#नर्मदायात्रा: हर रात नर्मदा की गोद में 60,000 परिक्रमावासी!


एक समय में कितने परकम्मावासी होते होंगे? नर्मदा की पूरी परिक्रमा 2600+ किलोमीटर की है। औसत एक किलोमीटर पर कितने यात्री होंगे?

यह जानने के लिये मैने प्रेमसागर से पूछा कि भरूच से महेश्वर के बीच उन्होने कितने परिक्रमा करते लोगों को देखा। उससे अंदाज लगे कि कितने लोग चल रहे हैं। यह चलने का मौसम नहीं है। ऑफ-सीजन है परिक्रमा वासियों के लिये। गर्मी ज्यादा है और बरसात का मौसम भी आने को है। लोग कम ही होंगे। प्रेमसागर ने बताया – पचास या फिर सौ आदमी भर दिखे।

पर, प्रेमसागर तो यात्रा की लय में बह रहे हैं। लय में बहता/चलता आदमी आकलन नहीं कर सकता कि कुल कितने लोग होंगे। एक जगह बैठा आदमी ही देख सकता है। यह जानने के लिये मुझे तहसील मंडलेश्वर के धारगांव (जिला माहेश्वर) में मिले राहुल सिंह मंडलोई। राहुल जी का स्टेट हाईवे के किनारे सांवरिया सेठ होटल है। सारे परिक्रमावासी वहीं से हो कर जाते हैं। उन्होने बताया कि इस ऑफ सीजन में 150-200 लोग प्रति दिन उनके सामने से परिक्रमा करते गुजरते हैं। यह संख्या सीजन में 500 से ज्यादा हो जाती है।

इस तरह मोटे अनुमान से नित्य 300 पदयात्री सामने से गुजरते होंगे। और परिक्रमा पूरी होने में 6-7 महीने लग जाते हैं।

राहुल सिंंह मंडलोई

तीन सौ परिक्रमावासी प्रति दिन और लगभग 200 दिन में यात्रा पूरी होने के आंकड़े से किसी एक समय पर 60,0000 परिक्रमावासी का अंक बनता है। साठ हजार लोगों के लिये रोज रात में रुकने की और भोजन की व्यवस्था आसान काम नहीं है। नर्मदा माई के प्रति श्रद्धा ही वह करा रही है।

राहुल जी ने बताया कि उनके गांव के आसपास ही दो आश्रम हैं – नागेश्वर आश्रम और नर्मदा आश्रम। दोनो से लगभग 40-50 परिवार जुड़े हैं। ये परिवार बना बनाया भोजन या फिर अन्न उपलब्ध कराते हैं आश्रम को। परिक्रमावासी इन लोगों के सहयोग से विश्राम और भोजन पाते हैं। इसी तरह के आश्रम नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर बहुत से हैं। कुछ आश्रम ऐसे भी हैं जिनको बाहरी सेठ लोग फंडिंग करते हैं। वे आश्रम रजिस्टर रखने हैं जिनमें परिक्रमावासी का नाम पता दर्ज होता है। इसके अलावा रुकने वाले परिक्रमावासियों के चित्र खींच कर वे सेठ के पास भेजते हैं और उसके हिसाब से फंड आश्रम को आता है।

कुछ लोग व्यक्तिगत आधार पर भी सेवा कार्य करते हैं। माहेश्वर में प्रेमसागर को अनिल वाधवानी जी ने अपने घर के ऊपर के एक कमरे में ठहराया और उनके भोजन का भी प्रबंध किया। अब तक की प्रेमसागर की यात्रा में कई स्थानों पर उन्हें लोगों के व्यक्तिगत आतिथ्य का लाभ मिला है।

$ मांडू के रास्ते में प्रेमसागर जी को शंकरलाल राठौड़ जी मिले थे। उन्होने बताया कि वे गरीब हैं, एक चाय की दुकान खोलना चाहते हैं। उनके पास नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर ही जमीन है जहां वे यह दुकान खोल सकते हैं। पर अपनी निर्धनता के कारण परिक्रमावासियों को फ्री सेवा नहीं दे सकते।

“तब आप कुछ ऐसा करिये कि दस में से दो आदमियों से चाय का पैसा न लीजिये, बाकी से लीजिये। उससे आपका काम भी चलेगा और नर्मदामाई की सेवा भी हो जायेगी।” – प्रेमसागर का यह सुझाव श्रद्धा और आर्थिक व्यवहार में तालमेल वाला था, पर शंकरलाल जी ने इसे खारिज कर दिया – “बाबाजी, मईया की गोद में रहते हुये परिक्रमावासी से पैसा कैसे ले सकता हूं? मर जाऊं, पर इस तरह पैसे नहीं लूंगा।”

श्रद्धाभाव शंकरलाल जी की आजीविका योजना में आड़े आ रहा है। यहां लोग अपनी विपन्नता के बावजूद परिक्रमावासियों के लिये आतिथ्य में जुटे हैं। ऐसा और कहां होता होगा?

प्रेमसागर को एक सज्जन अलग प्रकार के भी मिले। वे परिक्रमा कर रहे हैं। कोई सेठ उन्हें प्रति दिन 1500रुपये उनके नाम से परिक्रमा करने को देते हैं। उसमें से 1000रुपये उनका परिक्रमा में चलने का मेहनताना है और 500रुपया रोज की खुराकी है। पर वे सज्जन ये दोनो ही मद में लगभग पूरा पैसा बचा ले जाते हैं।

उन सज्जन ने बताया कि साल में वे तीन परिक्रमायें कर लेते हैं। नर्मदा परिक्रमा ही उनकी आजीविका है। जहां कहीं भी वे आश्रम में रुकते हैं, वहां अपनी डायरी में आश्रम वालों से हस्ताक्षर करवा लेते हैं। बहुत से आश्रमों की रबर स्टैम्प है; वह भी डायरी पर लगवा लेते हैं। हस्ताक्षर और रबर स्टैम्प वीज़ा की तरह काम करते हैं। इस सूचना के आधार पर प्रायोजक सेठ उन्हें मेहनताना-खुराकी भेजते हैं। अब शायद मोबाइल से पेमेंट मिल जाता हो उन प्रायोजित परिक्रमावासी को।

पर इस तरह की प्रायोजित परिक्रमा की राहुल मंडलोई जी को कोई जानकारी नहीं है। उनका कहना है कि ऐसे लोग होते भी होंगे तो सौ दो सौ में 1-2 मात्र। राहुल जी की बात सही भी जान पड़ती है। अगर परिक्रमा की श्रद्धा में प्रायोजन घुस जायेगा तो नर्मदा परिक्रमा अपना स्वरूप ही खो बैठेगी।

लेकिन यह भी है – लोग अपने घरों में पांच सात पंडितों को प्रायोजित कर महामृत्युंजय या लक्ष-चंडी जाप कराते हैं। वे खुद तो करते नहीं। उसी तरह से परिक्रमा भी प्रायोजित हो सकती है। महामृत्युंजय या लक्षचडी जाप के प्रॉक्सी अनुष्ठान को समाज मान्यता देता है। वह परिक्रमा के साथ भी हो सकता है! नहीं?

प्रेमसागर परिक्रमा कर रहे हैं। और परिक्रमा के मार्ग पर धर्म तथा अर्थ की यह जुगलबंदी उन्हें खूब कुरेदने पर मुझे मिली है। आगे परिक्रमा के अन्य रंग भी पता चलेंगे। मेरा काम वह सब देखना-लिखना है। मेरी मन यात्रा वैसी ही होगी। कभी प्रेमसागर की पदयात्रा को क्रमवार बतायेगी और कभी अपनी ही पटरी पर चलेगी। ज्यादातर अपनी ही पटरी पर चलेगी!

नर्मदे हर! जै माई की

नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक


बोधवाड़ा-बाकानेर-मांडू


नर्मदा पदयात्रा और मनयात्रा: बोधवाड़ा से माहेश्वर तक, मांडू के मोड़ से

प्रेमसागर, नर्मदा पदयात्री की तीन दिन की यात्रा इस प्रकार हुई –

  • 28 मई – मालवाड़ा-बोधवाड़ा से 30 किलोमीटर चल बाकानेर के हनुमान मंदिर में।
  • 29 मई – बाकानेर से 25 किलोमीटर चल कर बाड़ा छतरी के नर्मदा माता आश्रम तक।
  • 30 मई – बाड़ा छतरी से मांडू और वहां का भ्रमण। रात में हीरापुर के शबरी आश्रम में विश्राम। यात्रा करीब 30 किलोमीटर।
हीरापुर के शबरी आश्रम में

नक्शे के अनुसार तीरे तीरे चलें तो जगहें पड़ेंगी गोगवा, धर्मपुरी, खलघात, जल्कोती और माहेश्वर। मैने प्रेमसागर से कहा कि वे सीधे नर्मदा किनारे क्यों नहीं चले? समय भी कम लगता और नर्मदा का सानिध्य भी रहता।

पर सवाल शायद प्रेमसागर के मन में उठी यायावरी की हुड़क का नहीं था। परिक्रमावासी वाया माण्डव ही चलते हैं। मुझे याद आया ढ़ाई दशक पहले की मेरी मांडू यात्रा। तब मैने वहां नीलकंठ मंदिर पर परिक्रमा वासियों को देखा था। उस समय तक वेगड़ जी की ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ से मेरा परिचय हो चुका था और मैं समझने लगा था कि परिकम्मावासी क्या होते हैं।

तब मैने सोचा था कि नर्मदा मांडू के समीप से बहती होंगी। पर आज गूगल मैप पर देखता हूं तो पता चलता है नीलकंठ महादेव मंदिर से नर्मदा क्रो-फ्लाइइट पर भी 20 किमी दूर हैं। उस समय भी 20-30 किलोमीटर घूम कर पदयात्री वाया माण्डू चला करते थे। उनका मार्ग ही यही है।

प्रेमसागर ने सुनी सुनाई बात बताई – “मेन बात है भईया कि लोग धरमपुरी हो कर नहीं चलते। वहां भीम को ले कर कोई कथा है। कहते हैं कि भीम नर्मदा का जल पीने के लिये वहां आये थे। दूसरी बात यह है कि पास में खुज नदी बहती है। वह नर्मदा में जा कर मिलती है। परिक्रमावासी वह नदी पार नहीं करते। लोगों की मान्यता है कि वह कर्मनासा की तरह कोई नदी है जिसे पार करने पर सारे पुण्य ‘नास’ हो जाते हैं।”

इंटरनेट पर खंगालने पर मुझे वैसा कुछ नहीं मिला। नर्मदा जी को ले कर कई किंवदंतियां हैं जो लगता है उनपर लिखी पुस्तकों या ट्रेवलॉग्स में जगह नहीं पा सकी हैं। और गूगल सर्च, चैट जीपीटी या और कोई एआई मॉडल आखिर जानकारी तो इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से ही लेगा।

एक स्थान पर प्रेमसागर दोपहर विश्राम कर रहे थे तो वहां के प्रवचन कर्ता अश्विनी यदुवंशी जी ने एक नया प्रकटन किया। जनश्रुति हि कि रानी रूपमती मांडू से नित्य नर्मदा स्नान को धर्मपुरी आया करती थीं। धर्मपुरी में बेट (टापू) पर बिल्व-अमृतेश्वर महादेव का मंदिर है। वहां रूपमती स्नान के बाद दर्शन किया करती थीं। जब उनका बुढ़ापा आया तो मैय्या से उन्होने निवेदन किया कि उम्र के कारण रोज आना कठिन हो रहा है। नर्मदा माई ने उन्हें एक कुंड मांडू में बनवाने का आदेश दिया और कहा कि मेरा एक लोटा जल उसमें डाल देने से मैं वहां स्वयम चली आऊंगी। वह कुण्ड रेवा कुंड कहलाया।

एक दूसरी लोककथा के अनुसार – रानी रूपमती नर्मदा नदी की भक्त थीं और प्रतिदिन भोजन से पहले नदी के दर्शन करती थीं। जब सुल्तान बाज बहादुर ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने शर्त रखी कि जब तक नर्मदा नदी मांडू में नहीं बहती, वह विवाह नहीं करेंगी। बाज बहादुर ने नर्मदा नदी से प्रार्थना की, और एक चमत्कारिक रूप से एक जल स्रोत प्रकट हुआ, जिसे रेवाकुंड कहा गया।

बहरहाल; प्रार्थना बाजबहादुर की रही हो या रूपमती की, रेवाकुण्ड मांडू में बना और अब परिक्रमा वासी रेवाकुंड को नर्मदा ही मानते हैं। वे धर्मपुरी तथा रेवाकुण्ड के बीच की जमीन पार नहीं करते। … नर्मदा परिक्रमा एक प्रेमकथा की साक्षी है। यह पदयात्रा जाने कौन कौन से रंग, जाने कौन कौन से भाव अपने में समेटे है!


पदयात्रा प्रेमसागर कर रहे हैं पर उसके साथ सोचना, मनन करना मुझे भी लपेटे हुये है। नर्मदा की समांतर मनयात्रा मेरी भी चल रही है। ट्रेवलॉग केवल यात्रा का नक्शा नहीं, उसकी आत्मा भी होना चाहिये – जिसमें कुछ कल्पना हो, कुछ भावना, और कुछ वह जो सिर्फ़ यात्रा करते हुए नहीं, मन में घटता है। वह उड़ान जो तथ्य की रोचकता बढ़ाये और पाठक की कल्पना को गुदगुदाये।

मैं केवल प्रेमसागर की यात्रा का यथावत विवरण देने तक सीमित नहीं रह सकता। वह करते करते एक तरह की थकान या ऊब हो सकती है। होती ही है। मुझे अपनी मानसिक यात्रा को भी शब्द देने चाहियें और खूब देने चाहियें।

पर इस वृतांत में कहां प्रेमसागर की तथ्यात्मक पदयात्रा है और कहां मेरी मनयात्रा, पाठक को उसके बारे में पता रहना चाहिये। अत: मैं लेखन में अपनी सोच, अपनी कल्पना को जो व्यक्त करूंगा, उसके लिये एक संकेत चिन्ह उस पैराग्राफ के प्रारम्भ में दूंगा। उससे पाठक को यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह पदयात्री का नहीं, मनयात्री का कथ्य है। उस पैराग्राफ या खंड के पहले “$” चिन्ह लगा मिलेगा। इस स्पष्टीकरण के साथ मैं आगे बढ़ता हूं। आगे यह यात्रा जितनी प्रेमसागर की होगी, उतनी मेरी भी होगी।

अत: जब आप ‘$‘ चिन्ह देखें, तो समझिये यह मेरी भीतरी यात्रा की झलक है – एक कल्पना, एक अनुमान, या एक विचार जो नर्मदा की बाहरी यात्रा के समांतर बह रहा है।


बोधवाड़ा से माहेश्वर की पदयात्रा (वाया मांडू) करीब सवा सौ किलोमीटर की रही है। इसके दौरान हुये पदयात्रा के और मनयात्रा के अनुभव अगली दो तीन ब्लॉग पोस्टों में प्रस्तुत करूंगा। उसके बाद ब्लॉग पर यात्रा का विवरण हर दूसरे-तीसरे दिन हुआ करेगा। यह ट्रेवलॉग की विधा में एक अलग सा प्रयोग होगा जिसमें एक व्यक्ति पदयात्रा कर रहा है, दूसरा मनयात्रा कर रहा है और दोनो के साझा अनुभव इनटरनेट/एआई (मुख्यत: चैट जीपीटी) की सहायता से बल पा रहे हैं। इस तरह यह भौतिक यात्रा, कल्पना, मानसिक अनुभूति और सामग्री पर शोध – इन सबका विलयन है। यह कितना अच्छा और कितना साधारण बनता है, वह तो समय बतायेगा। आखिर यह अपने तरह का पहला प्रयोग जो है!

नर्मदा की यात्रा कई लोगों ने कई तरीके से की है। यह एक और तरीका भी देखेंगी नर्मदा मां।

जब मांडू के रेवा-कुंड में मां प्रकट हो सकती हैं, तो मेरे मन के कुंड में क्यों नहीं?

नर्मदे हर!

नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक

मांडू में दुर्गम रास्ता

नर्मदा पदयात्रा – निसारपुर से बोधवाड़ा


बोधवाड़ा: जहाँ से देवताओं ने नर्मदा परिक्रमा की

#नर्मदापदयात्रा 12वां दिन 27 मई 2025

अभी भी नदी का किनारा बांध के असर से अछूता नहीं है। बांध का पानी मौसम के साथ बढ़ता है। उससे बचने के लिये नीचे के तटीय इलाकों से आबादी हट कर पीछे ऊंची जगहों पर चली गई है। किनारे पर कुछ बड़े पेड़, कुछ मंदिर अभी भी वहीं जमे हैं। जब बांध का पानी ले कर नर्मदा बढ़ती हैं तो जल समाधि में चले जाते हैं वे। सांस रोके देवता लोग इंतजार करते हैं नर्मदा पुन: पीछे सरकने का। नदी के आगे आने, पीछे हटने वाला नृत्य स्थानीय लोगों ने देखा होगा। बुज़ुर्ग शायद वो दिन याद करते हों, जब नर्मदा बिना बांध के अपने ढंग से बहती थी। यूं, नर्मदा थोड़े ही यह निर्मम तांडव करती हैं। वह तो बांध का किया धरा है।

निसारपुर से बोधवाड़ा – जहां तक आज की पदयात्रा हुई, यही खेल दिखा नदी का। मालवाड़ा-बोधवाड़ा गांवों में बसावट एक दो किलोमीटर पीछे सरक गई है। अब वे गांव ऊंचाई पर हैं। लोग ऊंचाई से भी नर्मदा माई के दर्शन सहज ही कर लेते होंगे, पर घाट तक जाने में तो श्रम बढ़ गया है।

बांध को ले कर लोगों में अलग अलग राय है। किनारे के गांवों के लोग, ज्यादातर उम्रदराज लोग जिन्होने बांध के पहले की नर्मदा देखी हैं; वे बांध को सभी मुसीबतों की जड़ मानते हैं।

नौजवान लोग तो गिनाते हैं उससे मिलने वाली नहरों के पानी के लाभ। वह नौजवान – रामलाल, तो बांध के पक्ष में तर्क देते हुये लड़ने को भी तैयार हो गया। आखिर उसके खेत में केले और अरहर की फसल जो लहलहा रही है। और पीने के पानी की किल्लत की पुरखा-पुरनिया की बात तो वह जानता ही नहीं।

प्रेमसागर बोधवाड़ा में नर्मदा तट पर हो आये। उन्होने बताया कि नर्मदा का बहाव तेज है। लहरें कुछ वैसे आती है जैसे समुद्र में। वैसी ही आवाज भी करती हैं। नदी का पाट भी चौडा है। सरदार सरोवर डैम के आगे तो नदी में रेत के टापू – बेट दिखते थे। यहां तो बड़ी जलराशि ही दिखती है। नर्मदा की प्रकृति बांध के पहले और बांध के बाद अलग है। शुक्लतीर्थ की नर्मदा और बोधवाड़ा की नर्मदा अलग लगती हैं।

इस जगह पर एक पट्ट लगवाया है किसी आनंद ही आनंद संस्था ने। पट्ट में कहना है कि स्कंद, अग्नि और वायु पुराण के रेवा खंड में आख्यान है कि इसी स्थान से देवताओं ने नर्मदा की परिक्रमा प्रारम्भ और पूर्ण की थी। इस स्थान पर ही नर्मदा की कृपा से उनको देवत्व बोध हुआ, तो स्थान का नाम बोधवाड़ा पड़ा। नर्मदा का प्रताप ही है कि आदमी या देवता, अपना आत्मबोध कर पाता है। वर्ना जिंदगी तो खटकरम में ही फंसी रहती है।

लोग ॐकारेश्वर से भी नर्मदा परिक्रमा शुरू करते हैं। कुछ लोग भरूच से करते हैं। एक पट्ट के अनुसार एक महामंडलेश्वर जी ने आँवली से भी परिक्रमा प्रारम्भ की थी 2021-22 में। मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना। यूं भी नर्मदा के किनारे के हर कंकर शंकर कहे जाते हैं। हर कंकर कोई न कोई तीर्थ है।

बस, आप अपना बैकपैक साधिये और कहीं से भी, नर्मदा माई को दाहिने रखे हुये परिक्रमा प्रारम्भ कर दीजिये। नर्मदा माई का प्रताप है तो देवता लोग आपके पीछे पीछे आ ही जायेंगे! नर्मदे हर!

मालवाड़ा में षोडल बाबा का मंदिर है। उसके कर्ताधर्ता हैं हनुमान दास जी। हनुमान बाबा से प्रेमसागर का पुराना परिचय है। वे चित्रकूट और अयोध्या में उनसे मिल चुके हैं। हनुमानदास जी पंचनंदनी अखाड़ा के हैं। यहां मुलाकात होने पर दोनो को ही हर्ष हुआ। प्रेमसागर सोलह किलोमीटर ही चले थे। और आठ किमी चलना था, पर हनुमान दास जी के यहां ही रुक गये। ऐसे रुकना चलना होता रहे तो ही नर्मदा पदयात्रा में रस है।

आज मैं सोच रहा हूं – बांध ने नर्मदा को बांधने का पूरा प्रयास किया है। पर उसने जल को साधा है, नर्मदा से स्वभाव को, उनकी पवित्रता को नहीं। बावजूद बांध के, परिक्रमा होती रहेगी और नर्मदा देवताओं-मानवों को उनका बोध कराती रहेंगी।


प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस हैprem199@ptyes

नर्मदे हर! नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक


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