पूर्वांचल की ग्रे नैतिकता — एक ऑबिच्युरी से उपजा आत्मसंवाद


एक सज्जन ने मुझे फोन किया। “जीडी, तुमने अमर उजाला देखा? सबसे ऊपर एक छोटे से कस्बा नुमा शहर के आदमी के देहावसान पर पूरे पेज का विज्ञापन है। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि मडीयाहू जैसे कस्बे के आदमी का दस-पंद्रह लाख खर्च कर कोई ऑबीच्यूरी छपायेगा।”

अमर उजाला मेरे घर आता नहीं, पर मैने प्रयास कर वह हासिल किया। कोई राम अचल पाण्डेय का जिक्र था उसमें।

वे सज्जन 96 वर्ष की उम्र पा कर एक दो दिन पहले दिवंगत हुये थे। काजीहद पंडान, मडियाहू, जौनपुर का पता लिखा है। मडियाहू कस्बा ही है जौनपुर जिले में। आबादी 40-50 हजार की होगी। अमर उजाला के अगर वाराणसी संस्करण भर में भी वह विज्ञापन हो तो भी उसका खर्च 10 लाख से कम न होगा। दस लाख विज्ञापन भर में तो तेरही और अन्य कर्मकांड में करोड़ों में खर्च! पूर्वांचल की गरीबी के बीच यह सम्पन्नता मुझे आकर्षित कर गई – किसी को भी कर सकती है।

मेरी कल्पना के अश्व भागने लगे। बेलगाम!


मैने कल्पना की। मैं नीलकंठ चिंतामणि हूं और उक्त विज्ञापन में वर्णित सज्जन कृष्ण मोहन हैं। अयोध्या से जनकपुर की राम की विश्वामित्र के साथ की गई यात्रा को मैं (नीलकंठ) ट्रेस कर रहा था साइकिल से; तब मडियाहू में मुलाकात हुई थी कृष्ण मोहन से। सामान्य सी साइकिल से जाता मैं और एक बड़ी सी कोठी नुमा घर में कृष्ण मोहन – शायद दोनो एक दूसरे से सामान्य विपन्नता और सम्पन्नता से अलग, एक दूसरे से प्रभावित हुये। मैं दो दिन उनके यहां रुक गया। वहीं लगा कि उनका जीवन वृत्तांत जानना और लिखना बहुत रोचक भी होगा और एक आदमी की फर्श से अर्श की सफलता को समझना अभूतपूर्व होगा। कृष्ण मोहन ने मुझे अपने कुछ व्यक्तिगत कागज दिये जिससे जान सकूं कि वे कैसे आदमी हैं।

उन्हीं कागजों में एक यह है।
अब जब कृष्ण मोहन नहीं रहे, तो मैं उसे शेयर कर सकता हूं। इसकी अनुमति, कि मैं उनके कागजों का अपने मन माफिक इस्तेमाल कर सकता हूं; कृष्ण मोहन ने मुझे दी थी… अब वह अनुमति इतिहास बन गई है।

कृष्ण मोहन के लेख पर मैं अपनी सोच भी लिखूंगा, उसके बाद, इस ब्लॉग पोस्ट में।

यह है कृष्ण मोहन का लेख –

मेरे (कृष्ण मोहन के) बारे में मेरी कलम

मैं जानता हूँ, मेरी कहानी लिखते समय सबसे कठिन प्रश्न यह नहीं होगा कि मैंने कितना कमाया, बल्कि यह होगा कि मैं कितना ठीक था और कितना ग़लत। यह प्रश्न मैं अपने लिए कभी बहुत साफ़ नहीं कर पाया, इसलिए बेहतर है कि इसे वैसे ही दर्ज कर दूँ — जैसे यह मैने जिया।

पूर्वांचल में नैतिकता कोई सीधी रेखा नहीं होती। यहाँ वह नदी की तरह है —
कहीं साफ़, कहीं गाद से भरी,
कहीं किनारे काटती हुई,
कहीं खेतों को सींचती हुई।

मैं उसी नदी के किनारे पला-बढ़ा।

  • सिस्टम और मैं

देश आजाद हुआ ही था। और मैं कलकत्ता पंहुच गया था। कैसे पंहुचा और कितने पापड़ बेले, वह तो विस्तार से कोई सुपात्र सज्जन लिखेंगे। पर मैं सरकारी अमले के सम्पर्क में आया वहां।

सरकारी दफ्तरों में मैंने कभी यह नहीं पूछा कि काम क्यों नहीं हो रहा, मैंने यह पूछा कि काम कैसे होगा।

ओवरसियर, एक्सईएन, दारोगा, चुंगी वाले, जंगलात वाले; और भी अनेक लोग — ये लोग मेरे लिए व्यक्ति नहीं थे, ये प्रक्रिया के हिस्से थे।

मैंने उन्हें पैसा दिया। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता।

पर मैंने इसे चोरी नहीं माना, क्योंकि:

मैंने बिल बढ़ाकर नहीं बनाया; कंस्ट्रक्शन के काम में मैंने घटिया सामग्री नहीं लगाई; मैंने इमारतें और पुल गिरने नहीं दिए…

कदम कदम पर रिश्वत देनी थी। मेरे मन में रिश्वत पाप नहीं थी, काम बिगाड़ना पाप था।

अगर मेरा यह तर्क गलत है, तो यह गलती अकेले मेरी नहीं है। सर्व व्यापक व्यवस्था वही थी और अब भी है।

  • दहेज और परिवार

मेरे दोनो बच्चों की शादी में बहुत कुछ आया। और मैंने मना नहीं किया।

यह भी उतना ही सच है कि मैंने माँगा भी नहीं।

हमारे समाज में यह फर्क बहुत मायने रखता है —
शायद बाहर से देखने वाले को यह चालाकी लगे,
पर भीतर से यह मर्यादा थी।

मैं जानता हूँ, आने वाले समय में
इसे कोई भी सही नहीं ठहराएगा।

पर मेरे समय में,
लड़के की पढ़ाई,
उसका काम,
उसके पिता की हैसियत —
सबका मूल्य तय होता था।

मैंने उस बाज़ार से बाहर खड़े होने की हिम्मत नहीं की। हां, मुझे संतोष है कि मैं किसी भी मानक से लालची नहीं था।

  • दबंगई, या व्यवस्था?

गांव में काफी सफल हो कर लौटा। यहां मेरा नाम चलता था।
यह सच है।

पर मैंने कभी यह चाहा नहीं कि लोग मुझसे डरें।
मैं चाहता था कि लोग समझें —
कि झगड़ा यहाँ आकर रुकेगा।

अगर दो परिवार भिड़ते,
तो मैं पंचायत बैठाता।
अगर कोई ज़्यादा उछलता,
तो बिना हीलाहवाली के दारोगा या कोई और बड़ा हाकिम मेरा फोन उठा लेता।

यह ताक़त थी —
पर यह ताक़त रोज़ इस्तेमाल करने की चीज़ नहीं थी।

जिस दिन ताक़त रोज़ लगानी पड़े,
समझ लीजिए कि इज़्ज़त खत्म हो चुकी है।

  • मेरा नैतिक गणित

मैंने कभी खुद को संत नहीं माना।
और न ही मैं अपराधी महसूस करता हूँ।

मेरे लिए नैतिकता का गणित यह था:

घर सुरक्षित रहे; काम समय पर पूरा हो; किसी की जान मेरी वजह से न जाए; मेरे बच्चे गाँव छोड़कर शहर में सिर उठा सकें

अगर यह सब कुछ पूरी तरह साफ़ रहकर संभव होता,
तो शायद मैं वैसा करता।

पर पूर्वांचल में
बहुत साफ़ रहना भी एक तरह की बेईमानी है –
क्योंकि तब आप दूसरों को सिस्टम के हवाले छोड़ देते हैं।

  • आने वाले लेखक के नाम

अगर तुम यह पढ़ रहे हो,
और मेरी जीवनी लिखने का सोच रहे हो,
तो मुझे बचाने की कोशिश मत करना।

बस यह याद रखना —
मैं अपने समय का आदमी था।

मुझे आज के तराज़ू पर मत तौलना,
और मुझे दानव बनाकर भी मत लिखना।

मैं उस धूसर इलाके में रहा
जहाँ ज़्यादातर लोग रहते हैं,
पर पूर्वांचल की ग्रे नैतिकता को,
बहुत कम लोग उसे यथावत स्वीकार करते हैं।


नीलकंठ का कथ्य

मैं कृष्णमोहन से कहाँ असहमत हूँ — और कहाँ चुपचाप सहमत

कृष्णमोहन से मेरी असहमति सैद्धांतिक नहीं है। वह किसी एक कर्म, एक फैसले या एक समझौते पर टिकती नहीं। मेरी असहमति मेरी अपनी जीवन यात्रा से आती है।

मैं हमेशा यह मानता रहा हूँ कि नैतिकता अगर थोड़ी भी ढीली हुई, तो वह फिसलन बन जाती है। और फिसलन पर खड़ा आदमी खुद को चाहे जितना संतुलित समझे, अंततः गिरता ही है। कौन बचा है उस फिसलन से?

कृष्णमोहन इससे सहमत नहीं होते।

उनकी नैतिकता सीढ़ी नहीं, ढलान है –
जहाँ आदमी पैर जमा कर नहीं, चलते हुए संतुलन बनाता है।

कृष्ण मोहन कुशल नट हैं जो पतली रस्सी पर अपने को साधे सिर पर बोझ लिये चलता है। और मैं जमीन पर भी सर्कोपीनिया ग्रस्त आदमी की तरह चलता हूं जो वजह-बेवजह ठोकर खाता रहता है।

यहीं से हमारी दूरी शुरू होती है।

1. जहाँ मैं असहमत हूँ

मैं मानता हूँ कि
गलत को “सिस्टम की मजबूरी” कह देना
गलत को थोड़ा और स्थायी बना देता है।

कृष्णमोहन ने रिश्वत दी,
और उसे स्वीकार भी किया —
यह उनकी ईमानदारी है।

पर उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि
इस ईमानदारी की कीमत
किसी और ने चुकाई होगी या नहीं।

शायद किसी छोटे ठेकेदार ने,
जो “खर्चा” नहीं दे सका।
शायद किसी कर्मचारी ने,
जिसकी सी.आर. पूरी ईमानदारी के बावजूद खराब होती रहीं,
केवल इसलिये कि वह ठेकेदार से सही से काम न ले पाया।

मेरी रुक्ष नैतिकता
इसी सवाल पर अटक जाती है।

मैं यह नहीं कह पाता कि
“सब ऐसा करते थे”
ऐसा कहने पर,
मेरे अनुसार अर्थ यह है कि
“ऐसा करना बिल्कुल ठीक था”।

2. जहाँ मेरी असहमति थक जाती है

लेकिन यहीं,
कुछ दूर चलने के बाद,
मेरी असहमति थक भी जाती है।

क्योंकि मैं यह भी जानता हूँ कि
मेरी अपनी नैतिकता
मुझे अक्सर अलग-थलग कर देती है।

मैंने कई बार
साफ़ रहने की कीमत
अकेले रहकर चुकाई है।

कृष्णमोहन ने यह कीमत नहीं चुकाई।
उन्होंने समाज के साथ सौदा किया,
और समाज ने उन्हें जगह दी।

यह फर्क
न छोटा है,
न अनदेखा करने लायक। कृष्ण मोहन सफल है।
उसकी ऑबिच्युरी में पूरा फ्रंट पेज रंगा है।
मेरे जाने पर कोई ऑबीच्यूरी होगी ही नहीं!

3. दहेज, दबंगई और जीवन का शोर

दहेज पर मैं उनसे असहमत हूँ।
पूरी तरह।

पर सच यह भी है कि
मेरी असहमति ने
किसी व्यवस्था को नहीं बदला।

कृष्णमोहन की स्वीकृति ने भी नहीं बदला,
पर उसने उन्हें
अपने समाज में निर्वासित भी नहीं किया।

यह तथ्य मुझे असहज करता है।

गांव की हल्की दबंगई,
फोन उठाने भर की ताक़त —
यह सब मुझे स्वीकार नहीं।

पर मैं यह भी देखता हूँ कि
कृष्णमोहन के गांव में
अराजकता नहीं थी।
लोग कृष्ण मोहन को जानते थे और पसंद भी करते थे।
मेरे साथ वैसा कुछ भी नहीं है।

यह कोई नैतिक जीत नहीं है,
पर यह जीवन की एक सच्चाई ज़रूर है।

4. अगर जीवन फिर से जीना हो…

यहीं मैं सबसे ईमानदार होना चाहता हूँ।

अगर जीवन फिर से जीना हो,
तो मैं नहीं जानता कि
मैं पूरी तरह कृष्णमोहन बन पाऊँगा या नहीं।

पर मैं यह जानता हूँ कि
मैं अपने जैसे
इतना रुक्ष नहीं रहना चाहूँगा।

मैं शायद उनसे यह सीखना चाहूँगा कि
हर गलत को युद्ध न बनाया जाए।
कुछ समझौते
जीवन को लंबा और
थोड़ा अधिक रहने योग्य बना देते हैं।

मैं यह भी सीखना चाहूँगा कि
नैतिकता को
कभी-कभी
मानव-संबंधों के पक्ष में झुकने दिया जाए।

यह कहना आसान नहीं है।
और कहना जोखिम भरा भी है।

पर सच शायद यही है।

5. कृष्णमोहन की सार्थकता

कृष्णमोहन की सार्थकता
उनके सही या गलत होने में नहीं है।

उनकी सार्थकता इस बात में है कि
वे मुझे
मेरी अपनी नैतिकता के बारे में
दोबारा सोचने पर मजबूर करते हैं।

वे मुझे यह याद दिलाते हैं कि
नैतिकता अगर
जीवन से कट जाए,
तो वह भी एक तरह का अहंकार बन सकती है।

मैं उनसे असहमत रहूँगा।
पर मैं उन्हें खारिज नहीं कर सकता।

और शायद
यही किसी व्यक्ति की
सबसे बड़ी विरासत होती है –

वह हमें
थोड़ा असहज छोड़ जाए।

Krishna Mohan in Amar Ujala and I
फुल पेज श्रद्धांजलि का विज्ञापन वाला अखबार और मैं।

“यह पोस्ट कृष्णमोहन पर नहीं है।
यह उस असहजता पर है
जो हम अपने भीतर महसूस करते हैं,
जब किसी और का जीवन
हमारे अपने फैसलों से सवाल पूछ लेता है।”


सगड़ी वाला बूढ़ा


इग्यारह बज रहे थे। कोहरे का पर्दा हल्के से ठेल कर कानी आंख से सूरज भगवान ताकने लगे थे। वह बूढ़ा मुझे मर्यादी वस्त्रालय के आगे अपनी सगड़ी (साइकिल ठेला) पर बैठा सुरती मलता दिखा। बात करने के मूड़ में मैने पूछा – आजकल तो बिजली का ठेला भी आने लगा है। वह लेने की नहीं सोच रहे?

उसने बिजली के ठेले पर कुछ नहीं कहा। शायद समझ ही न आया कि वैसा भी कुछ होता है। पर वह अपने बारे में बताने लगा। भक्तापुर का रहने वाला है। सवेरे तो कोहरे में निकलना नहीं हो पाया। अब जा कर निकला है। अभी कोई काम नहीं मिला। चौरस्ते पर जायेगा तो कुछ काम मिले शायद।

सगड़ी वाला बूढ़ा
सगड़ी वाला बूढ़ा

यहां किस लिये आये? पूछने पर उसने पीछे डाकघर की ओर इशारा किया कि वहां आया था। “बिरधावस्ता (वृद्धावस्था) पेंशन” के बारे में तहकीकात करने आया था। उसे मिलती थी पर अब ‘कजनी काहे (पता नहीं क्यों)’ मिलना बंद हो गई है। तीन महीने में तीन हजार मिलती थी। उससे दवा-दारू का खर्चा निकल आता था। दो लड़के हैं उसके पर वे अपना खर्चा ही मजूरी से बमुश्किल निकाल पाते हैं; उसकी देखभाल कहां से करेंगे?

“जिस दिन काम मिल जाता है, उसदिन का इंतजाम हो जाता है। नहीं तो नून-रोटी से गुजारा होता है।” – उसने बताया।

उसके सुरती मलने पर मैने पूछा – कितनी बार खैनी खा चुके सवेरे से?

“आज की पहली है। इसके पहले तो ठंड में गुड़मुड़ियाये पड़े रहे। अब पहली बना रहे हैं। उसके बाद चल कर काम तलाशेंगे।”

आज फिर मुझे बिना पर्स, बिना चिल्लर लिये बाजार की ओर निकलने पर कसक हुई, वर्ना उस बूढ़े सगड़ी वाले को सवेरे की चाय-समोसा का पैसा तो दे देता…

चलते चलते एक सवाल और किया मैने – डाकघर वाले पेंशन के लिये कोई पैसा तो नहीं मांगते?

डाकघर पर बूढ़ा तहकीकात करता। एआई जनित चित्र।
डाकघर पर बूढ़ा तहकीकात करता। एआई जनित चित्र।

“नहीं बाबूजी, नहीं। वैसा कुछ कभी नहीं बोले वे लोग। बताये कि पता करेंगे कि काहे किस बजह से रुक गई है। भले आदमी हैं। भरोसा दिलाये हैं।” – उसकी बात से मन में सुकून हुआ वर्ना इस क्षेत्र की गांवदेहात की पूरी नौकरशाही-नेताई गिद्ध ही नजर आती है मुझे। गरीब को नोचने वाली।

भला हो उस सगड़ी वाले वृद्ध का। भला हो डाकघर वालों का भी!


मुन्ना पांडे की प्रसन्नता और मेरा आईना


मुन्ना पांडे बस ड्राइवर हैं। मेरे साले साहब – पिंकू पंडित (विकास दुबे) की बस चलाते हैं। आजमगढ़ से नागपुर जाने वाली बस उनकी रोज़मर्रा की दुनिया है—दोपहर दो बजे निकलती है और अगले दिन सुबह सात बजे नागपुर पहुँचती है। चौबीस घंटे से कुछ कम का यह समय उनके लिये असाधारण नहीं, बल्कि एक जाना-पहचाना, नियमित सा क्रम है, बहुत कुछ वैसा जैसे बिना प्रयास मैं साइकिल चलाता हूं!

उनकी उम्र साठ के करीब है। शरीर मानक से भारी है, वैसे वे बोले की पहले से वजन कुछ कम किया है। यूं चेहरे पर शिकायत की रेखाएँ नहीं हैं। सर्दियों में ऊनी टोपी और गले में गमछा—यही उनका शृंगार है। वे अपनी उम्र से लड़ते नहीं, उसे स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते दीख रहे हैं।

मुन्ना पांडे के घर-परिवार की स्थिति सामान्य है। दो बेटे हैं—बड़ा इंटर कॉलेज में पढ़ाने का काम करता है, छोटा बसों से जुड़ा हुआ है। संविदा के आधार पर सरकारी बस पर लगा है – देर सवेर परमानेंट नौकरी हो ही जायेगी उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग में। बेटी की शादी हो चुकी है। मुन्ना पांडे इन बातों को किसी उपलब्धि की तरह नहीं गिनाते, बस इत्मीनान से बताते हैं। जैसे कह रहे हों—ज़िंदगी ने जो दिया, उसे सहेज-सम्हाल लिया गया है।

मैं उन्हें सुनता हूँ और बरबस अपने साठवें साल की ओर लौट जाता हूँ। तब मेरे पास समय की कमी नहीं थी, पर धैर्य की थी। मैं लगातार यह जाँचता रहता था कि क्या सब कुछ ठीक चल रहा है, क्या कुछ और बेहतर किया जा सकता था। यह जांचने की प्रवृत्ति लगभग चौबीसों घंटे मुझे असंतुष्ट और अप्रसन्न बनाती रहती थी। मुन्ना पांडे यह जाँच नहीं करते। वे चलती चीज़ों को चलने देते हैं।

मुझ जैसे लोग, जीवन को उपलब्धियों से मापना सीख लेते हैं, पर अनुभूति से मापना भूल जाते हैं। इस कोण से मुन्ना मुझसे कहीं बेहतर हैं। कहीं ज्यादा सफल और कहीं ज्यादा प्रसन्न। मुख्य तो यह है कि मुन्ना पांडे शायद बेहतरी, सफलता या प्रसन्नता को बहुत प्रयास कर जांचते भी न होंगे!

मुन्ना पांडे जीवन को मैनेज नहीं करते, वे उसे निभाते हैं। और उस कोण से मुझसे कहीं बेहतर हैं।
मैनेजमेंट में नियंत्रण का भ्रम होता है, निभाने में स्वीकृति का साहस। शायद यही फर्क है जो मन को हल्का या भारी बनाता है। यह बात किताबों में नहीं, ऐसे लोगों में दिखती है। भला हो पिंकू पंडित का कि मैं उनके घर सवेरे कउड़ा पर चाय के अनुष्ठान में शामिल हुआ।

Kauda Meeting at Pinku House
विकास दुबे के घर कउड़ा पर सवेरे की बैठकी

सवेरे आठ बजे थे, कोहरा छंटने की जुगत में था। पिंकू पंडित अपने ट्रेवल कम्पनी के सहकर्मियों के साथ अलाव जला कर गपशप कर रहे थे। उन पांच छ लोगों में जो कुर्सी मेरे लिये खाली की गई, उसके बगल में ही थे मुन्ना पांडे। मैं उन्हें नहीं जानता था, पर उन्होने बताया कि वे बहुधा मुझे अपने गांव से साइकिल पर गुजरते देखते हैं।

उनसे बात करते हुए मुझे यह भी महसूस हुआ कि वे भविष्य को लेकर बहुत दूर तक नहीं सोचते। अगले साल, अगले दस साल, या “रिटायरमेंट के बाद क्या”—ये प्रश्न उनके शब्दकोश में नहीं हैं। वे बस इतना चाहते हैं कि आज का दिन ठीक से कट जाए, रात की नींद पूरी हो जाए, और सुबह बस सही समय पर चल पड़े।

मैंने उनका मोबाइल नंबर भी ले लिया है। कोई विशेष कारण नहीं—बस इसलिए कि यह संपर्क बना रहे। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे बात करते रहना अच्छा लगता है, भले ही बात का कोई एजेंडा न हो। शायद आने वाले दिनों में उनसे फिर बातचीत होगी—कभी यूँ ही, कभी किसी बहाने। कभी शायद पिंकू के कउड़ा पर चाय के दौरान।

कभी-कभी मन करता है कि एक दिन उनकी बस में बैठूँ। आज़मगढ़ से नागपुर की राउंड ट्रिप लगा कर आऊं।

यह ट्रिप हो – न कोई यात्रा-वृत्तांत लिखने के लिये, न किसी अनुभव को “कंटेंट” में बदलने के लिये। बिना नोट्स लिये, बिना निष्कर्ष निकाले। बस नागपुर तक का सफ़र— किसी साधारण सीट पर बैठकर। खिड़की से बदलते परिदृश्य देखता हुआ, और अपने भीतर चल रही तुलना की आदत को थोड़ी देर के लिये स्थगित करता हुआ।

Munna Pandey in Mirror
मैं आईने में खुद को निहारता हूं। पर शायद मैं खुद को नहीं, मुन्ना पांडे सरीखे को देखना चाहता हूं।

हो सकता है उस यात्रा में मुझे कोई नई सीख न मिले। और यूं, रेलवे की जिंदगी में पूरा देश घूम आने के बाद नया क्या मिलेगा? पर शायद उस यात्रा से यह समझ गहरी हो जाए कि ज़िंदगी को हर समय सुधारने की ज़रूरत नहीं होती—कभी-कभी उसे बस देखने की ज़रूरत होती है। जैसे मुन्ना पांडे देखते हैं—बिना जल्दबाज़ी, बिना शिकायत के।

संभव है कि नागपुर पहुँचते-पहुँचते मैं यह तय कर पाऊँ कि कौन ज़्यादा संतुलित जीवन जी रहा है—
मुन्ना पांडे या मैं। मैं आईने में खुद को निहारता हूं। पर शायद मैं खुद को नहीं, मुन्ना पांडे सरीखे को देखना चाहता हूं।


Design a site like this with WordPress.com
Get started