देने की आदत रहेगी। … वैसे यात्रा विवरण दो ही स्थितियों में बंद हो सकता है – एक, प्रेमसागर उदासीन हो जायें इनपुट्स देने में। और दो, वे सरल पदयात्री से हट कर शोहरत और सेलिब्रिटी बनने में रुचि लेने लगें – तब मैं उदासीन हो जाऊंगा उनके बारे में। अभी दोनो ही बातें नहीं हैं।

अग्निहोत्री जी

प्रेमसागर मुझे बताते हैं – “लोग मिलते हैं और बहुत असमंजस में डालते हैं। कहते हैं कि उनके घर में ये परेशानी है, ये बीमार है, यह कष्ट है। वे मांगते हैं कोई भभूत, कोई प्रसाद, कोई तावीज। मैं बताता हूं कि मैं उस तरह का बाबा या सिद्ध नहीं हूं। पर वे मानते नहीं। उनसे पीछा छुड़ाने के लिये कभी कभी कोई सेब, कोई केला या छुहारा जैसा कुछ देना पड़ता है। रास्ते चलते लोगों को डांटा या झगड़ा नहीं किया जा सकता। समझा-बुझा कर अपना रास्ता निकालना पड़ता है।”

“एक बार तो – जबलपुर के पहले रास्ते में एक आदमी बोले अपना सब सामान छोड़ कर आगे जाओ। मैंने उनसे कहा – जी, यह सब आपका ही है। आपके लिये ही ले कर चल रहा था मैं। अब तक मेरा था, अब आपका है। … पर जाने क्यों उस व्यक्ति ने मुझे जाने दिया। सो ऐसे लोग भी मिलते हैं। शायद महादेव ही परीक्षा ले रहे हों कि अपने सामान में मेरी कितनी आसक्ति, कितना मोह है।”

दस बज गये हैं। प्रेमसागर का लोकेशन कुछ हिला बताता है। लोकेशन अभी भोपाल में ही है, पर चलता प्रतीत होता है उनका चिन्ह। शाम को पता करूंगा कि वे अभी भी भोपाल में ही हैं या किसी अगले मुकाम पर। अब निकल कर आष्टा तक जाना तो सम्भव नहीं होगा। शायद रास्ते में कोई ठिकाना तलाशें। सवेरे बता रहे थे – “कोई नीरज जी फोन कर रहे हैं। यू-ट्यूब से जुड़े हैं। यहां से पचीस किलोमीटर दूर। वे अपने यहां रुकने के लिये कह रहे हैं।” सो क्या पता, नीरज जी के यहां तक पंहुच पायें। यात्रा पर निकलने के बाद अगला मुकाम अपने हाथ में कम, मौसम, रास्ते और संयोग पर ज्यादा निर्भर करता है। आज देखते हैं क्या होता है! :-)

हर हर महादेव!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

भोजेश्वर मंदिर और भोपाल


16 अक्तूबर 21, रात्रि –

भोजेश्वर मंदिर के चित्र देख कर मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की “बाण भट्ट की आत्मकथा” याद हो आती है। उन्होने परिचय कराया बाणभट्ट से। उनकी रचना कादम्बरी अपूर्ण है जो शायद उनके पुत्र भूषणभट्ट ने पूरी की। उसी की तर्ज पर हजारीप्रसाद जी ने बाणभट्ट की आत्मकथा भी इस प्रकार लिखी है जो अभूतपूर्व तो है; पर बकौल उनके (छद्मनाम ? व्योमकेश शास्त्री) है अपूर्ण ही।

उत्कृष्टता और अपूर्णता बाणभट्ट के साथ जुड़ी है। उनकी उत्कृष्टता लेखन में है। भोजेश्वर मंदिर की उत्कृष्टता और अपूर्णता स्थापत्य में है। कादम्बरी के लिये तो भूषणभट्ट मिल गये। वे नहीं होते तो शायद आधुनिक युग में आचार्य हजारी प्रसाद जैसे व्यक्ति मिल जाते कदम्बरी को पूरा करने के लिये। भोजेश्वर मंदिर के लिये कोई ‘भूषणराज’ नहीं मिले। वह मंदिर, जिसकी इतनी प्रतिष्ठा है, इतनी मान्यता कि इसे मध्यप्रदेश का सोमनाथ कहा जाता है; अब भी बिना कगूरे के, बिना गुम्बद के है।

भोजेश्वर मंदिर, भोजपुर। मंदिर अधूरा बना है। By Bernard Gagnon – Own work, CC BY-SA 3.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=33820444

भोजेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के पास है। उनकी पॉलिसी में शायद मंदिर के पूर्ण-निर्माण की बात न हो, मात्र विरासत के रखरखाव की ही जिम्मेदारी हो। पर व्यापक हिंदू समाज का यह दायित्व नहीं बनता कि मंदिर पूरी तरह बने जैसा भोजराज बनवाना चाहते थे। कहा जाता है कि इस मंदिर के और परिसर में और भी जो कुछ बनना था, उसके नक्शे पत्थर में उकेरे गये हैं और वे 11वीं सदी के ही हैं। कुछ प्रस्तरखण्ड भी तराशे हुये पड़े हैं – प्रतीक्षा करते कि उनका प्रयोग होगा। मंदिर के पूर्णनिर्माण के लिये पत्थर भी कहीं और से नहीं लाने हैं। वह धरती ही पत्थरों से भरी पड़ी है।

“मध्य भारत के सोमनाथ” का पूर्णनिर्माण होना चाहिये; नहीं? बिना गुम्बद के मंदिर जंचता नहीं। कम से कम मुझे तो वह अपूर्ण लगता है।

प्रेमसागर जी ने उस मंदिर के 21 फिट ऊंचे और 18फिट 8 इंच परिधि के विशालकाय शिवलिंग के चित्र भेजे हैं पर उनकी कैमरे की सेटिंग के कारण पूरी भव्यता से दृश्य नहीं आ पाया। गूगल मैप पर यह चित्र जिसे शुभम नागर जी ने खींचा है शिवलिंग की विशालता और भव्यता को अच्छे से दर्शाता है –

भोजेश्वर मंदिर का विशाल शिवलिंग।

प्रेमसागर जी ने बताया कि यह शिवलिंग पीतल का बना है। जितनी बार मैं इस शिवलिंग को (चित्र में) देखता हूं, मंत्रमुग्ध सा रह जाता हूं। प्रेमसागर ने भी बताया कि वहां शिवलिंग के पास कुछ देर ध्यान लगाने में उन्हें जो अनुभूति हुई, वैसी पहले कभी बाबा धाम में भी नहीं हुई थी। बाबा धाम (देवघर) वे सौ से अधिक बार कांवर ले कर जल चढ़ाने जा चुके हैं। प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में मेरा डिजिटल साथ बना रहा तो सभी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन होंगे। पर भोजेश्वर मंदिर का यह दर्शन भूला नहीं जा सकता।

प्रेमसागर आज सवेरे सात बजे वहां मंदिर पंहुच गये थे। उनके साथ मंदिर के महंत पवन गोस्वामी जी और उनके दो पुत्रों के चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने।

बांये और दांये पवन गोस्वामी जी के पुत्र और बीच में पवन गोस्वामी (बांये) के साथ प्रेमसागर। नेपथ्य में भोजेश्वर शिवलिंग है।

महंत जी के बारे में प्रेमसागर बताते हैं कि बहुत सरल और मिलनसार व्यक्ति हैं। उनकी अगवानी के लिये कल रास्ते में वे खड़े थे; यह प्रमाण है उनकी सरलता का।

इग्यारह बजे के बाद ही प्रेमसागार भोजेश्वर मंदिर से भोपाल के लिये रवाना हुये। भोजपुर बेतवा के किनारे है। वहां जाना नहीं हुआ। एक सज्जन ने कल ट्विटर पर टिप्पणी की थी कि पास में भीमबेटका है, प्रेमसागर जी को वहां भी हो आना चाहिये।

पर प्रेमसागर बतौर टूरिस्ट नहीं निकले हैं। वे तो कांवर ले कर सिर झुका कर जप करते हुये चला करते थे। बिना आसपास देखे। यह तो बदलाव उन्होने किया है कि यात्रा मार्ग में दृश्य और सौंदर्य में “कंकर में शंकर” के दर्शन करने का। वह बदलाव ही बहुत बड़ा बदलाव है। उनसे अपेक्षा करना कि वे अपनी यात्रा से डी-टूर हो कर आसपास के स्थान देखने के लिये घुमक्कड़ी करेंगे, उनकी कांवर यात्रा का मूल ध्येय ही खतम करना होगा। वे पर्यटक नहीं हैं, वे कांवरधारी तीर्थयात्री हैं। उस मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिये।

रास्ते में एक सज्जन – महेंद्र जी मिले। वे प्रेमसागर का बैग उठा कर साथ साथ चले।

भोजपुर में एक सज्जन – महेंद्र जी मिले। वे प्रेमसागर का बैग उठा कर साथ साथ चले। इस प्रकार कांवर यात्रा में उन्होने प्रेमसागर का कुछ भार कम कर सहयोग दिया। प्रेमसागर ने टिप्पणी की – लोग आगे ज्यादा से ज्यादा मेरे बारे में जानने की उत्सुकता दिखाने वाले मिल रहे हैं। वे किसी न किसी तरह से सहायता करने की कोशिश करते हैं।

भोजपुर से भोपाल के रास्ते में उन्हें नदियां मिलीं। वे बेतवा की ट्रिब्यूटरी होंगी। एक नदी – कलियासोत तो नक्शे में दिखती है। वे नदियां भोपाल के तालों से निकली होंगी। मन्दिरों-मूर्तियों के चित्र लेने का तो स्वभाव प्रेमसागर में पहले से था। अब वे नदियों, पुलों और रास्तों, वनों, खेतों, पहाड़ियों, घाटियों और झरनों के चित्र लेने के बारे में अधिकाधिक सजग और सहज हो रहे हैं।

भोजपुर-भोपाल के रास्ते का स्लाइड शो।

कल भोपाल में समय व्यतीत करेंगे प्रेमसागर। परसों रवाना होंगे उज्जैन के लिये।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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भोजपुर पंहुचे प्रेमसागर


15 अक्तूबर 21, रात्रि –

भोजपुर करीब छ किलोमीटर दूर था, तभी प्रेमसागर का फोन आया। बोले कि गौहरगंज में भोजपुर के भोजेश्वर मंदिर के महन्त जी मिले थे। बोल रहे थे कि भोजपुर के पास एक किलोमीटर पहले ही उनकी अगवानी करेंगे। बड़ी मान सम्मान की बात है प्रेमसागर के लिये। ऐसे में वे खुश थे, और रास्ते में चलते चलते मुझसे बात कर यह सूचना दे रहे थे। जब व्यक्ति कुछ पा लेता है तो विनयवत हो जाता है। प्रेमसागर वही विनय अभिव्यक्त कर रहे थे – “भईया, आपकी, भाभी (मेरी पत्नी) जी की और प्रवीण भईया की कृपा से हम चल रहे हैं। आज शाम मंदिर के दर्शन करेंगे। रात में पास ही की दिगम्बर जैन धर्मशाला में रुकने की व्यवस्था है। सवेरे एक बार फिर महादेव जी के दर्शन कर, जल चढ़ा कर भोपाल के लिये निकल लेंगे।” चलते चलते बात करते जा रहे थे प्रेमसागर। शायद ईयरफोन लगाये थे तो हाथ फोन से खाली थे। कांवर ले कर चलना और बात करना एक साथ हो पा रहा था।

भोजपुर करीब छ किलोमीटर दूर था, तभी प्रेमसागर का फोन आया।

पास ही बैठी मेरी पत्नी जी ने सुना तो अपने अंदाज में टिप्पणी की – “वाह! खीर, रसमलाई, पकवान खुद चाभ रहा है और कहता है कि आशीर्वाद हमारा है!” फिर कुछ सोच कर बोला – “पर यह लिख मत देना। मेरी ईमेज ही बिगाड़ दिये हो ब्लॉग पर।” … अंदाज वही है जो भाभियां अपने देवर या भाई को उलाहना देते, मजाक करते और मजाक मजाक में प्रशंसा करते दिखाती हैं। इकसठ साल की हो गयीं रीता पांड़े। प्रेमसागर उनके सबसे छोटे भाई के हम-उम्र होंगे। बचपन में सबसे छोटा भाई सबसे ज्यादा मार खाया है और सबसे ज्यादा स्नेह भी उसी पर है। प्रेमसागर से एक दिन ही मिली हैं वे, पर दिनो दिन उन्ही की चर्चा होती है तो छोटे भाई जैसा दर्जा हो गया है उनका।

प्रेमसागर बता रहे थे – “आज तो दिन भर फोन का नेटवर्क ही नहीं था। गौहरगंज के आसपास लगा। तभी मैंने आपको लोकेशन शेयर किया। गौहरगंज में जय प्रकाश त्रिपाठी जी मिले थे सड़क पर ही। वे वकील हैं। उनको खबर वन विभाग के राहेश नामदेव जी, एसडीओ साहब किये थे। त्रिपाठी जी ने खूब सत्कार किया। वहीं उनके ऑफिस में दो घण्टा मैंने आराम किया। मैंं फोटो भेजूंगा। बहुत से लोग थे सेवा करने वाले। कोई पैर दबा रहा था, कोई कुछ और सेवा कर रहा था।”

बहुत से लोग थे सेवा करने वाले। कोई पैर दबा रहा था, कोई कुछ और सेवा कर रहा था।”

“उसके पहले जब बिनेका से चला तो छ किलोमीटर बाद ठाकरी गांव में राजेश नामदेव जी, एसडीओ साहब के दो भाई, पिताजी, उनकी पत्नीजी और बाकी लोग सड़क पर मेरा इंतजार करते मिले। नामदेव जी भोपाल में हैं पर उनका घर यहां है। वे लोग मुझे घर ले गये। फलाहार, चाय आदि कराये। टीका-चंदन से सत्कार किया और नारियल दे कर विदाई की।”

नामदेव जी के घर सत्कार, जय प्रकाश जी के दफ्तर में लोगों द्वारा सेवा और भोजेश्वर मंदिर के महंत जी से मुलाकात – यह सब उपलब्धि ही है। महादेव का कठिन पदयात्रा के दौरान उत्साह बढ़ाने को दिया प्रोत्साहन। चले चलो प्रेमसागर! हर हर महादेव का जयकारा लगाते चले चलो!

रात में जैन धर्मशाला के भोजनालय में भोजन कराया गया प्रेमसागर को।

भोजपुर पंहुचते पंहुचते प्रेमसागर के हुये सत्कारोत्सवों ने मुझे सतर्क कर दिया। मैंने उनके बातचीत की टोन में ‘नारदीय अहंकार’ की तनिक भी गंध सूंघने की कोशिश की। दिखी नहीं। सत्कारोत्सव मुझे असहज करते हैं। प्रेमसागर को ले कर मेरे मन में कोई ईर्ष्या नहीं है, एक सद्भावना है कि कहीं बंदे का विकेट डाउन करने के लिये अहंकार कोई गुगली न फैंक दे जिसे ये खेल न पाये। फिलहाल प्रेमसागार सतर्क खिलाड़ी लग रहे हैं। सतर्क और सहज-सरल।

भोजपुर की तरफ पदयात्रा मुड़ने के साथ साथ यात्रा का नर्मदा – परिक्रमा मार्ग वाला चरित्र पीछे छूट रहा है। भोपाल तालों का शहर है। उसके बाद मालवा का पठार है। वहां जो नदियां हैं वे नर्मदा की ओर नहीं, उत्तर की ओर बहने वाली हैं। गम्भीर, चम्बल, काली सिंध, पार्वती – कुछ नाम मुझे याद आते हैं। देवास में नर्मदा का जल लिफ्ट कर लाया जाता था/है। उज्जैन में भी सिंहस्थ कुम्भ के दौरान नर्मदा का जल ला कर क्षिप्रा में डाले बिना काम नहीं चलता था। मालवा के पठार की नदियां उतनी स्वस्थ भी नहीं होंगी और उनका वह बड़ा जाल भी नहीं होगा जो गाडरवारा के दांये बांये दिखता था।

जैसा और जितना प्राचीन काशी है, उतना ही उज्जैन है। धार्मिक रूप से भी और सांस्कृतिक रूप से भी। जितना महत्व बाबा विश्वनाथ का है, उतना ही महाकाल का। मालवा प्रेमसागर को आकर्षित करे, न करे; मुझे जरूर उस क्षेत्र का यात्रा वृत्तांत लिखने का चाव है। देखें आगे क्या होता है!

“नर्मदे हर” से स्वागत करने वाले लोग कम होंगे पर यहां दूसरे प्रकार से सत्कार अभिवादन करने वाले होंगे। जमीन भी अलग होगी, खेती भी अलग होगी। शायद सोयाबीन के खेत मिलें। किसान ज्यादा प्रयोगधर्मी होंगे और ज्यादा सम्पन्न भी। पठार का चरित्र पहाड़ और घाटी से अलग होता है। वह परिवर्तन प्रेमसागर कितना देखते हैं – यह ऑब्जर्व करना रोचक होगा। … फिलहाल दो दिन तो भोजपुर-भोपाल की चर्चा होगी। कल देखेंगे कैसा लगता है भोजपुर का साढ़े अठारह फुट का शिवलिंग और कैसे होते हैं भोजेश्वर मंदिर के महंत जी!


बिनेका से सवेरे सवा सात बजे रवाना हुये प्रेमसागर। बिनेका के आसपास का दृश्य मनमोहक था। बहता जल, हरियाली और उनपर सवेरे की पड़ती सूरज की किरणें। चित्र भेजे उन्होने। बड़े अच्छे आये हैं।

उसके बाद नेटवर्क काम करना बंद कर दिया। फिर शाम पांच बजे ही उनसे सम्पर्क हुआ। तब प्रेमसागर भोजपुर से छ किलोमीटर की दूरी पर थे। शाम के समय जो कहा, उससे यही लगा कि आज की यात्रा आनंददायक रही। अधिकांश समय वे हाईवे पर नहीं थे। सड़क शायद उतनी अच्छी न रही हो। पर प्रेमसागर का मत है कि छोटी सड़क पदयात्री के हिसाब से बेहतर होती है। टेरेन नक्शे के हिसाब से समतल था – सो घाटी-पहाड़ नहीं मिले होंगे। जो हैं वे भोजपुर में हैं। पहाड़ी इलाके के बगल से निकल जाता है रास्ता जिसपर आज प्रेमसागर चल कर आये।

आज रात में तो भोजेश्वर मंदिर वाले लोग होंगे। कल सवेरे ही बात होगी प्रेमसागर के साथ। आज की बात यहीं तक!

हर हर महादेव!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
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